Supreme Court Stray Dog Case: आवारा कुत्तों के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का सुनवाई से इनकार, जानें पूरा मामला
Supreme Court Stray Dog Case: आवारा कुत्तों के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का सुनवाई से इनकार, जानें पूरा मामला
Supreme Court Stray Dog Case: देशभर में लगातार चर्चा का विषय बने आवारा कुत्तों के प्रबंधन और उनकी नसबंदी से जुड़े मामलों पर देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बार फिर एक अहम फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस याचिका पर सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया, जिसमें भारतीय पशु कल्याण बोर्ड को पशु जन्म नियंत्रण केंद्रों और आश्रयों में कुत्तों के प्रति होने वाली क्रूरता के मुद्दों को अधिक प्रभावी ढंग से संबोधित करने के लिए निर्देश जारी करने की मांग की गई थी। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ के समक्ष इस मामले की सुनवाई चल रही थी। अदालत के इस रुख से यह स्पष्ट हो गया है कि इस विशेष याचिका पर फिलहाल अदालत ने आगे विचार करने से मना कर दिया है, जिससे याचिकाकर्ताओं को एक बड़ा झटका लगा है।
Supreme Court Stray Dog Case: याचिका में की गई थी पशु जन्म नियंत्रण नियमों के सख्त पालन की मांग
याचिकाकर्ताओं द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई अर्जी में मुख्य रूप से यह मांग उठाई गई थी कि केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह कड़े निर्देश दिए जाएं कि वे नियमों का सख्ती से पालन करें। याचिका में कहा गया था कि कोई भी नगर निकाय या स्थानीय प्राधिकरण तब तक किसी भी पशु कल्याण संगठन को पशु जन्म नियंत्रण अभियान चलाने के लिए नियुक्त न करे, जब तक कि उस संगठन के पास भारतीय पशु कल्याण बोर्ड से प्राप्त वैध परियोजना मान्यता प्रमाण पत्र मौजूद न हो। इसके अलावा याचिका में यह भी आग्रह किया गया था कि जिन संगठनों ने अपनी मान्यता का नवीनीकरण नहीं कराया है, उन्हें तुरंत इस तरह के अभियानों से रोक दिया जाए ताकि प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रह सके।
पशु जन्म नियंत्रण नियम 2023 और वैधता के प्रावधानों पर चर्चा
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की पैरवी कर रहे वकील ने अदालत का ध्यान पशु जन्म नियंत्रण नियम 2023 के प्रावधानों की तरफ आकर्षित किया। इन नियमों के अनुसार, आवारा कुत्तों के लिए कोई भी पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम तब तक संचालित नहीं किया जा सकता जब तक कि संबंधित स्थानीय प्राधिकरण या पशु कल्याण संगठन के पास वैध परियोजना मान्यता का प्रमाण पत्र न हो। वकील ने इस बात पर जोर दिया कि नियमों के उल्लंघन की वजह से कई बार आश्रय स्थलों में कुत्तों के साथ क्रूरता की शिकायतें सामने आती हैं। हालांकि, तमाम दलीलों और नियमों के हवाला दिए जाने के बावजूद सर्वोच्च अदालत ने इस विशेष याचिका पर सुनवाई करने से इंकार कर दिया, जिससे इन तर्कों पर अदालत में आगे विस्तार से बहस नहीं हो सकी।
Supreme Court Stray Dog Case: पूर्व के फैसलों और अठारह मई के निर्देशों का दिया गया था हवाला
इस पूरी कानूनी प्रक्रिया के दौरान याचिकाकर्ता के पक्ष की ओर से शीर्ष अदालत के ही पिछले कुछ ऐतिहासिक फैसलों का भी उल्लेख किया गया। वकील ने अदालत के समक्ष गत उन्नीस मई को दिए गए एक महत्वपूर्ण फैसले का जिक्र किया, जिसमें कई निर्देश शामिल थे। उस फैसले में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा गया था कि वे पशु जन्म नियंत्रण ढांचे के प्रभावी और सुचारू कार्यान्वयन के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे को बढ़ाने हेतु समयबद्ध कदम उठाएं। याचिकाकर्ता का यह तर्क था कि उन्हीं पुराने निर्देशों को और अधिक कड़ाई से जमीन पर उतारने की आवश्यकता है, ताकि पूरे देश में आवारा कुत्तों के नियंत्रण का यह पूरा अभियान सुव्यवस्थित तरीके से संचालित किया जा सके और किसी स्तर पर कोई कोताही न बरती जाए।
Supreme Court Stray Dog Case: सुप्रीम कोर्ट के पिछले ऐतिहासिक फैसलों और आदेशों की पृष्ठभूमि
आवारा कुत्तों और रेबीज के खतरे से जुड़े मामलों पर सुप्रीम कोर्ट का रुख पहले भी काफी स्पष्ट रहा है। पूर्व में दिए गए अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में शीर्ष अदालत ने मानव जीवन के लिए गंभीर खतरा बनने वाले रेबीज से ग्रसित, असाध्य रूप से बीमार, खतरनाक और अत्यधिक आक्रामक कुत्तों के लिए इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी। अदालत ने यह भी टिप्पणी की थी कि नागरिकों के गरिमा के साथ जीने के अधिकार में आवारा कुत्तों से नुकसान के भय के बिना स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार भी शामिल है। इसके अलावा, अदालत ने पिछले साल सात नवंबर के अपने आदेश को वापस लेने और उसमें संशोधन करने से जुड़ी कई याचिकाओं और आवेदनों को भी पहले खारिज कर दिया था, जिसमें संस्थागत क्षेत्रों से आवारा कुत्तों को स्थानांतरित करने और उनकी नसबंदी करने से जुड़े निर्देश शामिल थे।
देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा आवारा कुत्तों से जुड़ी इस ताजा याचिका पर सुनवाई से इंकार किए जाने से यह साफ हो गया है कि अदालत फिलहाल इस मामले में नीतिगत स्तर पर नए सिरे से दखल देने के पक्ष में नहीं है। देश भर में आवारा कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करने, उनके टीकाकरण और नसबंदी अभियानों को लेकर पहले से ही कई दिशा-निर्देश और कानून बने हुए हैं, जिनका पालन स्थानीय निकायों और संगठनों को करना होता है। हालांकि, पशु कल्याण और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की यह बहस अभी भी देश भर में एक बड़ा विषय बनी हुई है। आने वाले समय में यह देखना होगा कि स्थानीय प्रशासन और पशु कल्याण बोर्ड इन नियमों का पालन किस प्रकार सुनिश्चित करते हैं ताकि आम नागरिकों की सुरक्षा और पशुओं के प्रति मानवीय दृष्टिकोण दोनों मोर्चों पर सही तालमेल बना रहे।
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