Delhi MCD: सत्य निकेतन हादसे के बाद 11 में से 6 जोन के DC डेपुटेशन पर, जवाबदेही पर सवाल

सत्य निकेतन हादसे के बाद MCD के प्रशासनिक ढांचे और अधिकारियों की जवाबदेही पर सवाल

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Delhi MCD: साउथ दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में छात्र पेइंग गेस्ट (PG) इमारत के ढहने के दर्दनाक हादसे के बाद दिल्ली नगर निगम (MCD) का समूचा प्रशासनिक ढांचा और अधिकारियों की जवाबदेही प्रणाली सवालों के घेरे में आ गई है। इस गंभीर हादसे की जांच और कार्रवाई के बीच सामने आई एक पड़ताल ने प्रशासनिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।

दिल्ली नगर निगम के कुल 11 प्रशासनिक जोनों में से 6 महत्वपूर्ण जोनों की कमान ऐसे उपायुक्तों (Deputy Commissioners – DCs) के हाथों में है, जो मूल कैडर के बजाय बाहरी विभागों, रक्षा सेवाओं और अन्य केंद्रीय संस्थानों से प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर आए हैं। इस खुलासे के बाद यह बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि स्थानीय निकाय के जटिल नियमों, बिल्डिंग बायलॉज और जमीनी समस्याओं से अपरिचित बाहरी अधिकारियों की जवाबदेही कैसे तय होगी और उनका कार्यकाल समाप्त होने के बाद किसी हादसे की स्थिति में जिम्मेदारी का निर्धारण किस प्रकार किया जाएगा।

Delhi MCD: सत्य निकेतन हादसे के बाद क्यों बढ़ी एमसीडी पर सख्ती?

सत्य निकेतन में छात्रों से भरे पीजी भवन के अचानक गिरने की घटना ने राजधानी में पुरानी जर्जर संरचनाओं, अतिरिक्त मंजिलों के अनधिकृत भार और अवैध निर्माणों के खिलाफ निगम की निगरानी व्यवस्था की पोल खोल दी है। इस हादसे के तुरंत बाद उपराज्यपाल और निगम प्रशासन ने सख्त कदम उठाते हुए दक्षिणी जोन के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर राकेश कुमार सिंह और चार अन्य इंजीनियरों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया था।

इससे पूर्व शाहदरा जोन के पूर्व डीसी अभिषेक मिश्रा की सीबीआई द्वारा ₹4 लाख की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तारी का मामला भी सुर्खियों में रहा था। लगातार सामने आ रही इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि जोनल स्तर पर निरीक्षण, सुरक्षा ऑडिट और नियम-पालन की जो व्यवस्था होनी चाहिए थी, उसमें गंभीर संस्थागत विफलताएं मौजूद हैं। इस पृष्ठभूमि में दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा भी एमसीडी और दिल्ली विश्वविद्यालय से सुरक्षा जांच पर विस्तृत रिपोर्ट तलब की गई है।

11 में से 6 जोनों में बाहरी कैडर के अधिकारी: कहां किसकी तैनाती?

एक विस्तृत जांच पड़ताल के अनुसार, दिल्ली नगर निगम के 11 प्रशासनिक जोनों में से आधे से अधिक जोनों में बाहरी सेवाओं से प्रतिनियुक्त अधिकारी शीर्ष प्रशासनिक पद संभाल रहे हैं।

सेंट्रल जोन के डीसी सचिन गुप्ता पंजाब कैडर के भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारी हैं। रोहिणी जोन के डीसी अंशुल सिरोही इंडियन ऑर्डिनेंस फैक्ट्रीज सर्विस (IOFS) से आते हैं। केशवपुरम जोन के डीसी मोहित बंसल इंडियन ट्रेड सर्विस (ITS) कैडर के अधिकारी हैं।

इसके अलावा, सिविल लाइंस जोन के डीसी शशि प्रताप इंडियन डिफेंस एकाउंट्स सर्विस (IDAS) से संबद्ध हैं, जबकि पश्चिमी जोन के डीसी विनोद अत्री सैन्य सेवा (Military Service) से प्रतिनियुक्ति पर नगर निगम में सेवाएं दे रहे हैं। वहीं निलंबित किए गए दक्षिणी जोन के पूर्व डीसी राकेश कुमार सिंह बिहार राज्य प्रशासनिक कैडर से प्रतिनियुक्ति पर आए थे।

डेपुटेशन की व्यवस्था और विशेषज्ञता का सवाल

प्रतिनियुक्ति (डेपुटेशन) सरकारी प्रशासनिक व्यवस्था का एक वैध और नियमित हिस्सा है। इसके तहत किसी अधिकारी को उसके मूल कैडर से अधिकतम तीन वर्ष (नियमों के तहत विस्तार योग्य) के लिए किसी अन्य निकाय या मंत्रालय में विशिष्ट दायित्वों के लिए भेजा जाता है। इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य विभिन्न सेवाओं के उच्च प्रशासनिक, वित्तीय और संगठनात्मक अनुभव का लाभ स्थानीय निकायों को उपलब्ध कराना होता है।

आईपीएस अधिकारी जहां कानून-व्यवस्था और प्रवर्तन का अनुभव लाते हैं, वहीं डिफेंस अकाउंट्स या ट्रेड सर्विस के अधिकारी वित्तीय अनुशासन और नीतिगत प्रबंधन की समझ रखते हैं। हालांकि, स्थानीय नगर निगमों में काम करने की प्रकृति पूरी तरह भिन्न होती है। यहां जोनल डीसी को भवन निर्माण उपनियमों (Building Bye-laws), मास्टर प्लान दिल्ली, अनधिकृत निर्माणों के तकनीकी सर्वे, सीलिंग, नालों की सफाई और स्थानीय जनसमस्याओं से सीधे जूझना पड़ता है। स्थानीय कानूनी ढांचे और भौगोलिक पेचीदगियों की गहरी समझ न होने के कारण कई बार त्वरित और प्रभावी फील्ड एक्शन प्रभावित होता है।

जवाबदेही को लेकर सबसे बड़ा कानूनी और प्रशासनिक पेंच

प्रतिनियुक्ति पर आए अधिकारियों को लेकर सबसे संवेदनशील मुद्दा उनकी दीर्घकालिक प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा है। एमसीडी के पूर्व मेयर श्याम सुंदर अग्रवाल सहित कई पूर्व प्रशासकों ने इस व्यवस्था पर आपत्ति जताई है।

उनका तर्क है कि प्रतिनियुक्ति पर आया अधिकारी तीन वर्ष की निश्चित अवधि पूरी कर वापस अपने मूल कैडर (जैसे पुलिस, सेना या रक्षा लेखा) में लौट जाता है। यदि उसके कार्यकाल के दौरान किसी अवैध निर्माण को अनदेखा किया गया हो या कमजोर भवन का सर्वे न हुआ हो, और उसके जाने के दो साल बाद कोई इमारत ढह जाती है, तो उस अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक या विभागीय कार्रवाई करना बेहद जटिल हो जाता है। मूल कैडर में लौटने के बाद स्थानीय निकाय की विफलता के लिए उस पर शिकंजा कसने की प्रक्रिया अंतर-मंत्रालयी फाइलों के फेर में उलझ कर रह जाती है।

609 निगम वाहनों का गायब होना और निगरानी का अभाव

प्रशासनिक जवाबदेही के इस संकट के बीच एमसीडी की आंतरिक संपत्तियों की निगरानी पर भी सवाल उठे हैं। पूर्व मेयर ने यह गंभीर मुद्दा भी उठाया कि निगम के विभिन्न विभागों से कथित तौर पर 609 सरकारी गाड़ियां रिकॉर्ड से गायब हैं और अब तक किसी भी स्तर पर ठोस जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकी है।

सार्वजनिक संसाधनों, वाहनों और बजट के प्रबंधन में इस प्रकार की शिथिलता यह दर्शाती है कि जब शीर्ष स्तर पर अधिकारियों का कार्यकाल अस्थायी होता है, तो दीर्घकालिक परिसंपत्ति प्रबंधन और संस्थागत जवाबदेही कमजोर पड़ने लगती है।

मेयर बनाम प्रशासनिक नियंत्रण: अधिकारों की सीमाएं

डेपुटेशन पर अधिकारियों की नियुक्ति में एक और महत्वपूर्ण संवैधानिक पहलू निर्वाचित नेतृत्व और नौकरशाही के बीच अधिकारों का संतुलन है। एमसीडी एक निर्वाचित स्थानीय स्वशासन निकाय है, जिसका नेतृत्व जनता द्वारा चुने गए पार्षद और मेयर करते हैं।

किंतु जोनल उपायुक्तों और अन्य वरिष्ठ नौकरशाहों के स्थानांतरण, प्रतिनियुक्ति और तैनाती में मेयर या स्टैंडिंग कमेटी की सीधी वैधानिक भूमिका नहीं होती। यह पूरा नियंत्रण उपराज्यपाल (LG) और केंद्रीय गृह मंत्रालय के कार्मिक नियमों के अधीन आता है। ऐसे में निर्वाचित प्रतिनिधियों का कहना है कि जब नीतियां लागू कराने और फील्ड अफसरों पर निगरानी रखने का प्रशासनिक नियंत्रण उनके हाथ में नहीं होता, तो जनता के प्रति उनकी जवाबदेही निभाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

सत्य निकेतन के बाद पीजी हॉस्टलों का मेगा सुरक्षा सर्वे

हादसे के बाद उपजे जनाक्रोश को देखते हुए निगम प्रशासन ने राजधानी के छात्र बहुल इलाकों में बड़े पैमाने पर जांच अभियान छेड़ा है। एक ही दिन में 1,150 से अधिक पीजी और निजी छात्रावासों का भौतिक सुरक्षा सर्वे किया गया, जिनमें लगभग 20 हजार छात्र और युवा रहते हैं।

इस सर्वे में इमारतों की संरचनात्मक मजबूती, स्वीकृत नक्शे के विपरीत बनाए गए अतिरिक्त कमरों, अग्नि सुरक्षा (Fire Safety) उपकरणों और आपातकालीन निकास मार्गों की गहन जांच की जा रही है। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि बेसमेंट में चल रही अवैध गतिविधियों और बिना वेंटिलेशन वाली संकरी संरचनाओं को तत्काल नोटिस देकर सील किया जाए।

Delhi MCD: अस्थायी तैनातियों के बजाय स्थायी प्रशासनिक सुधार की आवश्यकता

सत्य निकेतन की त्रासदी ने दिल्ली नगर निगम को अपने प्रशासनिक ढांचे का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए बाध्य किया है। 11 में से 6 जोनों में प्रतिनियुक्ति पर चल रहे उपायुक्तों का यह आंकड़ा बताता है कि नगर निगम अपने आंतरिक कैडर को सशक्त बनाने में पीछे रहा है।

डेपुटेशन की व्यवस्था प्रशासनिक दृष्टि से उपयोगी हो सकती है, किंतु यह केवल तभी सार्थक होगी जब अधिकारियों के प्रदर्शन का पारदर्शी रिकॉर्ड रखा जाए और उनके मूल कैडर में लौटने के बाद भी पूर्व में किए गए कार्यों के लिए जवाबदेही तय करने का कठोर तंत्र विकसित हो। दिल्ली के करोड़ों नागरिकों और हजारों छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तात्कालिक छापों और निलंबन से आगे बढ़कर एक स्थायी, पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासनिक कार्यप्रणाली लागू करना समय की सबसे बड़ी मांग है।

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