National Handloom Day 2026: राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी की अपील, स्थानीय कपड़े पहनें और जीआरडब्ल्यूएम ट्रेंड अपनाएं
GRWM ट्रेंड अपनाकर स्थानीय हथकरघा उत्पादों को बढ़ावा देने की देशवासियों से अपील
National Handloom Day 2026: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के मौके पर देशवासियों से विशेष अपील की है। उन्होंने कहा कि लोग स्थानीय कपड़े पहनें और सोशल मीडिया पर ‘गेट रेडी विद मी’ यानी जीआरडब्ल्यूएम ट्रेंड को अपनाकर भारत की हथकरघा विविधता को लोकप्रिय बनाएं। प्रधानमंत्री ने एक्स प्लेटफॉर्म पर पोस्ट कर नागरिकों से आग्रह किया कि वे अपने पसंदीदा हथकरघा उत्पादों के वीडियो साझा करें और हैशटैग नेशनल हैंडलूम डे का इस्तेमाल जरूर करें।
सात अगस्त को हर साल राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाया जाता है। इस दिन का मकसद देश की पारंपरिक बुनाई कला को बढ़ावा देना, बुनकरों के योगदान को सम्मानित करना और युवा पीढ़ी को स्वदेशी कपड़ों से जोड़ना है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में स्पष्ट कहा कि स्थानीय कपड़े पहनना सिर्फ फैशन नहीं बल्कि सांस्कृतिक गर्व और आर्थिक सशक्तिकरण का माध्यम भी है। उन्होंने डिजिटल प्लेटफॉर्म की ताकत का इस्तेमाल करने की बात कही ताकि हथकरघा उत्पादों की पहुंच देश-विदेश तक बढ़े।
National Handloom Day 2026: प्रधानमंत्री का संदेश और जीआरडब्ल्यूएम ट्रेंड का महत्व
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर सोशल मीडिया के जरिए देशवासियों से सीधा संवाद किया। उन्होंने लिखा कि सात अगस्त राष्ट्रीय हथकरघा दिवस है और हमें भारत की हथकरघा विविधता को लोकप्रिय बनाना चाहिए। उन्होंने खासतौर पर जीआरडब्ल्यूएम वीडियो बनाने और साझा करने की अपील की। जीआरडब्ल्यूएम यानी गेट रेडी विद मी एक लोकप्रिय ट्रेंड है जिसमें लोग अपनी तैयारी का वीडियो बनाकर दिखाते हैं कि वे क्या पहन रहे हैं। प्रधानमंत्री चाहते हैं कि लोग हथकरघा साड़ियों, शर्ट, दुपट्टे या अन्य उत्पादों को पहनकर ऐसे वीडियो बनाएं और हैशटैग के साथ पोस्ट करें। इससे न सिर्फ जागरूकता बढ़ेगी बल्कि कारीगरों के उत्पादों की मांग भी बढ़ेगी।
यह अपील इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज की युवा पीढ़ी सोशल मीडिया से काफी प्रभावित होती है। अगर युवा स्थानीय कपड़ों को ट्रेंडी तरीके से पेश करें तो हथकरघा उद्योग को नई पहचान मिल सकती है। प्रधानमंत्री का यह आह्वान मेक इन इंडिया और वोकल फॉर लोकल की भावना को भी मजबूत करता है। उन्होंने पहले भी कई मौकों पर स्वदेशी उत्पादों को अपनाने की बात कही है। इस बार उन्होंने डिजिटल भागीदारी पर जोर देकर एक नया आयाम जोड़ा है।
कपड़ा मंत्रालय का 12वां राष्ट्रीय हथकरघा दिवस समारोह
कपड़ा मंत्रालय सात अगस्त को नई दिल्ली के राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र में 12वें राष्ट्रीय हथकरघा दिवस का भव्य आयोजन कर रहा है। इस समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगी। केंद्रीय कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह, कपड़ा राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा, सचिव नीलम शमी राव और विकास आयुक्त हथकरघा डॉ. एम. बीना भी मौजूद रहेंगी। कार्यक्रम में हथकरघा बुनकर समुदाय के योगदान को मान्यता दी जाएगी और भारत की समृद्ध विरासत को प्रदर्शित किया जाएगा।
इस अवसर पर संत कबीर हथकरघा पुरस्कार और राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार 2025 वितरित किए जाएंगे। कुल 22 पुरस्कार दिए जाएंगे जिनमें तीन संत कबीर हथकरघा पुरस्कार और 19 राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार शामिल हैं। इन पुरस्कारों से उन बुनकरों को सम्मानित किया जाएगा जिन्होंने शिल्प कौशल, नवाचार और पारंपरिक कलाओं के संरक्षण में उल्लेखनीय योगदान दिया है। पुरस्कार विजेता अपने परिवार के सदस्यों के साथ समारोह में शामिल होंगे। देश भर के हथकरघा बुनकर, चयन समिति के सदस्य, क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ, वरिष्ठ अधिकारी और मीडिया प्रतिनिधि भी मौजूद रहेंगे।
पुरस्कार, प्रदर्शनी और स्मारक डाक टिकट
समारोह के दौरान चार स्मारक डाक टिकट भी जारी किए जाएंगे जो भारत की विविध हथकरघा बुनाई परंपराओं का जश्न मनाएंगे। इसके अलावा अर्थ रूट थ्रेड नामक पुस्तक का अनावरण होगा जो सेंट्रल इंडिया के आल डाई हथकरघा वस्त्रों पर आधारित है। हथकरघा पुरस्कार पुस्तक 2025 का भी विमोचन किया जाएगा। पुरस्कार विजेता उत्पादों की प्रदर्शनी लगाई जाएगी जहां आगंतुक पारंपरिक कानी बुनाई और दीवार पर टांगने वाले आभूषणों की बुनाई को करीब से देख सकेंगे।
ये आयोजन सिर्फ औपचारिक नहीं बल्कि हथकरघा क्षेत्र की जीवंतता को दिखाने वाले हैं। देश के अलग-अलग राज्यों की हैंडलूम साड़ियां अपनी खास पहचान रखती हैं। बनारसी, कांजीवरम, चंदेरी, पटोल, मकालम, कोटा डोरिया जैसी साड़ियां सिर्फ कपड़े नहीं बल्कि कला के नमूने हैं। ऐसे कार्यक्रमों से इन कलाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर मिलता है।
हथकरघा क्षेत्र की आर्थिक और सामाजिक भूमिका
भारत का हथकरघा क्षेत्र करीब 35 लाख लोगों की आजीविका का साधन है। इनमें 70 प्रतिशत से अधिक महिलाएं हैं। यह क्षेत्र न सिर्फ रोजगार देता है बल्कि पर्यावरण के अनुकूल उत्पादन पद्धतियों को भी बढ़ावा देता है। मशीनों की तुलना में हथकरघा बुनाई कम ऊर्जा खर्च करती है और प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल ज्यादा होता है। इससे पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान मिलता है।
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस की शुरुआत 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चेन्नई से की थी। तब से हर साल यह दिवस बुनकरों की कलात्मकता, कौशल और समर्पण का जश्न मनाने का अवसर बन गया है। यह दिन 1905 के स्वदेशी आंदोलन की याद भी दिलाता है जब विदेशी कपड़ों के बहिष्कार और स्वदेशी उद्योगों को बढ़ावा देने का आह्वान किया गया था। उस आंदोलन ने हथकरघा क्षेत्र को नई गति दी थी। आज भी यह दिवस उसी भावना को जीवित रखता है।
गुजरात सहित राज्यों का योगदान
गुजरात हथकरघा शिल्प कौशल के प्रमुख केंद्रों में से एक है। यहां बुनाई राज्य की संस्कृति और आजीविका से गहराई से जुड़ी है। पटोला और कच्छ बुनाई को अमेरिका, यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया और मध्य पूर्व में पहचान मिली है। अंतरराष्ट्रीय डिजाइनर और हस्तियां भी इन उत्पादों को पसंद कर रही हैं। सरकारी सहयोग, आधुनिक डिजाइन और बेहतर मार्केटिंग के कारण यह क्षेत्र 12 हजार से अधिक बुनकरों और कारीगरों को रोजगार दे रहा है। हाल के वर्षों में इस क्षेत्र का कारोबार 51 करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है। इससे गुजरात की सांस्कृतिक विरासत और आर्थिक क्षमता दोनों मजबूत हो रही है।
अन्य राज्यों में भी हथकरघा की अपनी खासियत है। उत्तर प्रदेश की बनारसी साड़ी, तमिलनाडु की कांजीवरम, मध्य प्रदेश की चंदेरी, राजस्थान की कोटा डोरिया, असम की मुगा और पश्चिम बंगाल की जामदानी साड़ी दुनिया भर में प्रशंसा पाती हैं। इन उत्पादों को बढ़ावा देने से न सिर्फ कारीगरों की आय बढ़ेगी बल्कि पर्यटन और निर्यात को भी बल मिलेगा।
युवाओं और डिजिटल माध्यम की भूमिका
प्रधानमंत्री मोदी की जीआरडब्ल्यूएम अपील युवाओं को सीधे संबोधित करती है। आजकल सोशल मीडिया पर फैशन ट्रेंड तेजी से फैलते हैं। अगर युवा हथकरघा कपड़ों को स्टाइलिश तरीके से पेश करें तो यह उद्योग मुख्यधारा में आ सकता है। कई डिजाइनर पहले से ही हथकरघा को मॉडर्न कट और डिजाइनों में ढाल रहे हैं। इससे पारंपरिक कला आधुनिक बाजार से जुड़ रही है।
सरकार भी कई योजनाओं के जरिए बुनकरों को सहायता दे रही है। कौशल विकास, वित्तीय सहायता, बाजार उपलब्धता और डिजाइन इनोवेशन पर फोकस किया जा रहा है। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस ऐसे प्रयासों को और मजबूत करने का अवसर है। जब आम नागरिक स्थानीय कपड़े पहनेंगे तो मांग बढ़ेगी और कारीगरों को सही दाम मिलेगा।
National Handloom Day 2026: सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण
हथकरघा सिर्फ आर्थिक गतिविधि नहीं बल्कि सांस्कृतिक धरोहर है। पीढ़ियों से चली आ रही यह कला परिवारों में हस्तांतरित होती रही है। कई परिवारों में बुनाई ही मुख्य पेशा है। इस कला को बचाना और आगे बढ़ाना जरूरी है। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस उन कुशल हाथों को सम्मान देने का दिन है जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी इस विरासत को जिंदा रखा।
प्रधानमंत्री का आह्वान याद दिलाता है कि विकास की राह में अपनी जड़ों को नहीं भूलना चाहिए। स्थानीय उत्पादों को अपनाना आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण कदम है। जब लोग हथकरघा साड़ी, कुर्ता या स्कार्फ पहनकर सोशल मीडिया पर वीडियो साझा करेंगे तो यह सिर्फ एक ट्रेंड नहीं बल्कि सामूहिक अभियान बन जाएगा।
इस वर्ष का राष्ट्रीय हथकरघा दिवस समारोह और प्रधानमंत्री का संदेश दोनों मिलकर एक मजबूत संदेश दे रहे हैं। स्थानीय कपड़े पहनें, कारीगरों का सम्मान करें और डिजिटल माध्यम से इस कला को दुनिया तक पहुंचाएं। यही इस दिवस की सच्ची भावना है। देशवासी अगर इस अपील पर अमल करें तो हथकरघा क्षेत्र नई ऊंचाइयों को छू सकता है और भारत की सांस्कृतिक पहचान और मजबूत हो सकती है।
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