Nepal Flood Death Toll: 1,127 से ज्यादा मौतें, 4,800+ लापता; भारत का राहत अभियान तेज
भोटेकोशी-त्रिशूली बाढ़ से भारी नुकसान, राहत और रेस्क्यू अभियान के बीच नए फ्लैश फ्लड का खतरा
Nepal Flood Death Toll: नेपाल के पर्वतीय इलाकों में 26 अगस्त को भोटेकोशी और त्रिशूली नदी घाटी में आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड (आकस्मिक बाढ़) और भूस्खलन की विभीषिका के सात दिन पूरे हो चुके हैं, लेकिन तबाही का भयावह मंजर अब भी कम होने का नाम नहीं ले रहा है। आधिकारिक और आपदा प्रबंधन के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, इस महाप्रलय में अब तक 1,127 से अधिक लोगों के मारे जाने की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 4,858 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। तिब्बत की सीमा में हुई 16 मौतों को मिलाकर यह कुल आंकड़ा 1,143 के पार पहुंच चुका है।
नेपाल रेड क्रॉस के अनुसार, 17 नगरपालिकाओं में लगभग 90,000 से अधिक लोग सीधे तौर पर इस आपदा से बेघर और प्रभावित हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की प्राथमिक मूल्यांकन रिपोर्ट बताती है कि सैलाब के साथ बहकर आए विशालकाय पत्थरों, गाद, मकानों और पेड़ों से करीब 22 लाख टन मलबा इकट्ठा हो गया है, जिसने नदी घाटियों का नक्शा पूरी तरह बदल दिया है।
Nepal Flood Death Toll: चितवन, नवलपरासी और नुवाकोट में भारी जनहानि, सैकड़ों शव बरामद
इस प्राकृतिक आपदा ने नेपाल के मैदानी और मध्य-पहाड़ी दोनों क्षेत्रों में भारी विनाश किया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, सबसे अधिक तबाही चितवन जिले में दर्ज की गई है जहां 321 शव बरामद किए जा चुके हैं। नवलपरासी पूर्व में 216 और नवलपरासी पश्चिम में 170 मौतों की पुष्टि हुई है।
नुवाकोट जिले के बेतरावती में एक पूरे शॉपिंग आर्केड के मलबे में तब्दील हो जाने के बाद वहां से 24 शव निकाले गए, जिनमें 13 महिलाएं, 10 पुरुष और एक बच्चा शामिल था। आपदा के बाद अब तक सुरक्षा बलों और स्वयंसेवकों ने 12,000 से अधिक फंसे हुए लोगों को सुरक्षित निकाला है, लेकिन दूरदराज के पर्वतीय इलाकों से सड़क और संचार संपर्क पूरी तरह टूट जाने के कारण हताहतों का सटीक आंकड़ा जुटाने में भारी बाधाएं आ रही हैं।
रसुवागढ़ी इमिग्रेशन ऑफिस बहा, हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की सुरंगों में फंसे सैकड़ों कर्मी
बाढ़ के शुरुआती घंटों में ही भोटेकोशी नदी के उफान ने चीन-नेपाल सीमा पर स्थित प्रमुख रसुवागढ़ी इमिग्रेशन कार्यालय को पूरी तरह बहा दिया। बताया जाता है कि जिस समय पानी का सैलाब आया, वहां 300 से 400 यात्री, व्यापारी और चालक मौजूद थे। कार्यालय प्रमुख सहित चार आव्रजन अधिकारी लापता हो गए थे, जिनमें से एक का शव कई किलोमीटर दूर नदी के निचले बहाव क्षेत्र से बरामद किया गया।
त्रिशूली नदी पर बने विभिन्न जलविद्युत (हाइड्रोपावर) संयंत्रों की स्थिति अत्यंत नाजुक बनी हुई है। भारी मलबे और गाद के कारण सुरंगों के मुहाने पूरी तरह बंद हो गए हैं, जिससे विभिन्न टनलों में लगभग 639 इंजीनियर, तकनीकी विशेषज्ञ और मजदूर फंसे हुए हैं। नेपाली सेना की तकनीकी इकाइयों के साथ भारत, चीन और दक्षिण कोरिया के विशेषज्ञ कंट्रोल ब्लास्टिंग और अत्याधुनिक सेंसर उपकरणों की मदद से इन टनलों तक पहुंच मार्ग बनाने में दिन-रात जुटे हैं।
अस्पतालों और शवगृहों में जगह नहीं, डीएनए सैंपलिंग के बाद सामूहिक दफन
शवों की बढ़ती संख्या और भीषण उमस व कीचड़ के कारण शवों के क्षत-विक्षत होने से काठमांडू और आसपास के सभी शवगृहों की क्षमता समाप्त हो गई है। संक्रमण फैलने के खतरे को देखते हुए प्रशासन को अज्ञात शवों को अस्थायी रूप से सामूहिक रूप से दफनाने का कठिन निर्णय लेना पड़ा है।
काठमांडू के गोकर्णा फॉरेस्ट रिजॉर्ट के पास जेसीबी मशीनों की मदद से बड़े ट्रेंच खोदे गए और 75 शवों को बैच नंबर के साथ दफनाया गया। इससे पूर्व अन्य चार स्थानों पर 200 से अधिक शवों का अंतिम संस्कार किया जा चुका है। प्रशासन ने सभी अज्ञात शवों के डीएनए नमूने, चेहरे के फोटोग्राफ और विशिष्ट पहचान चिह्न सुरक्षित रख लिए हैं, ताकि भविष्य में परिजनों के आने पर कानूनी पहचान और दावों का निपटारा किया जा सके।
275 से अधिक भारतीय लापता, विदेशियों की तलाश में सर्च ऑपरेशन
लापता लोगों में विदेशी नागरिकों की तादाद 583 के पार है, जिनमें सबसे बड़ा हिस्सा भारतीय नागरिकों का है। भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) और काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास के अनुसार, अब तक 163 भारतीय पर्यटकों व कामगारों को सुरक्षित रेस्क्यू किया जा चुका है। हालांकि, अब भी 275 से अधिक भारतीय नागरिक और 128 भारतीय मूल के लोग लापता अथवा परिजनों के संपर्क से बाहर हैं।
इसके अलावा चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और इटली के नागरिक भी लापता सूची में शामिल हैं, जो या तो ट्रैकिंग व पर्यटन पर थे या हाइड्रो प्रोजेक्ट्स में कार्यरत थे। रसुवागढ़ी में सुबह 8:35 बजे अंतिम आव्रजन प्रविष्टि दर्ज हुई थी और ठीक दस मिनट बाद 8:45 बजे आई प्रलयंकारी लहर ने सब कुछ लील लिया।
भारत का ‘ऑपरेशन सद्भाव’: विमानों से पहुंची राहत सामग्री और विशेष टीमें
संकट की इस घड़ी में भारत ने पड़ोसी धर्म निभाते हुए त्वरित स्तर पर व्यापक मानवीय सहायता उपलब्ध कराई है। भारतीय वायुसेना के विशेष विमान निरंतर राहत सामग्री, पोर्टेबल संचार उपकरण, टेंट और जीवनरक्षक दवाइयां लेकर काठमांडू पहुंच रहे हैं।
हाल ही में पांचवां भारतीय विमान 11 सदस्यीय विशेषज्ञ रेस्क्यू दल, मलबे को हटाने वाले कटिंग उपकरण और 5.5 टन आवश्यक एंटीबायोटिक्स व सर्जिकल सामग्री लेकर त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरा। भारत की ओर से सीमावर्ती क्षतिग्रस्त रास्तों पर संपर्क बहाल करने के लिए बेली ब्रिज कंपोनेंट्स और टनल रेस्क्यू में विशेषज्ञता रखने वाले सैन्य इंजीनियरों को भी तैनात किया गया है। अब तक भारत कई दर्जन टन राहत सामग्री नेपाल सरकार को सौंप चुका है।
Nepal Flood Death Toll: नए अलर्ट से बढ़ी चिंता, यूएन में क्लाइमेट जस्टिस उठाने का दबाव
नेपाल के जल और मौसम विज्ञान विभाग ने एक नया चेतावनी बुलेटिन जारी कर नुवाकोट, रसुवा और धाडिंग जिलों की सहायक नदियों में दोबारा जलस्तर बढ़ने और नई फ्लैश फ्लड आने की आशंका जताई है। तिब्बत की ओर बने एक प्राकृतिक अस्थाई अवरोध के कमजोर पड़ने की खबरों ने नदी तटों पर रहने वाले लोगों के बीच डर और बढ़ा दिया है।
इधर, काठमांडू के राजनीतिक गलियारों में प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह पर आगामी संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में स्वयं जाकर नेपाल के लिए ‘क्लाइमेट जस्टिस’ (जलवायु न्याय) की मांग करने का दबाव बढ़ रहा है। सत्तारूढ़ दलों का तर्क है कि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में नगण्य योगदान के बावजूद नेपाल को हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने और मौसमी असंतुलन की सर्वाधिक विनाशकारी कीमत चुकानी पड़ रही है, जिसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष पुनर्वास पैकेज और जलवायु वित्तपोषण अनिवार्य किया जाना चाहिए।
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