Social Media Addiction Brain Science, कॉल करने उठाया फोन और पहुंच गए रील्स पर? न्यूरोसाइकियाट्रिस्ट ने बताया दिमाग का यह खेल, जानें डोपामाइन रिवॉर्ड सिस्टम का पूरा सच
फोन उठाया और रील्स पर पहुंच गए? न्यूरोसाइकियाट्रिस्ट ने बताया सोशल मीडिया कैसे दिमाग को हाईजैक करता है, डोपामाइन का खेल
Social Media Addiction Brain Science: क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि किसी जरूरी काम के लिए फोन उठाया हो और अचानक खुद को इंस्टाग्राम की रील्स देखते या फेसबुक स्क्रॉल करते पाया हो? सीनियर न्यूरोसाइकियाट्रिस्ट डॉ. सुनील पवार के अनुसार इसमें आपकी कोई गलती नहीं है और यह बिल्कुल भी आपके अनुशासन या इच्छाशक्ति की कमजोरी नहीं है। इसके पीछे एक गहरा न्यूरोबायोलॉजिकल विज्ञान काम करता है जिसे समझना आज के डिजिटल युग में हर इंसान के लिए बेहद जरूरी है।
Social Media Addiction Brain Science: क्या है डोपामाइन रिवॉर्ड सिस्टम
हमारे मस्तिष्क में एक बेहद जटिल और शक्तिशाली तंत्र काम करता है जिसे न्यूरोबायोलॉजी की भाषा में डोपामाइन रिवॉर्ड सिस्टम कहते हैं। डोपामाइन एक न्यूरोट्रांसमीटर यानी रासायनिक संदेशवाहक है जो मस्तिष्क में उत्साह, खुशी और संतुष्टि की भावना उत्पन्न करता है। जब भी हम कोई ऐसी चीज देखते या अनुभव करते हैं जो हमें रोमांचक लगती है तो मस्तिष्क डोपामाइन रिलीज करता है। सोशल मीडिया पर हर नई रील, हर नया वायरल पोस्ट और हर नया नोटिफिकेशन मस्तिष्क में डोपामाइन की एक छोटी सी लहर पैदा करता है जो हमें बार-बार वापस खींचती है।
Social Media Addiction Brain Science: प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स और डोपामाइन की टकराहट
डॉ. सुनील पवार समझाते हैं कि हमारे मस्तिष्क का एक विशेष हिस्सा होता है जिसे प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स कहते हैं। यह हिस्सा हमारी तर्कशक्ति, योजना बनाने की क्षमता और आत्मनियंत्रण के लिए जिम्मेदार है। जब आप किसी जरूरी काम के लिए फोन उठाते हैं तो यही प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स आपको वह काम पूरा करने का निर्देश देता है। लेकिन परेशानी तब शुरू होती है जब दिमाग के अन्य हिस्से जो डोपामाइन यानी रोमांच और तात्कालिक संतुष्टि की तलाश करते हैं वे प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स पर हावी हो जाते हैं। जैसे ही फोन स्क्रीन पर कोई रंगीन नोटिफिकेशन या दिलचस्प थंबनेल दिखता है दिमाग का यह भाग तुरंत सक्रिय हो जाता है और मूल उद्देश्य पृष्ठभूमि में चला जाता है।
Social Media Addiction Brain Science: सोशल मीडिया ऐप्स की चालाक डिजाइनिंग
सोशल मीडिया ऐप्स को जानबूझकर इसी तरह से डिजाइन किया गया है कि उपयोगकर्ता उनमें अधिक से अधिक समय बिताए। इन ऐप्स में काम करने वाले मनोवैज्ञानिकों और डिजाइनरों की पूरी टीम होती है जो यह सुनिश्चित करती है कि हर नोटिफिकेशन, हर स्क्रॉल और हर लाइक मस्तिष्क में डोपामाइन की एक छोटी सी लहर पैदा करे। इनफाइनाइट स्क्रॉल यानी कभी न खत्म होने वाली फीड इसी सोच का नतीजा है। इसके अलावा लाल रंग के नोटिफिकेशन बैज जानबूझकर इसलिए लगाए जाते हैं क्योंकि लाल रंग मस्तिष्क में तात्कालिकता की भावना पैदा करता है। यह जानते हुए भी कि नोटिफिकेशन में कुछ खास नहीं है हम उसे देखने से खुद को रोक नहीं पाते।
Social Media Addiction Brain Science: बच्चों पर सबसे ज्यादा असर, ऑस्ट्रेलिया ने लगाया प्रतिबंध
दिमाग और सोशल मीडिया ऐप्स के इस खतरनाक तालमेल का सबसे बुरा असर बच्चों और किशोरों पर पड़ रहा है। उनका प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स अभी पूरी तरह विकसित नहीं होता जिससे उनके लिए आत्मनियंत्रण और भी मुश्किल होता है। इस कारण आजकल बच्चों के लिए पढ़ाई पर ध्यान लगाना बेहद कठिन हो गया है। इस समस्या की गंभीरता को देखते हुए ऑस्ट्रेलिया ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है और 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया ऐप्स के उपयोग पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। यह कदम दुनिया भर में डिजिटल लत की बढ़ती समस्या की ओर एक गंभीर संकेत है।
Social Media Addiction Brain Science: डिजिटल डिस्ट्रैक्शन से बचने के व्यावहारिक उपाय
विशेषज्ञों के अनुसार कुछ व्यावहारिक उपायों से इस समस्या पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। सबसे पहला और सबसे प्रभावी उपाय यह है कि फोन उठाने से पहले अपने मन में जरूरी काम को एक बार दोहराएं। मनोवैज्ञानिक इसे इंटेंशन सेटिंग कहते हैं। दूसरा उपाय है फोन से अनावश्यक ऐप्स के नोटिफिकेशन बंद कर दें। जो नोटिफिकेशन नहीं दिखेगा वह आपको भटका भी नहीं सकता। सोशल मीडिया ऐप्स को फोन के होम स्क्रीन से हटाकर किसी फोल्डर में रखें ताकि उन तक पहुंचने में थोड़ा अधिक समय लगे। यह छोटी सी बाधा भी कई बार भटकाव से बचाती है।
Social Media Addiction Brain Science: स्क्रीन टाइम को करें सीमित
स्मार्टफोन में मौजूद स्क्रीन टाइम या डिजिटल वेलबीइंग फीचर का उपयोग करें। इससे आप प्रत्येक ऐप के लिए एक निश्चित समय सीमा तय कर सकते हैं। जब यह सीमा पूरी हो जाएगी तो फोन आपको सूचित करेगा। दिन में एक निश्चित समय सोशल मीडिया के लिए तय करें और बाकी समय में उसे बंद रखें। सोने से एक घंटे पहले और सुबह उठने के पहले एक घंटे तक फोन का उपयोग न करने की आदत डालें। इससे नींद की गुणवत्ता भी बेहतर होती है।
Social Media Addiction Brain Science: मानसिक स्वास्थ्य पर असर को समझें
लंबे समय तक सोशल मीडिया की लत से मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। डिप्रेशन, एंग्जाइटी, एकाग्रता की कमी और नींद की समस्या इसके प्रमुख दुष्प्रभाव हैं। इसके अलावा दूसरों की जिंदगी से खुद की तुलना करना जो सोशल मीडिया पर बेहद आम है आत्मसम्मान को भी गहरी चोट पहुंचाता है। वास्तविक जीवन के रिश्तों और गतिविधियों में समय बिताएं। किताब पढ़ना, संगीत सुनना, व्यायाम करना या प्रकृति के बीच समय बिताना भी मस्तिष्क में डोपामाइन रिलीज करता है लेकिन इन गतिविधियों का असर स्थायी और सकारात्मक होता है।
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