Student Protest Case: सुप्रीम कोर्ट ने पैलेट गन और महिला प्रदर्शनकारियों के आरोपों की जांच को प्राथमिकता दी

HPEC पहले पैलेट गन, महिला प्रदर्शनकारियों से बदसलूकी और पुलिस हिंसा के आरोपों की जांच करेगी

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Student Protest Case: देश की राजधानी में बीते 20 जुलाई को हुए व्यापक छात्र प्रदर्शनों और उसके बाद भड़की हिंसा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और नीतिगत फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की स्वतंत्र जांच के लिए गठित उच्चाधिकार प्राप्त जांच समिति (High Powered Enquiry Committee – HPEC) को जांच की प्राथमिकताएं तय कर दी हैं। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया है कि समिति सबसे पहले प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन के कथित उपयोग, महिला छात्राओं के साथ दुर्व्यवहार व हिंसा, पुलिसकर्मियों के घायल होने की परिस्थितियों और सार्वजनिक व निजी संपत्ति को पहुंचाए गए नुकसान की तथ्यात्मक पड़ताल करेगी।
न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि जांच समिति का मुख्य दायित्व केवल जमीनी तथ्यों को निष्पक्ष रूप से एकत्र कर अदालत की सहायता करना है। प्रदर्शन के दौरान कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा फेशियल रिकग्निशन तकनीक (FRT) के कथित इस्तेमाल और इससे जुड़े नागरिक स्वतंत्रता व निजता के व्यापक संवैधानिक प्रश्नों पर अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट स्वयं अपनी संविधान पीठ अथवा नियमित पीठ के माध्यम से करेगा। मामले की अगली महत्वपूर्ण सुनवाई 9 अक्टूबर 2026 को निर्धारित की गई है।

Student Protest Case: सुप्रीम कोर्ट ने तय किए HPEC की प्राथमिक जांच के चार मुख्य बिंदु

शीर्ष अदालत ने 10 सितंबर की सुनवाई के उपरांत जारी अपने विस्तृत दिशा-निर्देशों में हाई पावर्ड एनक्वायरी कमेटी के लिए चरणबद्ध जांच का एक ठोस खाका खींचा है। अदालत ने जांच के पहले चरण को चार प्राथमिक बिंदुओं तक सीमित रखने का निर्देश दिया है, ताकि सबसे गंभीर आरोपों की समयबद्ध जांच हो सके। इसमें पहला बिंदु प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए पैलेट गन जैसी घातक तकनीकों के प्रयोग की वैधता है। दूसरा बिंदु महिला प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिसिया बदसलूकी और शारीरिक उत्पीड़न के आरोपों की जांच करना है।
इसके साथ ही, अदालत ने संतुलन साधते हुए तीसरे और चौथे बिंदु के तहत उन परिस्थितियों की जांच को भी प्राथमिक सूची में रखा है जिनमें ड्यूटी पर तैनात कई पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए थे। साथ ही, प्रदर्शन के नाम पर दोनों पक्षों की ओर से की गई हिंसा और राष्ट्रीय राजधानी में सार्वजनिक संपत्तियों तथा वाहनों को पहुंचाए गए भारी नुकसान का भी विस्तृत ब्योरा जुटाया जाएगा। इस स्पष्ट आदेश से समिति की जांच को एक सुनिश्चित दिशा मिल गई है।

संवैधानिक सवालों और तकनीक के इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला रहेगा सर्वोपरि

छात्र आंदोलन से जुड़े इस मामले में पुलिसिया कार्रवाई के साथ-साथ राज्य द्वारा निगरानी तकनीकों के उपयोग पर भी गंभीर कानूनी विवाद खड़ा हुआ है। प्रदर्शनकारियों की ओर से आरोप लगाया गया था कि भीड़ को चिन्हित करने के लिए उन्नत फेशियल रिकग्निशन तकनीक का व्यापक और अनियंत्रित उपयोग किया गया, जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि जांच समिति को इन तकनीकी और संवैधानिक बहसों में उलझने की आवश्यकता नहीं है।
पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि सर्विलांस, बायोमेट्रिक डाटा संग्रहण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े व्यापक संवैधानिक व्याख्या के अधिकार केवल शीर्ष अदालत के पास सुरक्षित हैं। HPEC का दायित्व केवल यह देखना होगा कि मौके पर क्या घटनाएं घटीं, जबकि किसी तकनीक के इस्तेमाल की संवैधानिक वैधता पर फैसला सुप्रीम कोर्ट समय आने पर स्वयं करेगा।

समिति के पुनर्गठन की याचिका खारिज, गवाहों की गोपनीयता के लिए बनेगा डिजिटल पोर्टल

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय HPEC के पुनर्गठन की मांग उठाई गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि समिति में कुछ तकनीकी फेरबदल किए जाने चाहिए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि कार्य शुरू होने से पहले ही किसी न्यायिक समिति की निष्पक्षता पर संदेह करना अनुचित है। अदालत ने समिति से बिना किसी दबाव के पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाने की अपेक्षा की।
इसके अतिरिक्त, अदालत ने गवाहों की सुरक्षा को लेकर अत्यधिक संवेदनशीलता दिखाई। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि संवेदनशील गवाहों—विशेषकर उन छात्रों की पहचान को पूरी तरह गुप्त रखा जाए, जिन्हें धमकियों या प्रशासनिक दबाव का भय है। समिति को साक्ष्य संकलन के लिए एक सुरक्षित ऑनलाइन पोर्टल विकसित करने की अनुमति दी गई है, जहां आम नागरिक, छात्र और प्रत्यक्षदर्शी बिना अपनी पहचान सार्वजनिक किए वीडियो, फोटोग्राफ और दस्तावेज अपलोड कर सकेंगे।

14 वर्षीय नाबालिग छात्रा की सुरक्षा को लेकर दिल्ली पुलिस को सख्त निर्देश

कार्यवाही के दौरान प्रदर्शन में शामिल एक 14 वर्षीय नाबालिग छात्रा और उसके परिवार को लगातार मिल रही कथित धमकियों का मुद्दा भी अदालत के समक्ष पुरजोर तरीके से उठा। इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया कि वह पीड़ित छात्रा और उसके परिजनों की तत्काल सुरक्षा सुनिश्चित करे।
अदालत ने पुलिस आयुक्त को आदेश दिया कि धमकियों से जुड़ी शिकायतों की उच्चस्तरीय जांच की जाए और 9 अक्टूबर को होने वाली अगली सुनवाई में इस संबंध में एक सीलबंद स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए। न्यायालय ने स्पष्ट संदेश दिया कि जांच की प्रक्रिया के दौरान किसी भी गवाह या नाबालिग प्रदर्शनकारी को भयभीत करने का प्रयास बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

अमिकस क्यूरी की नियुक्ति और एफआईआर पर न्यायिक नियंत्रण

न्यायिक प्रक्रिया को सुचारू और पारदर्शी बनाए रखने के लिए शीर्ष अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. मोनिका गोंसाईं और एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड सी. सोलोमन को मामले में ‘अदालत का मित्र’ (Amicus Curiae) नियुक्त किया है। ये दोनों वरिष्ठ वकील सुप्रीम कोर्ट, जांच समिति, प्रदर्शनकारी छात्रों और दिल्ली पुलिस के बीच एक निष्पक्ष समन्वय सूत्र के रूप में कार्य करेंगे, जिससे साक्ष्यों और दस्तावेजों को अदालत के समक्ष व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया जा सके।
इसके साथ ही, अदालत ने किसी भी नए आपराधिक मुकदमे की शुरुआत को अपने सीधे नियंत्रण में रखा है। समिति केवल अपनी रिपोर्ट और अनुशंसाएं सौंपेगी, किंतु किसी भी दोषी के खिलाफ नई प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने या आपराधिक अभियोजन शुरू करने का अंतिम अधिकार सुप्रीम कोर्ट ने अपने पास सुरक्षित रखा है। इससे पूर्व अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली असाधारण शक्तियों का उपयोग करते हुए 20 से 25 जुलाई के दौरान दर्ज सभी पूर्ववर्ती एफआईआर पर अंतरिम रोक लगा दी थी, ताकि जांच बिना किसी पूर्वाग्रह के आगे बढ़ सके।

Student Protest Case: निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट द्वारा HPEC के लिए तय किया गया यह रोडमैप नागरिक अधिकारों की रक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के संतुलन का एक मजबूत न्यायिक उदाहरण है। पैलेट गन के इस्तेमाल और महिला प्रदर्शनकारियों पर कथित हिंसा को जांच की शीर्ष प्राथमिकता में रखकर अदालत ने यह साफ कर दिया है कि बल प्रयोग के अनुपातिकता के सिद्धांत की कड़ाई से समीक्षा की जाएगी, वहीं घायल सुरक्षाकर्मियों और सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की जांच से उपद्रवियों की जवाबदेही भी तय होगी। 9 अक्टूबर को समिति की प्रारंभिक रिपोर्ट और दिल्ली पुलिस के सुरक्षा हलफनामे पर होने वाली सुनवाई अब इस पूरे विवाद का भविष्य तय करेगी।
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