Sanitary Pad Rash: सैनिटरी पैड की टॉप लेयर बढ़ा सकती है खुजली और रैशेज का खतरा: हर महिला को जाननी चाहिए डॉक्टरों की यह महत्वपूर्ण चेतावनी

हर महिला को जाननी चाहिए डॉक्टरों की यह महत्वपूर्ण चेतावनी

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Sanitary Pad Rash: आधुनिक समाज में महिलाओं के स्वास्थ्य और व्यक्तिगत स्वच्छता (मेन्स्ट्रुअल हाइजीन) को लेकर जागरूकता पहले के मुकाबले काफी बढ़ी है। बाजार में सैनिटरी नैपकिंस की बढ़ती उपलब्धता ने महिलाओं के जीवन को बेहद आसान और सुरक्षित बनाया है। लेकिन इसी बीच स्त्री रोग विशेषज्ञों (गायनेकोलॉजिस्ट्स) और त्वचा रोग विशेषज्ञों (डर्मेटोलॉजिस्ट्स) की एक हालिया और गंभीर चेतावनी ने देश भर की महिलाओं के बीच एक नई चिंता और बहस छेड़ दी है। डॉक्टरों के अनुसार, बाजार में मिलने वाले अधिकांश कमर्शियल सैनिटरी पैड्स की ‘टॉप लेयर’ (सबसे ऊपरी परत) में इस्तेमाल होने वाले सिंथेटिक मटेरियल्स, प्लास्टिक और ब्लीचिंग केमिकल्स महिलाओं की संवेदनशील त्वचा पर गंभीर खुजली, दर्दनाक रैशेज और योनि संक्रमण (वेजाइनल इंफेक्शन) का खतरा कई गुना बढ़ा रहे हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि पीरियड हाइजीन का मतलब केवल पैड का इस्तेमाल करना नहीं है, बल्कि यह जानना भी है कि आपके शरीर के सीधे संपर्क में आने वाले उत्पाद किस सामग्री से बने हैं। देश के बड़े सरकारी और निजी अस्पतालों की ओपीडी में हर महीने ऐसी हजारों लड़कियां और महिलाएं पहुंच रही हैं जो पीरियड्स के दौरान या उसके तुरंत बाद जांघों के आस-पास और संवेदनशील अंगों में त्वचा के छिलने, जलन और फंगल इंफेक्शन की शिकायत करती हैं। डॉक्टरों ने इस विषय पर खुलकर बात करने और सही सैनिटरी उत्पादों का चयन करने पर विशेष जोर दिया है। आइए जानते हैं कि पैड की टॉप लेयर आपकी सेहत को किस तरह प्रभावित करती है और इससे बचाव के सुरक्षित विकल्प क्या हैं।

क्या होती है सैनिटरी पैड की टॉप लेयर: प्लास्टिक और सिंथेटिक फाइबर्स का वो अदृश्य जाल

एक सैनिटरी पैड मुख्य रूप से तीन परतों से मिलकर बना होता है, जिसमें ‘टॉप लेयर’ वह सबसे ऊपरी परत होती है जो सीधे तौर पर महिला के नाजुक अंगों और त्वचा के संपर्क में चौबीस घंटे रहती है। बाजार में बिकने वाले लगभग 80 से 90 प्रतिशत पारंपरिक और लोकप्रिय पैड्स की यह ऊपरी परत पॉलीएथिलीन, पॉलीप्रोपाइलीन या अन्य सिंथेटिक प्लास्टिक फाइबर्स से बनी होती है। इन सिंथेटिक मटेरियल्स का उपयोग इसलिए किया जाता है ताकि यह पीरियड फ्लो (रक्त के बहाव) को बहुत तेजी से सोखकर पैड के अंदरूनी हिस्से में ट्रांसफर कर सके और ऊपरी सतह को छूने में सूखा (ड्राय-फील) बनाए रखे।

परंतु, चिकित्सा विज्ञान के दृष्टिकोण से यह ‘ड्राय-फील’ तकनीक संवेदनशील त्वचा के लिए अत्यंत नुकसानदेह साबित होती है। चूंकि यह परत मूल रूप से प्लास्टिक का एक रूप है, इसलिए यह उस हिस्से में हवा के प्राकृतिक प्रवाह (एयर वेंटिलेशन) को पूरी तरह से ब्लॉक यानी बंद कर देती है। पीरियड्स के दौरान उस हिस्से में पहले से ही नमी और शारीरिक तापमान अधिक होता है, और जब हवा पास नहीं होती, तो वहां अत्यधिक पसीना जमा होने लगता है। यह गर्म और नम वातावरण विभिन्न प्रकार के हानिकारक बैक्टीरिया और फंगस के पनपने के लिए एक आदर्श नर्सरी बन जाता है, जिससे त्वचा पर संक्रमण की शुरुआत होती है।

डॉक्टरों की गंभीर चेतावनी: सिंथेटिक परतों और खुशबूदार केमिकल्स से बढ़ता है वेजाइनल इंफेक्शन

स्त्री रोग विशेषज्ञों के अनुसार, सैनिटरी पैड के निर्माण में केवल प्लास्टिक ही नहीं, बल्कि उन्हें आकर्षक और सफेद बनाने के लिए कई तरह के रासायनिक यौगिकों का भी धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाता है। पैड के अवशोषक (एब्जॉर्बेंट) हिस्से को चमकीला सफेद बनाने के लिए क्लोरीन ब्लीचिंग की जाती है, जिससे अनजाने में ‘डाइऑक्सिन’ (Dioxin) नामक एक बेहद जहरीला उप-उत्पाद बनता है। यह डाइऑक्सिन अत्यंत सूक्ष्म मात्रा में भी त्वचा के रोमछिद्रों के माध्यम से शरीर के भीतर प्रवेश कर सकता है और लंबे समय में हार्मोनल असंतुलन या अन्य गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है।

इसके अलावा, पीरियड्स की प्राकृतिक गंध को छुपाने के लिए कई ब्रांड्स अपने पैड्स की टॉप लेयर में कृत्रिम सुगंध (परफ्यूम या डियोड्रेंट) और केमिकल जेल का बड़े पैमाने पर उपयोग करते हैं। डर्मेटोलॉजिस्ट्स का कहना है कि ये कृत्रिम सुगंधित रसायन संवेदनशील त्वचा के संपर्क में आते ही ‘कॉन्टैक्ट डर्मेटाइटिस’ यानी त्वचा की गंभीर एलर्जी को जन्म देते हैं। इसके कारण महिलाओं को असहनीय खुजली, त्वचा का लाल हो जाना, छोटे-छोटे दाने निकल आना और चलने-फिरने में तेज दर्द का सामना करना पड़ता है। डॉक्टर साफ चेतावनी देते हैं कि बाजार के विज्ञापनों में दिखने वाले ‘सुगंधित और 12 घंटे तक चलने वाले’ पैड्स के दावों से महिलाओं को पूरी तरह सावधान रहना चाहिए।

युवा लड़कियों पर इसका सबसे ज्यादा असर: स्कूल और कॉलेज में शर्मिंदगी और चुप्पी का संकट

इस स्वास्थ्य समस्या का सबसे बड़ा शिकार स्कूल और कॉलेज जाने वाली युवा लड़कियां और किशोरियां हो रही हैं। युवावस्था में त्वचा अत्यधिक संवेदनशील होती है, और जब ये लड़कियां पढ़ाई या कोचिंग के सिलसिले में लगातार 7 से 8 घंटे तक एक ही सैनिटरी पैड का इस्तेमाल करती हैं, तो पैड और जांघों के बीच होने वाले लगातार घर्षण (फ्रिक्शन) के कारण वहां की त्वचा पूरी तरह छिल जाती है। खेलकूद या शारीरिक रूप से सक्रिय रहने वाली लड़कियों में यह समस्या गर्मियों और उमस के मौसम में और अधिक भयावह रूप ले लेती है।

इससे भी बड़ी चुनौती हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था है, जहां आज भी मासिक धर्म (पीरियड्स) को एक वर्जित या शर्म का विषय माना जाता है। इस सामाजिक झिझक के कारण कई युवा लड़कियां अपनी मां, बड़ी बहन या डॉक्टर से इस असहनीय खुजली और रैशेज की समस्या को साझा नहीं करती हैं। वे चुपचाप इस दर्द को सहती रहती हैं, जिससे मामूली सी दिखने वाली यह एलर्जी बाद में एक गंभीर और क्रॉनिक योनि संक्रमण (जैसे बैक्टीरियल वेजिनोसिस या यीस्ट इंफेक्शन) का रूप ले लेती है। डॉक्टरों का कड़ा सुझाव है कि किसी भी लड़की को पैड बदलने में 4 से 6 घंटे से अधिक की देरी नहीं करनी चाहिए, चाहे फ्लो कम ही क्यों न हो।

सुरक्षित विकल्पों की ओर कदम: ऑर्गेनिक कॉटन, बांस आधारित पैड्स और मेंस्ट्रुअल कप्स का महत्व

इस वैश्विक और घरेलू स्वास्थ्य संकट को देखते हुए अब उपभोक्ता बाजार और चिकित्सा जगत में सुरक्षित व पर्यावरण के अनुकूल (इको-फ्रेंडली) विकल्पों की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है। डॉक्टरों की पहली पसंद अब ‘100% सर्टिफाइड ऑर्गेनिक कॉटन’ (शुद्ध सूती) से बने सैनिटरी पैड्स हैं। इन ऑर्गेनिक पैड्स की सबसे ऊपरी परत पूरी तरह से प्राकृतिक कपास से बनी होती है, जिसमें किसी भी प्रकार के प्लास्टिक, क्लोरीन ब्लीच या परफ्यूम का इस्तेमाल नहीं किया जाता। कॉटन की यह परत त्वचा को सांस लेने (ब्रीदेबिलिटी) की आजादी देती है, जिससे नमी जमा नहीं होती और रैशेज व खुजली का खतरा पूरी तरह समाप्त हो जाता है।

इसके अतिरिक्त, बाजार में अब बांस के फाइबर (बैम्बू बेस्ड) से बने सैनिटरी नैपकिंस भी उपलब्ध हैं, जिनमें प्राकृतिक रूप से एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं। जो महिलाएं पूरी तरह से कचरा मुक्त और अधिक सुरक्षित विकल्प चाहती हैं, उनके लिए ‘मेंस्ट्रुअल कप’ (Menstrual Cup) और दोबारा धोकर इस्तेमाल किए जा सकने वाले कॉटन क्लॉथ पैड्स (Cloth Pads) सबसे बेहतरीन आधुनिक साधन बनकर उभरे हैं। मेंस्ट्रुअल कप चिकित्सा-ग्रेड सिलिकॉन से बने होते हैं जो शरीर के भीतर रक्त को इकट्ठा करते हैं और त्वचा के संपर्क में न आने के कारण संक्रमण का खतरा शून्य कर देते हैं। महिलाओं को उत्पाद खरीदते समय पैड के पैकेट पर लिखे लेबल और सामग्रियों को ध्यान से पढ़ने की आदत डालनी चाहिए।

निष्कर्ष: स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और खुलकर बात करना ही हर महिला की सबसे बड़ी सुरक्षा है

 सैनिटरी पैड (Sanitary Pad Rash) की टॉप लेयर से होने वाले इन शारीरिक नुकसानों और रैशेज की समस्या को किसी भी महिला को एक सामान्य या मामूली बात समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। मासिक धर्म कोई बीमारी नहीं बल्कि एक अत्यंत पवित्र और स्वाभाविक जैविक प्रक्रिया है, और इस दौरान अपने शरीर की सुरक्षा व स्वच्छता सुनिश्चित करना हर महिला का बुनियादी अधिकार है। विज्ञापनों के बहकावे में आकर या केवल सस्ते दाम के चक्कर में सिंथेटिक और प्लास्टिक युक्त पैड्स का चुनाव करना आपके स्वास्थ्य पर बहुत भारी पड़ सकता है।

देश के नीति-निर्माताओं, स्कूलों और सामाजिक संस्थाओं को भी एकजुट होकर सेनेटरी हाइजीन और पैड्स की गुणवत्ता को लेकर बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाने होंगे, ताकि ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों की लड़कियां बिना किसी संकोच के अपने डॉक्टरों से इस विषय पर परामर्श ले सकें। सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत बांटे जाने वाले पैड्स में भी केवल उपलब्धता पर नहीं, बल्कि उनकी निर्माण सामग्री और क्वालिटी पर भी कड़ा नियंत्रण रखना होगा। याद रखें कि मासिक धर्म के दिनों में सही उत्पाद का चयन, नियमित रूप से पैड बदलना और स्वच्छता के नियमों का पालन करना ही आपकी सेहत, आत्मविश्वास और एक सुरक्षित भविष्य का सबसे मजबूत सुरक्षा कवच है।

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