Rahul Gandhi Citizenship Case: राहुल गांधी की नागरिकता याचिका खारिज, ब्रिटिश नागरिक होने के ठोस सबूत नहीं मिले

इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सका, अर्जी वापस लेने पर मामला खत्म

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Rahul Gandhi Citizenship Case: इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और रायबरेली से कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की भारतीय नागरिकता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता राहुल गांधी के ब्रिटिश नागरिक होने के अपने दावों के समर्थन में कोई भी ठोस या प्राथमिक साक्ष्य प्रस्तुत करने में पूरी तरह विफल रहा है।

अदालत के कड़े रुख और कानूनी दस्तावेजों के अभाव के चलते याचिकाकर्ता ने स्वयं याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसके बाद उच्च न्यायालय ने इसे ‘वापस ली गई’ मानते हुए औपचारिक रूप से खारिज कर दिया। यह न्यायिक आदेश कांग्रेस सांसद के लिए एक बड़ी विधिक राहत के रूप में देखा जा रहा है।

Rahul Gandhi Citizenship Case: अधिकार पृच्छा (Quo Warranto) रिट के जरिए संसद सदस्यता को दी गई थी चुनौती

अधिवक्ता अशोक पाण्डेय और एक अन्य व्यक्ति की ओर से दाखिल इस रिट याचिका में संविधान के तहत ‘अधिकार पृच्छा’ (Quo Warranto) रिट जारी करने की गुहार लगाई गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि राहुल गांधी (उर्फ राउल विंची) भारत के नागरिक नहीं हैं बल्कि उन्होंने ब्रिटेन की नागरिकता ग्रहण कर रखी है।

याचिका में दावा किया गया था कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 84 और 102 के प्रावधानों के तहत केवल भारतीय नागरिक ही संसद का सदस्य बनने के योग्य है। चूंकि याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि राहुल गांधी विदेशी नागरिकता रखते हैं, इसलिए उन्हें रायबरेली से लोकसभा सदस्य और नेता प्रतिपक्ष के पद पर बने रहने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।

ब्रिटेन की कंपनी बैकऑप्स लिमिटेड और कैम्ब्रिज का हवाला, पर दस्तावेज नदारद

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी ने वर्ष 2003 में ब्रिटेन में पंजीकृत कंपनी ‘बैकऑप्स लिमिटेड’ (BackOps Limited) के निगमन दस्तावेजों और वार्षिक रिटर्न में स्वयं को निदेशक व प्रमुख शेयरधारक बताते हुए अपनी राष्ट्रीयता ‘ब्रिटिश’ घोषित की थी। जब पीठ ने इस गंभीर आरोप से संबंधित अधिकृत दस्तावेज और ब्रिटेन के रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज (Companies House) का आधिकारिक रिकॉर्ड प्रस्तुत करने को कहा, तो याचिकाकर्ता कोई भी सत्यापित कागजात पेश नहीं कर सके।

याचिकाकर्ता की ओर से कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय का एक कथित पत्र पेश करने की कोशिश की गई, जिसमें ‘राउल विंची’ नामक व्यक्ति के अध्ययन का उल्लेख था। अदालत ने इस पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल किसी अनधिकृत पत्र या संदर्भ के आधार पर किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि की नागरिकता और राष्ट्रीय पहचान पर संदेह नहीं किया जा सकता। साक्ष्यों की यह शून्यता यह दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि याचिका बिना किसी ठोस कानूनी आधार के दायर की गई थी।

2015 और 2019 के पिछले आदेशों और नागरिकता अधिनियम का उल्लेख

अदालत ने सुनवाई के दौरान यह भी संज्ञान लिया कि इसी याचिकाकर्ता ने राहुल गांधी की नागरिकता को लेकर वर्ष 2015 और पुनः 2019 में भी उच्च न्यायालय में याचिकाएं दायर की थीं। वर्ष 2015 में हाईकोर्ट की समन्वय पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट व्यवस्था दी थी कि किसी भी भारतीय नागरिक की नागरिकता की जांच या समाप्ति से संबंधित विवादों के निस्तारण का विशेष क्षेत्राधिकार नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 9(2) के तहत केंद्र सरकार (गृह मंत्रालय) के पास सुरक्षित है।

इसके बाद 2019 में भी अदालत ने संबंधित पक्षों को सीधे न्यायिक हस्तक्षेप के बजाय सक्षम प्राधिकारी यानी केंद्र सरकार के समक्ष वैधानिक प्रत्यावेदन (Representation) दाखिल करने की छूट दी थी। निर्धारित विधिक प्रक्रिया का पालन किए बिना सीधे उच्च न्यायालय का रुख करने और बिना किसी साक्ष्य के बार-बार वही मामला उठाने पर पीठ ने असंतोष जताया, जिसके उपरांत याचिकाकर्ता ने अर्जी वापस लेने में ही भलाई समझी।

Rahul Gandhi Citizenship Case: संसदीय पद सुरक्षित, राजनीतिक आरोपों पर कानूनी विराम

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस निर्णय के बाद राहुल गांधी की संसद सदस्यता और नेता प्रतिपक्ष के पद को लेकर चल रहा विधिक संशय समाप्त हो गया है। कांग्रेस पार्टी ने अदालत के फैसले का स्वागत करते हुए इसे राजनीतिक विद्वेष से प्रेरित और आधारहीन अभियानों की कानूनी विफलता करार दिया है।

विधि विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि अदालतों का समय ऐसे संवेदनशील और राजनीतिक रूप से प्रेरित मामलों में बिना किसी ठोस दस्तावेजी प्रमाण के बर्बाद नहीं किया जा सकता। नागरिकता जैसे महत्वपूर्ण विषय पर संविधान और नागरिकता कानून के तहत निर्धारित विधिक प्रक्रियाओं का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है।

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