Digital Arrest: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से अलग कानून पर विचार करने और साइबर अपराधों पर सख्ती के दिए संकेत

डिजिटल अरेस्ट मामलों पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, केंद्र से नए कानून पर विचार का सुझाव।

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Digital Arrest: देश भर में तेजी से पांव पसार रहे ‘डिजिटल अरेस्ट’ और ऑनलाइन साइबर ठगी के गंभीर मामलों पर संज्ञान लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को अत्यंत महत्वपूर्ण और कड़े निर्देश दिए हैं। मंगलवार को सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि डिजिटल अरेस्ट जैसी उभरती आपराधिक प्रवृत्तियों को देश के मौजूदा आपराधिक कानूनों में स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने सुझाव दिया कि इसे एक अलग और विशिष्ट अपराध की श्रेणी में शामिल करने पर गंभीरता से विचार हो, क्योंकि ऐसे अपराध न केवल आम नागरिकों की गाढ़ी कमाई लूट रहे हैं, बल्कि उन्हें भयंकर मानसिक आघात भी पहुंचा रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी और कानूनी दायरा

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ इस पूरे मामले पर स्वत: संज्ञान (Suo Motu) के तहत सुनवाई कर रही थी। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि डिजिटल अरेस्ट के मामलों में जबरन वसूली, आपराधिक धमकी और डकैती जैसे जघन्य अपराधों के स्पष्ट तत्व दिखाई देते हैं। इसलिए सरकार को इसके लिए अलग कानूनी ढांचा तैयार कर कठोरतम दंड का प्रावधान करना चाहिए। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली शक्तियों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट स्वयं कोई नया अपराध घोषित नहीं कर सकता, क्योंकि नया कानून बनाने और अपराध की परिभाषा तय करने का अधिकार पूरी तरह से संसद और विधायिका के पास है।

अपराधियों की संपत्ति फ्रीज करने और डीपफेक पर चिंता

चीफ जस्टिस ने एक अहम सुझाव देते हुए कहा कि यदि किसी डिजिटल ठग या आरोपी के खिलाफ जांच में प्रथम दृष्टया पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं, तो जांच एजेंसियों को उसकी संपत्तियों को तुरंत फ्रीज करने का कानूनी अधिकार मिलना चाहिए। इससे साइबर अपराधियों के आर्थिक नेटवर्क पर सीधी चोट की जा सकेगी। वहीं सुनवाई के दौरान पीठ के सदस्य जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने डीपफेक (Deepfake) तकनीक के दुरुपयोग पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि तकनीक के विकास के साथ अपराध के तरीके भी आधुनिक हो गए हैं और एआई-जनरेटेड डीपफेक का इस्तेमाल धोखाधड़ी बढ़ाने में हो रहा है, जिसे रोकने के लिए नए कानून समय की मांग हैं।

केंद्र सरकार की तैयारी और अंतर-विभागीय समिति

अदालत को आश्वस्त करते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि केंद्र सरकार डिजिटल अरेस्ट, डीपफेक और अन्य आधुनिक डिजिटल अपराधों से निपटने के लिए एक नया और समग्र विधेयक तैयार करने की प्रक्रिया में है। इसके साथ ही अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने जानकारी दी कि इस विषय पर एक उच्चस्तरीय अंतर-विभागीय समिति गठित की गई है जो मौजूदा व्यवस्था की कमियों का अध्ययन कर अपनी विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रही है। सरकार कानूनी छेदों को बंद करने के लिए प्रशासनिक सुधारों पर भी काम कर रही है।

सीबीआई (CBI) जांच और राज्यों में तालमेल

अटॉर्नी जनरल ने अदालत को बताया कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) फिलहाल 10 करोड़ रुपये या उससे अधिक की धोखाधड़ी से जुड़े लगभग 20 बड़े और अंतर-राज्यीय डिजिटल फ्रॉड मामलों की जांच कर रही है। अन्य छोटे और मध्यम स्तर के साइबर अपराधों की जांच संबंधित राज्यों की स्थानीय पुलिस और साइबर सेल द्वारा की जा रही है। सरकार का ध्यान बड़े साइबर सिंडिकेट्स को ध्वस्त करने पर केंद्रित है, जबकि राज्यों के स्तर पर भी शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत किया जा रहा है।

रिजर्व बैंक (RBI) की भूमिका और साइबर क्राइम सेंटर्स की मांग

केंद्र सरकार ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट से साइबर अपराधों पर त्वरित रोक लगाने के लिए कुछ अंतरिम निर्देश जारी करने का अनुरोध किया। इसमें फर्जी और संदिग्ध ‘मनी म्यूल’ खातों को तुरंत ब्लॉक करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) लागू करना शामिल है। इसके अलावा, सभी राज्यों में साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (Indian Cyber Crime Coordination Centre) स्थापित करने पर जोर दिया गया है ताकि विभिन्न राज्यों की पुलिस के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान और तालमेल बेहतर हो सके।

Digital Arrest: क्या है डिजिटल अरेस्ट और आम नागरिकों पर इसका असर

डिजिटल अरेस्ट एक नया और बेहद खौफनाक साइबर अपराध है, जिसमें ठग पुलिस, सीबीआई, ईडी या नारकोटिक्स विभाग के फर्जी अधिकारी बनकर पीड़ितों को वीडियो कॉल करते हैं। वे पीड़ितों को फर्जी वारंट और डिजिटल कोर्ट का डर दिखाकर घंटों कमरे में बंद रहने पर मजबूर करते हैं और कानूनी कार्रवाई से बचाने के नाम पर उनसे लाखों-करोड़ों रुपये ऐंठ लेते हैं। इसका सबसे ज्यादा शिकार बुजुर्ग, अकेले रहने वाले लोग और कम तकनीकी जानकारी रखने वाले नागरिक बन रहे हैं, जिससे परिवारों में भारी तनाव और वित्तीय तबाही देखने को मिल रही है।

सुप्रीम कोर्ट के संभावित निर्देश और निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट (Digital Arrest) ने संकेत दिया है कि वह साइबर अपराधों और डिजिटल अरेस्ट पर अंकुश लगाने के लिए बुधवार को अपने महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी कर सकता है। अदालत का यह कड़ा रुख देश में साइबर सुरक्षा और डिजिटल कानूनों को मजबूत करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि सख्त कानून, त्वरित पुलिस कार्रवाई और आम जनता के बीच निरंतर जागरूकता ही इस गंभीर साइबर खतरे से निपटने का एकमात्र कारगर रास्ता है।

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