Somvar Pooja Vidhi: सोमवार को ऐसे करें भगवान शिव की पूजा, जानें जलाभिषेक से आरती तक की पूरी विधि
जलाभिषेक, बेलपत्र, मंत्र जाप और आरती की पूरी विधि जानें, साथ ही द्वितीया श्राद्ध के नियम भी पढ़ें
Somvar Pooja Vidhi: सनातन धर्म में सोमवार का दिन देवों के देव महादेव और माता पार्वती की उपासना के लिए सर्वोपरि माना गया है। शिव पुराण और वैदिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव आशुतोष हैं, जिसका अर्थ है कि वे अत्यंत शीघ्र और निश्छल भाव से की गई लघु पूजा से भी अपने भक्तों पर प्रसन्न हो जाते हैं। 28 सितंबर 2026 को पड़ने वाला सोमवार विशेष आध्यात्मिक महत्व रखता है क्योंकि इस दिन आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि है। पंचांगीय गणनाओं के अनुसार यह तिथि शाम 7 बजकर 13 मिनट तक प्रभावी रहेगी, जिसके चलते इस दिन भगवान शिव के पावन सोमवार व्रत के साथ-साथ पितृ पक्ष के द्वितीया श्राद्ध का भी पुण्य संयोग बन रहा है।
प्रातः 10 बजकर 16 मिनट तक बुध का रेवती नक्षत्र रहेगा और इसके उपरांत अश्विनी नक्षत्र का आरंभ होगा। इस विशिष्ट खगोलीय और धार्मिक अवसर पर जो साधक संपूर्ण विधि-विधान, स्वच्छता और एकाग्र चित्त से भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना और जलाभिषेक करते हैं, उनके समस्त ज्ञात-अज्ञात पापों का क्षय होता है और जीवन में मानसिक शांति, स्वास्थ्य एवं समृद्धि का वास होता है।
Somvar Pooja Vidhi: प्रातःकाल की तैयारी और संकल्प
सोमवार के पावन दिन शिव पूजन के लिए ब्रह्म मुहूर्त अथवा सूर्योदय के समय उठना सर्वोत्तम माना गया है। स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त होकर श्वेत अथवा हल्के रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए, क्योंकि भगवान शिव को सात्विक और सौम्य रंग अत्यंत प्रिय हैं। पूजा स्थल अथवा घर के मंदिर को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें और पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा अथवा ऊन के शुद्ध आसन पर बैठें।
पूजा का शुभारंभ आचमन और हाथ में जल, अक्षत व पुष्प लेकर संकल्प से करना चाहिए। संकल्प के दौरान साधक अपने नाम, गोत्र और दिन का स्मरण करते हुए भगवान शिव और माता पार्वती से अपने परिवार के कल्याण, मानसिक संतुलन और मनोकामना सिद्धि की विनम्र प्रार्थना करता है। यदि आप सोमवार का व्रत रख रहे हैं, तो संकल्प में निराहार अथवा फलाहार व्रत का स्पष्ट उल्लेख करें।
शिवलिंग पर जलाभिषेक की सही विधि: पतली धार और मंत्रोच्चार
शिव उपासना का सबसे प्रमुख और फलदायी अंग ‘जलाभिषेक’ है। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार शिवलिंग पर कभी भी बहुत तेजी से या सीधे पात्र उलटकर जल नहीं चढ़ाना चाहिए, बल्कि तांबे अथवा कांसे के पात्र से अत्यंत धीमी और निरंतर पतली धार बनाकर जल अर्पित करना चाहिए। जलाभिषेक करते समय मन ही मन “ॐ नमः शिवाय” अथवा “ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि hisवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥” (महामृत्युंजय मंत्र) का निरंतर जाप करते रहना चाहिए।
यदि संभव हो तो केवल सादे जल के स्थान पर पंचामृत (कच्चा गाय का दूध, दही, शुद्ध देसी घी, शहद और गंगाजल मिश्रित शर्करा) से क्रमवार अभिषेक करना अत्यंत मंगलकारी माना जाता है। दूध या पंचामृत अर्पित करने के पश्चात अंत में पुनः शुद्ध शीतल जल या गंगाजल की अविरल धार से शिवलिंग को पूरी तरह स्वच्छ किया जाता है। ऐसा करने से चंद्र दोष का निवारण होता है और मन की व्याकुलता दूर होती है।
क्या अर्पित करें और किन वस्तुओं से करें सख्त परहेज
अभिषेक के उपरांत शिवलिंग पर त्रिपुंड के रूप में श्वेत चंदन अथवा भस्म का लेप लगाना चाहिए। इसके बाद अनामिका उंगली से अखंडित अक्षत (बिना टूटे हुए चावल) अर्पित करें। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तीन पत्तियों वाला चिकना और बिना कटा-फटा ‘बेलपत्र’ उल्टा करके (चिकना भाग शिवलिंग की ओर) चढ़ाना चाहिए। इसके अतिरिक्त धतूरा, मदार (आक) के पुष्प, शमी पत्र और कनेर के फूल अर्पित करने से भगवान आशुतोष अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
शास्त्रों में शिव पूजा के दौरान कुछ वस्तुओं के प्रयोग का स्पष्ट निषेध किया गया है। शिवलिंग पर कभी भी तुलसी पत्र, सिंदूर, रोली, हल्दी और केतकी या केवड़े का फूल नहीं चढ़ाना चाहिए। इन पदार्थों को देवी उपासना के लिए शुभ माना गया है, किंतु वैरागी स्वरूप महादेव की पूजा में इनका उपयोग शास्त्र सम्मत नहीं है। साथ ही, दूध का अभिषेक कभी भी तांबे के लोटे से नहीं करना चाहिए; दूध के लिए पीतल, चांदी अथवा कांसे के पात्र का ही प्रयोग उचित है।
‘ॐ नमः शिवाय’ का ध्यान और षोडशोपचार पूजा
भगवान शिव संन्यास, ध्यान और योग के आदि गुरु हैं। इसलिए केवल बाह्य सामग्री अर्पित करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि पूजा के दौरान कुछ समय शांत बैठकर अंतरमन में ध्यान लगाना अनिवार्य है। शिवलिंग के सम्मुख गाय के शुद्ध घी का दीपक और सुगंधित धूपबत्ती प्रज्वलित करें। इसके पश्चात रुद्राक्ष की माला से कम से कम 108 बार पंचाक्षरी मंत्र “ॐ नमः शिवाय” का एकाग्रता से जप करें।
विस्तृत पूजा करने वाले साधक षोडशोपचार विधि के अंतर्गत आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, आरती और प्रदक्षिणा के 16 चरणों का पालन कर सकते हैं। नैवेद्य के रूप में मौसमी फल, सफेद मिष्ठान्न अथवा खीर का भोग लगाया जा सकता है। ध्यान रहे कि शिवलिंग की कभी भी पूरी परिक्रमा नहीं की जाती; जल प्रवाहित होने वाले मार्ग (सोमसूत्र या अरघा) को लांघना वर्जित है, इसलिए सदैव अर्ध-परिक्रमा ही करनी चाहिए।
शिव आरती और क्षमा प्रार्थना: पूजन का पूर्णाहुति चरण
पूजन और मंत्र जप के उपरांत कर्पूर अथवा घी के पंचमुखी दीपक से भगवान शिव और माता पार्वती की भावपूर्ण आरती की जाती है। आरती के समय ताली, घंटी और शंख की ध्वनि से पूरा वातावरण सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है। आरती संपन्न होने के बाद दोनों हाथों से आरती की लौ को स्पर्श कर अपने मस्तक और नेत्रों पर लगाना चाहिए।
पूजा के अंतिम चरण में अनजाने में हुई किसी भी भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना अनिवार्य होती है। साधक को हाथ जोड़कर यह प्रार्थना करनी चाहिए: “आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥” अर्थात् हे प्रभु, मैं न आपका आवाहन करना जानता हूँ और न विसर्जन, न ही मैं विधिपूर्वक पूजा करना जानता हूँ; अतः हे महादेव, मेरे समस्त अपराधों को क्षमा कर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें। इसके बाद प्रसाद को स्वयं ग्रहण कर परिवार के सभी सदस्यों में वितरित किया जाता है।
28 सितंबर को द्वितीया श्राद्ध का समन्वय: समय और नियम
28 सितंबर 2026 को सोमवार के साथ-साथ पितृ पक्ष का द्वितीया श्राद्ध भी पड़ रहा है। पंचांग के अनुसार इस दिन अपने उन पूर्वजों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है जिनका देहावसान किसी भी मास के कृष्ण अथवा शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को हुआ हो। श्राद्ध कर्म दोपहर के समय ही संपन्न किए जाते हैं, जिसके लिए 28 सितंबर को कुतुप मुहूर्त पूर्वाह्न 11:57 बजे से दोपहर 12:44 बजे तक, रौहिण मुहूर्त दोपहर 12:44 बजे से 1:32 बजे तक और अपराह्न काल दोपहर 1:32 बजे से 3:56 बजे तक रहेगा।
धार्मिक परंपराओं के अनुसार सुबह के समय भगवान शिव की नित्य पूजा और जलाभिषेक का कार्य पूर्ण कर लेना चाहिए। इसके उपरांत दोपहर के कुतुप अथवा रौहिण मुहूर्त में दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों के निमित्त काले तिल, कुशा और जल से तर्पण तथा पंचबलि (गाय, कुत्ता, कौवा, चींटी और देवता के लिए भोजन) निकालना चाहिए। शिव पूजन और पितृ तर्पण दोनों का एक ही दिन समन्वय होने से पितृ दोषों की शांति होती है और पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
Somvar Pooja Vidhi: आस्था, नियम और शुचिता से पाएं महादेव की कृपा
सोमवार का व्रत और शिव पूजन केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि मन को नियंत्रित करने, विकारों को भस्म करने और आत्मिक शांति प्राप्त करने का एक अत्यंत पावन मार्ग है। भगवान शिव को किसी बहुमूल्य उपहार या आडंबर की आवश्यकता नहीं है; वे मात्र एक लोटे शुद्ध जल और एक बेलपत्र से भी अपने भक्त के जीवन की समस्त दरिद्रता और संकटों का हरण कर लेते हैं।
28 सितंबर को जो भी भक्त अपनी दिनचर्या में स्वच्छता, संयम और सत्य का पालन करते हुए देवाधिदेव महादेव की शरण में जाएंगे, उन्हें मानसिक अवसादों से मुक्ति मिलेगी। पूजा के समय मन में किसी के प्रति द्वेष न रखें और अपनी कुल परंपरा के अनुसार सरल और निष्ठावान होकर भगवान शिव की अर्चना करें।
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