Nepal Disaster: नेपाल की तबाही से भारत सतर्क, हिमालय की 600 संवेदनशील ग्लेशियल झीलों पर बढ़ी निगरानी
नेपाल की आपदा के बाद भारत ने हिमालय की संवेदनशील झीलों की निगरानी और तैयारी बढ़ाई
Nepal Disaster: नेपाल-चीन सीमा के निकट उच्च हिमालयी क्षेत्र में हाल ही में आई विनाशकारी ग्लेशियल आपदा ने पूरे दक्षिण एशियाई भूभाग में एक बार फिर गंभीर खतरे की घंटी बजा दी है। इस भीषण त्रासदी से सबक लेते हुए भारत सरकार, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और देश के शीर्ष वैज्ञानिक संस्थानों ने भारतीय हिमालयी क्षेत्र में मौजूद लगभग 600 अत्यधिक संवेदनशील ग्लेशियल झीलों (Glacial Lakes) की चौबीसों घंटे निगरानी करने का महा-अभियान शुरू कर दिया है।
जलवायु परिवर्तन, वैश्विक तापमान में तीव्र वृद्धि और अनियंत्रित मौसम चक्र के चलते ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ यानी GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) की आशंका कई गुना बढ़ गई है। यह खतरा केवल सुदूर बर्फीली चोटियों तक सीमित नहीं है, बल्कि सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी घाटियों में बसे जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और पूर्वोत्तर के पहाड़ी व मैदानी राज्यों के करोड़ों नागरिकों, पनबिजली परियोजनाओं और सामरिक बुनियादी ढांचे के लिए सीधा अस्तित्व का संकट बन चुका है।
Nepal Disaster: नेपाल की आपदा ने क्यों बढ़ाई भारत की चिंता? नई झीलों का अप्रत्याशित खतरा
नेपाल-चीन सीमावर्ती क्षेत्र में घटित हालिया आपदा ने वैज्ञानिकों को सबसे ज्यादा इस बात से चौंकाया है कि जल प्रलय उन पुरानी झीलों से नहीं आया जिन्हें दशकों से उपग्रहों से ट्रैक किया जा रहा था, बल्कि यह खतरा हाल ही में बनी नई और अल्पकालिक ग्लेशियल झीलों के कारण उत्पन्न हुआ। इससे यह साबित हो गया है कि हिमालयी क्रायोस्फीयर (बर्फ तंत्र) अत्यधिक गतिशील और अप्रत्याशित हो चुका है।
भारत के 11 राज्य और दो केंद्र शासित प्रदेश सीधे तौर पर हिमालय की पारिस्थितिकी से जुड़े हैं। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (GSI) के अनुसार, भारतीय हिमालय में लगभग 9,575 ग्लेशियर मौजूद हैं। जब तापमान बढ़ने से ये ग्लेशियर पीछे हटते हैं (Glacial Retreat), तो उनके द्वारा छोड़े गए मलबे, बोल्डर और अस्थिर चट्टानों (Moraine) के पीछे विशाल जलभराव हो जाता है। यह प्राकृतिक मोरेन बांध अत्यंत कमजोर होता है। ऊपर से चट्टान खिसकने, हिमस्खलन होने या बादल फटने की स्थिति में जब यह कमजोर दीवार टूटती है, तो लाखों क्यूसेक पानी, कीचड़ और मलबे के साथ नीचे की ओर सुनामी की तरह दौड़ता है।
हिंदू कुश हिमालय पर संयुक्त राष्ट्र की चौंकाने वाली रिपोर्ट: GLOF की घटनाओं में पांच गुना वृद्धि
संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय (UNU) के नेतृत्व में हिंदू कुश हिमालय (HKH) क्षेत्र पर किए गए एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक अध्ययन ने खतरे की विकरालता को उजागर किया है। पूरे हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में 64 हजार से अधिक ग्लेशियर और 23 हजार से अधिक ग्लेशियल झीलें स्थित हैं। इनमें से शोधकर्ताओं ने 407 झीलों को ‘अत्यंत खतरनाक और तत्काल फटने योग्य’ श्रेणी में वर्गीकृत किया है।
वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 1950 से पूर्व हिंदू कुश हिमालय में प्रति दशक औसतन 7 GLOF की घटनाएं दर्ज होती थीं। किंतु 1950 के बाद के दशकों में यह औसत बढ़कर लगभग 34 घटनाएं प्रति दशक हो चुका है। यानी पिछले 70 वर्षों में ग्लेशियल झीलों के फटने की आवृत्ति में पांच गुना से अधिक का उछाल आया है। अध्ययन में 2024 तक की 493 प्रमुख GLOF घटनाओं का गहन विश्लेषण किया गया, जो यह स्पष्ट करता है कि ग्लोबल वार्मिंग अब सैद्धांतिक चेतावनी नहीं बल्कि जमीनी तबाही का कारण बन रही है।
उत्तराखंड में 219 ‘हैंगिंग ग्लेशियर’ और सिक्किम का कड़वा इतिहास
भारत के पहाड़ी राज्यों में स्थिति अत्यंत संवेदनशील बनी हुई है। उत्तराखंड के अलकनंदा और भागीरथी बेसिन पर किए गए वैज्ञानिक सर्वेक्षण में 219 ‘हैंगिंग ग्लेशियर’ (Hanging Glaciers) की पहचान की गई है। हैंगिंग ग्लेशियर वे बर्फीले खंड होते हैं जो अत्यंत खड़ी ढलानों पर अटके रहते हैं और थोड़ा सा भी कंपन या तापमान परिवर्तन होने पर सीधे नीचे स्थित घाटियों या झीलों में गिर जाते हैं, जैसा कि वर्ष 2021 की चमोली ऋषिगंगा त्रासदी में देखा गया था।
वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण वर्तमान में चमोली, पिथौरागढ़, उत्तरकाशी, टिहरी और बागेश्वर की उच्च जोखिम वाली झीलों का ग्राउंड-ट्रुथिंग सर्वे कर रहे हैं।
वहीं पूर्वी हिमालय में सिक्किम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने 85 झीलों की मैपिंग की है, जिनमें 17 झीलें रेड जोन में हैं। अक्टूबर 2023 में सिक्किम की साउथ ल्होनक झील के फटने से तीस्ता ऊर्जा परियोजना सहित व्यापक सैन्य और असैन्य ढांचे का विनाश देश देख चुका है। इसके अलावा 7 अन्य झीलें ऐसी हैं जो किसी तीव्र भूकंप या क्लाउडबर्स्ट के झटके से कभी भी विनाशकारी रूप ले सकती हैं।
‘मिशन मौसम’ और ₹1,342 करोड़ का बजटीय कवच: भारत की अग्रिम तैयारी
नेपाल की घटना के तुरंत बाद भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने ‘मिशन मौसम’ (Mission Mausam) के तहत हिमालयी निगरानी तंत्र को युद्धस्तर पर अपग्रेड करने का निर्णय लिया है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए इस मिशन का बजट ₹1,342.29 करोड़ आवंटित किया गया है।
इस पहल के तहत हिमालयी चोटियों पर अत्याधुनिक एक्स-बैंड और सी-बैंड डॉप्लर वेदर रडार (DWR), ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन्स (AWS) और उच्च तुंगता वाले ऑटोमैटिक स्नो स्टेशन्स का सघन जाल बिछाया जा रहा है। इसरो (ISRO) के रिसोर्ससैट और कार्टोसैट उपग्रहों के माध्यम से इन 600 संवेदनशील झीलों के क्षेत्रफल, जल विस्तार और मोरेन दीवारों की स्थिरता की साप्ताहिक तुलनात्मक 3D इमेजिंग की जा रही है। किसी भी असामान्य जल वृद्धि की स्थिति में संबंधित राज्यों के इमरजेंसी ऑपरेशन सेंटर्स (SEOC) को ऑटोमेटेड सिग्नल पहुंच जाएगा।
NDMA की नई नीति: ‘1000 वर्षों के बाढ़ इतिहास’ के आधार पर तय होगा बुनियादी ढांचा
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और नीति आयोग के विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि केवल चेतावनी देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पहाड़ों में अनियंत्रित कंक्रीटीकरण और विकास के मॉडल को आमूलचूल बदलना होगा।
एनडीएमए ने सिफारिश की है कि हिमालय की संवेदनशील घाटियों में नई सड़कों, सुरंगों, होटलों और जलविद्युत परियोजनाओं की स्वीकृति देने से पहले पिछले 1,000 वर्षों के पुरा-जलविज्ञान (Paleo-hydrology) और ऐतिहासिक बाढ़ स्तरों का अनिवार्य वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए। नदियों के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र (River Floodplain) और संभावित GLOF रन-आउट जोन में किसी भी प्रकार के पक्के निर्माण पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की रूपरेखा तैयार की जा रही है, ताकि पानी आने पर मानव बस्तियों को बहने से बचाया जा सके।
Nepal Disaster: प्रकृति की संवेदनशीलता के अनुरूप विकास ही स्थायी सुरक्षा
नेपाल-चीन सीमा की तबाही हिमालयी देशों के लिए प्रकृति की एक स्पष्ट और अंतिम चेतावनी है। हिमालय अभी भी भूगर्भीय रूप से एक युवा और सक्रिय पर्वत श्रृंखला है, जो जलवायु के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।
भारत द्वारा 600 संवेदनशील झीलों पर बढ़ाई गई उपग्रह और रडार निगरानी सही दिशा में उठाया गया ठोस कदम है। किंतु वास्तविक सुरक्षा तभी सुनिश्चित होगी जब सटीक पूर्व चेतावनी तंत्र के साथ-साथ सुदूर गांवों तक सुरक्षित सैटेलाइट संचार, समयबद्ध मॉक ड्रिल और संवेदनशील क्षेत्रों से मानव बस्तियों को सुरक्षित दूरी पर रखने की राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति धरातल पर उतरेगी।
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