PM Modi video removed: पीएम मोदी का वीडियो हटाने पर संसदीय समिति सख्त, मार्क जुकरबर्ग को माफी मांगने की चेतावनी; सेफ हार्बर क्लॉज हटाने का अल्टीमेटम
मार्क जुकरबर्ग से माफी की मांग, सेफ हार्बर क्लॉज हटाने की चेतावनी, 10 दिन का समय
PM Modi video removed: फेसबुक पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वीडियो अस्थायी रूप से हटाए जाने के मामले ने बड़ा राजनीतिक और कानूनी रूप ले लिया है। सूचना और प्रौद्योगिकी संबंधी संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष और भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने इस घटना पर गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए मेटा के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग से व्यक्तिगत माफी की मांग की है। समिति ने स्पष्ट किया कि यदि जुकरबर्ग व्यक्तिगत रूप से माफी नहीं मांगते हैं, तो सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 के तहत मेटा को प्राप्त ‘सेफ हार्बर’ (Safe Harbour) सुरक्षा वापस ली जा सकती है।
समिति की बैठक में मेटा के अधिकारियों ने स्वीकार किया कि यह वीडियो लगभग पांच घंटे (रात 12:30 बजे से सुबह 5:00 बजे तक) तक प्लेटफॉर्म से नदारद रहा। हालांकि मेटा ने इसे तकनीकी त्रुटि बताते हुए खेद व्यक्त किया, लेकिन समिति ने इसे अपर्याप्त मानते हुए कहा कि देश के शीर्ष नेतृत्व के वीडियो के साथ ऐसी लापरवाही बेहद गंभीर है और इसके लिए शीर्ष स्तर से जवाबदेही तय होना आवश्यक है।
PM Modi video removed: सेफ हार्बर क्लॉज का महत्व और इसे हटाने के मायने
भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी कानून (IT Act) की धारा 79 सोशल मीडिया मध्यस्थों (Intermediaries) को ‘सेफ हार्बर’ सुरक्षा प्रदान करती है। इस कानूनी प्रावधान के तहत यदि कोई तीसरा पक्ष (यूजर) प्लेटफॉर्म पर कोई आपत्तिजनक या गैर-कानूनी सामग्री पोस्ट करता है, तो उसके लिए सोशल मीडिया कंपनी या उसके अधिकारियों को सीधे कानूनी रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
यदि सरकार मेटा या अन्य कंपनियों से यह सुरक्षा वापस ले लेती है, तो प्लेटफॉर्म पर पोस्ट होने वाली हर सामग्री की सीधी आपराधिक और नागरिक कानूनी जिम्मेदारी कंपनी के अधिकारियों पर आ जाएगी। इससे भारतीय पुलिस और जांच एजेंसियां सीधे अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज कर कानूनी कार्रवाई कर सकेंगी। समिति का मानना है कि एल्गोरिदम की आड़ में राष्ट्रीय महत्व की सामग्रियों को ब्लॉक करना और आपत्तिजनक पोस्टों पर कार्रवाई न करना सेफ हार्बर के नियमों का उल्लंघन है।
आपत्तिजनक सामग्री, बाल यौन शोषण और महिलाओं की सुरक्षा पर कड़े निर्देश
संसदीय समिति ने केवल प्रधानमंत्री के वीडियो तक ही अपनी जांच को सीमित नहीं रखा, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर मौजूद संवेदनशील सामग्रियों का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया। समिति ने मेटा (फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप), गूगल, यूट्यूब, एक्स और स्नैपचैट जैसी प्रमुख टेक कंपनियों को निर्देश दिया है कि बच्चों के यौन शोषण (CSAM) और महिलाओं से जुड़ी आपत्तिजनक व अश्लील सामग्री को तीन दिनों के भीतर हटा दिया जाए।
समिति ने चिंता जताई कि प्लेटफॉर्म एक तरफ तो सार्वजनिक हित के कंटेंट को एल्गोरिदम की गलती बताकर हटा देते हैं, वहीं दूसरी तरफ बाल यौन दुर्व्यवहार और महिलाओं के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देने वाली सामग्री पर तुरंत कार्रवाई करने में विफल रहते हैं। सरकारी निर्देशों और गृह मंत्रालय व आईटी मंत्रालय की चेतावनियों की अनदेखी करने पर समिति ने सख्त रवैया अपनाया है।
तेलंगाना पुलिस की एफआईआर और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही
इस पूरे घटनाक्रम के बीच तेलंगाना पुलिस द्वारा मेटा और गूगल ऐप्स के खिलाफ दर्ज की गई एफआईआर ने टेक दिग्गजों की कानूनी अड़चनों को और बढ़ा दिया है। फर्जी वित्तीय ऐप्स, साइबर धोखाधड़ी और पीएम मोदी के डीपफेक या विवादित वीडियो प्रसारित करने के मामलों को लेकर यह कार्रवाई की गई है।
संसदीय बैठक के दौरान विपक्षी सांसदों ने विचार-विमर्श में हिस्सा लेते हुए यह राय जरूर रखी कि असहमति और व्यंग्य को अपराध या देशद्रोह के दायरे में नहीं रखा जाना चाहिए। हालांकि, सभी सदस्य इस बात पर एकमत दिखे कि प्रधानमंत्री के आधिकारिक वीडियो को हटाना एक बहुत बड़ा सुरक्षा और अनुपालन लैप्स (Compliance Lapse) है, जिसके लिए सख्त ऑडिट ट्रेल और लिखित जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
PM Modi video removed: भविष्य की राह और टेक कंपनियों पर असर
संसदीय पैनल ने मेटा को 10 दिनों के भीतर पूरे मामले का लिखित जवाब और विस्तृत ऑडिट रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया है। यदि जुकरबर्ग की तरफ से औपचारिक माफी नहीं आती है या टेक कंपनियां निर्धारित समयसीमा में आपत्तिजनक सामग्री को हटाने में विफल रहती हैं, तो संसद सरकार को सेफ हार्बर क्लॉज में संशोधन या इसे वापस लेने की सिफारिश कर सकती है।
यह पूरा विवाद भारत की डिजिटल संप्रभुता (Digital Sovereignty) और वैश्विक टेक कंपनियों की कार्यप्रणाली के बीच बढ़ते तनाव को दर्शाता है। इस मामले का नतीजा न केवल मेटा, बल्कि भारत में काम कर रही सभी अंतरराष्ट्रीय सोशल मीडिया और टेक कंपनियों के लिए एक बड़ा नज़ीर बनेगा, जिससे देश में डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के नियमन का भविष्य तय होगा।
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