Odisha DGP Selection: सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से मांगा जवाब, 2 सितंबर तक टली सुनवाई
DGP चयन विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा सरकार से जवाब मांगा, अगली सुनवाई 2 सितंबर को
Odisha DGP Selection: ओडिशा के नए पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति को लेकर चल रहे कड़े कानूनी और राजनीतिक विवाद में उच्चतम न्यायालय ने एक अहम मोड़ दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई 2 सितंबर तक के लिए स्थगित कर दी है और राज्य सरकार को अपना औपचारिक जवाब आधिकारिक रिकॉर्ड पर लाने के निर्देश दिए हैं। देश के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार का पक्ष और हलफनामा पूरी तरह से रिकॉर्ड पर उपलब्ध न होने की वजह से मामले की विस्तृत सुनवाई को आगे बढ़ाना ही न्यायसंगत होगा। शीर्ष अदालत के इस फैसले के बाद ओडिशा में पूर्णकालिक और नियमित डीजीपी की नियुक्ति प्रक्रिया पर फिलहाल अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं।
यह पूरा मामला वर्ष 2006 के ऐतिहासिक ‘प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ’ फैसले से गहराई से जुड़ा हुआ है। प्रकाश सिंह फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी राज्यों में पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति, उनके कार्यकाल की सुरक्षा और राजनीतिक हस्तक्षेप को रोकने के लिए कई स्पष्ट और कड़े दिशानिर्देश तय किए थे। याचिका में ओडिशा सरकार पर आरोप लगाया गया है कि वह इन स्थापित नियमों को दरकिनार कर रही है और संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) को भेजे जाने वाले संभावित अधिकारियों के पैनल में मनमाने तरीके से कनिष्ठ (जूनियर) अधिकारियों को शामिल करने का प्रयास कर रही है। इससे पूर्व भी सुप्रीम कोर्ट ने यूपीएससी को सख्त निर्देश दिए थे कि जब तक अदालत में इस मामले की सुनवाई पूरी नहीं हो जाती, तब तक डीजीपी चयन का अंतिम पैनल तैयार न किया जाए।
Odisha DGP Selection: सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई, राज्य सरकार का रुख और पीठ की सख्त टिप्पणी
मंगलवार को हुई अदालती कार्यवाही के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने ओडिशा सरकार का पक्ष रखते हुए पीठ को अवगत कराया कि राज्य सरकार ने याचिका के संदर्भ में अपना आधिकारिक जवाब पहले ही दाखिल कर दिया है। हालांकि, जब मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने फाइलों का अवलोकन किया, तो पाया कि राज्य का जवाब आधिकारिक अदालती रिकॉर्ड में पूरी तरह से दर्ज नहीं हो पाया था।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य सरकार द्वारा दिए गए तर्कों और हलफनामे का गहन अध्ययन किए बिना इस संवेदनशील मामले पर अंतिम सुनवाई शुरू करना उचित नहीं होगा। इसके बाद पीठ ने कार्यवाही को 2 सितंबर तक के लिए मुल्तवी कर दिया। राज्य सरकार का तर्क है कि राज्य पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारियों की पदोन्नति एक सामान्य और नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया है। सरकार के अनुसार, वह पात्रता मानदंड पूरे करने वाले सभी योग्य आईपीएस अधिकारियों के नाम यूपीएससी को नए प्रस्ताव के रूप में भेजने का पूरा संवैधानिक और प्रशासनिक अधिकार रखती है।
प्रकाश सिंह फैसला, यूपीएससी की भूमिका और चयन प्रक्रिया का विवाद
सुप्रीम कोर्ट ने प्रकाश सिंह मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले में यह अनिवार्य किया था कि राज्य सरकारें राज्य के सबसे वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों के नाम यूपीएससी को भेजेंगी। इसके बाद यूपीएससी अधिकारियों के सेवा रिकॉर्ड, कार्यकुशलता और अनुभव का मूल्यांकन करके तीन सबसे उपयुक्त अधिकारियों का एक छोटा पैनल बनाएगी, जिसमें से राज्य सरकार किसी एक को डीजीपी चुनेगी। नियम के अनुसार, चयनित डीजीपी को कम से कम दो साल का न्यूनतम निश्चित कार्यकाल दिया जाना अनिवार्य है, चाहे उनकी सेवानिवृत्ति की तिथि बीच में ही क्यों न आ जाए।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता पी. चिदंबरम ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि ओडिशा सरकार ने शुरुआत में केवल तीन सबसे वरिष्ठ अधिकारियों के नाम ही यूपीएससी को भेजे थे। हालांकि, बाद में इस सूची में हेरफेर करते हुए नामों की संख्या बढ़ाकर 11 कर दी गई। आरोप है कि 1994 बैच के कुछ पसंदीदा अधिकारियों को आनन-फानन में एडीजी पद से डीजीपी रैंक में पदोन्नत किया गया ताकि उन्हें चयन प्रक्रिया के दायरे में लाया जा सके। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि यह कदम सुप्रीम कोर्ट के स्थापित नियमों का खुला उल्लंघन है और यह वरिष्ठ अधिकारियों की अनदेखी कर पसंदीदा अधिकारियों को बैकडोर से शीर्ष पद तक पहुंचाने की कोशिश है।
कार्यवाहक डीजीपी की नियुक्ति और राज्य की वर्तमान प्रशासनिक स्थिति
ओडिशा के पूर्व नियमित डीजीपी वाई.बी. खुरानिया 16 अगस्त को अपनी सेवा से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। उनके पदमुक्त होने के बाद राज्य में प्रशासनिक शून्यता से बचने के लिए राज्य सरकार ने 1990 बैच के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी विनयतोष मिश्रा को कार्यवाहक डीजीपी का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया। विनयतोष मिश्रा वर्तमान में राज्य के पुलिस महानिदेशक (क्राइम ब्रांच और सीआईडी) के पद पर तैनात हैं। जब तक सुप्रीम कोर्ट इस पूरे विवाद पर अपना अंतिम और स्पष्ट फैसला नहीं सुना देता, तब तक ओडिशा में नियमित डीजीपी की नियुक्ति पर रोक बनी रहेगी।
राज्य सरकार ने अपनी सफाई में बार-बार कहा है कि अधिकारियों की पदोन्नति सेवा नियमों के तहत की गई है और इसमें किसी भी प्रकार का पक्षपात या अनियमितता नहीं हुई है। सरकार का कहना है कि वह यूपीएससी द्वारा निर्धारित सभी तकनीकी मापदंडों का पूर्णतः पालन कर रही है। फिर भी, शीर्ष अदालत ने इस बात पर विशेष जोर दिया है कि प्रक्रियाओं में पूर्ण पारदर्शिता होनी चाहिए, जिसके लिए राज्य के जवाब का रिकॉर्ड पर आना अत्यंत आवश्यक है।
पुलिस सुधार, निष्पक्षता और संवैधानिक संस्थानों की स्वतंत्रता
प्रकाश सिंह फैसला भारत में पुलिस सुधारों का मुख्य आधार माना जाता है। इस फैसले का मुख्य उद्देश्य पुलिस व्यवस्था को राजनीतिक दबाव, तबादला उद्योग और सत्ताधारी दलों के हस्तक्षेप से मुक्त करना था। सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर इस बात को दोहराया है कि डीजीपी जैसे संवेदनशील पद पर नियुक्ति केवल और केवल योग्यता, वरिष्ठता और निष्पक्ष सेवा रिकॉर्ड के आधार पर ही होनी चाहिए। देश के विभिन्न राज्यों में समय-समय पर इस प्रक्रिया को बाईपास करने की कोशिशें होती रही हैं, जिन पर सुप्रीम कोर्ट ने हमेशा कड़ा रुख अपनाया है।
ओडिशा के इस ताजा मामले में भी शीर्ष अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि किसी भी प्रकार की ‘बैकडोर एंट्री’ या नियमों में तोड़-मरोड़ को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यूपीएससी ने भी सुप्रीम कोर्ट को यह भरोसा दिलाया है कि वह 2 सितंबर की अगली सुनवाई तक ओडिशा के डीजीपी चयन से जुड़ा कोई भी अंतिम निर्णय नहीं लेगी। इस पूरे प्रकरण से यह साफ संदेश जाता है कि न्यायपालिका पुलिस प्रशासन के शीर्ष नेतृत्व की पारदर्शिता से कोई समझौता करने के मूड में नहीं है।
2 सितंबर की सुनवाई से जुड़ी संभावनाएं और राज्य पर प्रभाव
आगामी 2 सितंबर को होने वाली महत्वपूर्ण सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट राज्य सरकार द्वारा दाखिल किए जाने वाले विस्तृत जवाब का बारीकी से परीक्षण करेगा। इसके साथ ही याचिकाकर्ताओं और यूपीएससी की ओर से पेश किए जाने वाले पूरक तर्कों को भी सुना जाएगा। यदि अदालत को यह प्रतीत होता है कि राज्य सरकार द्वारा भेजी गई नई सूची में नियमों की अनदेखी हुई है, तो वह पूरे चयन पैनल को रद्द कर नए सिरे से केवल वरिष्ठतम अधिकारियों के नाम पर विचार करने का निर्देश दे सकती है।
इस कानूनी खींचतान का सीधा असर ओडिशा की प्रशासनिक और पुलिस व्यवस्था पर पड़ रहा है। यद्यपि कार्यवाहक डीजीपी के नेतृत्व में दैनंदिन कार्य संचालित हो रहे हैं, लेकिन एक स्थायी और नियमित प्रमुख के अभाव में दीर्घकालिक नीतिगत फैसले प्रभावित हो सकते हैं। राज्य के आईपीएस कैडर में भी इस विवाद को लेकर बेचैनी का माहौल है। देश भर के कानूनी और प्रशासनिक विशेषज्ञ इस मामले पर नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का आने वाला निर्णय अन्य राज्यों में होने वाली डीजीपी नियुक्तियों के लिए भी एक बड़ी नजीर साबित होगा।
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