RAW 58th Anniversary: जब भारत रोज सुनता था पाकिस्तानी राष्ट्रपति याह्या खान की हर बातचीत
RAW 58th Anniversary: जब भारत रोज सुनता था पाकिस्तानी राष्ट्रपति याह्या खान की हर बातचीत
RAW 58th Anniversary: भारत की सबसे गोपनीय और ताकतवर खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग, जिसे आमतौर पर रॉ के नाम से जाना जाता है, ने हाल ही में अपनी स्थापना के 58 साल पूरे किए हैं। यह एजेंसी 21 सितंबर 1968 को कैबिनेट सचिवालय के अंतर्गत अस्तित्व में आई थी और इसकी सीधी रिपोर्टिंग सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय को होती है। रॉ के गठन के पीछे मुख्य कारण 1962 के चीन युद्ध और 1965 के पाकिस्तान युद्ध में भारत को मिली वह कड़वी सीख थी, जिसने यह स्पष्ट कर दिया था कि बिना ठोस खुफिया जानकारी के किसी भी युद्ध में जीत हासिल करना असंभव है। एजेंसी की स्थापना के महज तीन साल के भीतर ही रॉ ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में ऐसी भूमिका निभाई, जिसने इतिहास की दिशा ही बदल दी। इस दौरान रॉ के जासूसों ने पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल याह्या खान की गुप्त फोन बातचीत तक को टैप कर लिया था, जिसका ब्योरा रोजाना प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की टेबल तक पहुंचता था।
RAW 58th Anniversary: रॉ की स्थापना के पीछे की असली वजह
भारत को 1962 के चीन युद्ध और उसके बाद 1965 के पाकिस्तान युद्ध में जिस तरह की सैन्य और रणनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा, उसने देश के नीति-निर्माताओं को एक स्वतंत्र और सशक्त बाहरी खुफिया एजेंसी की जरूरत का एहसास कराया। इससे पहले तक खुफिया जानकारी जुटाने का पूरा जिम्मा इंटेलिजेंस ब्यूरो के पास था, लेकिन युद्धों के अनुभव ने यह साबित कर दिया कि बाहरी खुफिया अभियानों के लिए एक अलग और विशेषीकृत एजेंसी की आवश्यकता है। इसी सोच के तहत इंटेलिजेंस ब्यूरो के बाहरी खुफिया विभाग को अलग करके 21 सितंबर 1968 को रॉ का गठन किया गया। इस नई एजेंसी के पहले प्रमुख और संस्थापक रामेश्वर नाथ काव यानी आर.एन. काव बने, जिन्होंने आगे चलकर भारतीय खुफिया इतिहास की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक को अंजाम दिया।
1971 के युद्ध में रॉ ने संभाले पांच बड़े मोर्चे
रॉ के पूर्व अतिरिक्त सचिव बी. रमन ने अपनी किताब ‘काओबॉयज ऑफ R&AW’ में विस्तार से लिखा है कि 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध और बांग्लादेश का निर्माण रॉ के इतिहास में स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हैं। उस समय आर.एन. काव के नेतृत्व में भारतीय खुफिया तंत्र ने इतना मजबूत जाल बिछाया था कि पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल याह्या खान की हर गोपनीय बातचीत की जानकारी नियमित रूप से इंदिरा गांधी तक पहुंचती थी। रॉ की स्थापना के महज तीन साल के भीतर ही एजेंसी ने इस युद्ध में पांच महत्वपूर्ण मोर्चों पर काम किया, जिसमें नीति-निर्माताओं और सेना को खुफिया जानकारी उपलब्ध कराना, मुक्ति वाहिनी के लड़ाकों को प्रशिक्षण देना, पाकिस्तानी दूतावासों में तैनात बंगाली अधिकारियों से संपर्क साधना, पूर्वोत्तर में नागा और मिजो विद्रोही कैंपों को निष्क्रिय करना, तथा पाकिस्तान के खिलाफ मनोवैज्ञानिक अभियान चलाना शामिल था।
याह्या खान की फोन कॉल्स तक कैसे पहुंची रॉ
बी. रमन अपनी किताब में इस अभूतपूर्व खुफिया सफलता के पीछे कई तकनीकी और कूटनीतिक कारणों का उल्लेख करते हैं। रॉ के गठन के तुरंत बाद आर.एन. काव ने सिग्नल कोर के एक रिटायर्ड सेना अधिकारी के नेतृत्व में एक मॉनिटरिंग डिवीजन तैयार किया, वहीं आईबी के क्रिप्टोग्राफी विशेषज्ञ की अगुवाई में एक अलग क्रिप्टोग्राफी डिवीजन भी स्थापित किया गया। इन दोनों विभागों ने मिलकर पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान के बीच होने वाले इलेक्ट्रॉनिक संचार को इंटरसेप्ट करना शुरू किया और पाकिस्तान के गोपनीय कोड्स को बार-बार क्रैक करने में सफलता हासिल की। दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तानी सेना और उसके शीर्ष जनरलों में सुरक्षा को लेकर संवेदनशीलता की भारी कमी थी। खुद जनरल याह्या खान जैसे सर्वोच्च कमांडर भी पूर्वी पाकिस्तान में तैनात अपने अधिकारियों को निर्देश देने के लिए बिना किसी स्क्रैम्बलिंग डिवाइस के साधारण टेलीफोन का इस्तेमाल कर लेते थे, जिसकी वजह से भारतीय मॉनिटरिंग स्टेशन आसानी से इन बातचीतों को पकड़ लेते थे।
इंदिरा गांधी तक रोज पहुंचती थीं गोपनीय बातचीत
बी. रमन अपनी किताब में लिखते हैं कि लगभग हर दिन इंदिरा गांधी और युद्ध का संचालन कर रहे अन्य शीर्ष अधिकारियों के पास याह्या खान और उनके अन्य अधिकारियों की पूर्वी पाकिस्तान में तैनात कमांडरों के साथ हुई टेलीफोन बातचीत के अंश उपलब्ध होते थे। इस लगातार मिलने वाली गोपनीय जानकारी ने भारतीय सेना और सरकार को पाकिस्तान की रणनीति को पहले से भांपने में जबरदस्त मदद पहुंचाई। यह खुफिया तंत्र इतना सटीक और प्रभावी था कि पाकिस्तान की हर बड़ी सैन्य चाल भारत के सामने पहले से स्पष्ट हो जाती थी, जिससे भारतीय सेना को अपनी रणनीति बनाने में काफी बढ़त हासिल हुई।
पाकिस्तानी हवाई हमले की पहले से थी जानकारी
इस पूरे खुफिया अभियान में के. शंकरन नायर की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है, जो पाकिस्तान और व्यापक इस्लामिक दुनिया की गहरी समझ रखने वाले अनुभवी अधिकारी थे। नवंबर 1971 के आखिरी सप्ताह में नायर के एक सोर्स ने बेहद अहम जानकारी दी कि पाकिस्तान पश्चिमी सेक्टर में भारतीय एयर बेस पर प्री-एम्प्टिव एयर स्ट्राइक की तैयारी कर रहा है। नायर ने इस सूचना को तुरंत आगे बढ़ाया, जिसके बाद भारतीय वायुसेना को पूरी तरह अलर्ट कर दिया गया। पाकिस्तान ने 3 दिसंबर को यह हवाई हमला किया, लेकिन भारत पहले से ही इसके लिए पूरी तरह तैयार था, जिससे पाकिस्तान की यह रणनीति बुरी तरह विफल हो गई।
बंगाली जनता का सहयोग बना निर्णायक कारक
उस दौर में पूर्वी पाकिस्तान, जिसे आज बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है, की बंगाली जनता और वहां प्रशासन में तैनात बंगाली अधिकारी पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों से इतने व्यथित हो चुके थे कि वे भारत को खुफिया जानकारी देना अपना राष्ट्रीय कर्तव्य मानने लगे थे। इसी तरह पश्चिम पाकिस्तान और विदेशों में स्थित पाकिस्तानी दूतावासों में तैनात बंगाली सिविल सर्वेंट भी रॉ के संपर्क में आए और उन्होंने कई महत्वपूर्ण अंदरूनी रणनीतिक जानकारियां भारतीय एजेंसियों तक पहुंचाईं। रॉ की इसी सटीक खुफिया जानकारी, पाकिस्तान की कमजोर संचार सुरक्षा का लाभ उठाने और मुक्ति वाहिनी के साथ बेहतरीन तालमेल के दम पर भारतीय सेना ने महज 13 दिनों के भीतर ही पाकिस्तानी सेना को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर दिया, जिसमें करीब 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने हथियार डाल दिए थे।
रॉ की यह ऐतिहासिक उपलब्धि आज भी दुनिया की सबसे सफल खुफिया अभियानों में गिनी जाती है, जिसने न केवल 1971 के युद्ध का रुख भारत के पक्ष में मोड़ा बल्कि बांग्लादेश जैसे नए राष्ट्र के जन्म में भी अहम भूमिका निभाई। अपनी स्थापना के महज तीन साल के भीतर इतनी बड़ी सफलता हासिल करना किसी भी खुफिया एजेंसी के लिए असाधारण उपलब्धि मानी जाती है। आज 58 साल बाद भी रॉ भारत की सुरक्षा और रणनीतिक हितों की रक्षा में उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है, और इसकी स्थापना के पीछे की यह कहानी आज भी भारतीय खुफिया इतिहास के सबसे रोमांचक अध्यायों में शुमार होती है।
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