JPSC Merit Scam मेधा घोटाले में बड़ा खुलासा: इंटरव्यू में 15 लाख की वसूली, पूर्व अधिकारियों और कोचिंग संचालकों के सिंडिकेट का दावा
CID पूछताछ में पूर्व अधिकारियों, कोचिंग संचालकों और बिचौलियों के सिंडिकेट का खुलासा
JPSC Merit Scam: झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की चयन प्रक्रियाओं में हुई कथित धांधली और मेधा घोटाले में केंद्रीय जांच एजेंसी CID की कार्रवाई के बीच एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। परीक्षा का संचालन करने वाली अधिकृत एजेंसी टीएसआर डेटा प्रोसेसिंग प्राइवेट लिमिटेड (TDPL) के गिरफ्तार मार्केटिंग मैनेजर अभय कुमार तिवारी उर्फ मनोज कुमार तिवारी ने सीआईडी रिमांड के दौरान पूछताछ में पूरे भ्रष्टाचार के तंत्र को उजागर कर दिया है।
अभय तिवारी के दिए गए बयानों के अनुसार, आयोग के भीतर उच्च पदस्थ पूर्व अधिकारियों, सदस्यों, कोचिंग संचालकों और बिचौलियों का एक बड़ा संगठित सिंडिकेट काम कर रहा था। इस सिंडिकेट द्वारा अभ्यर्थियों से साक्षात्कार में मनचाहे अंक दिलवाने के लिए 15 लाख रुपये तक की भारी-भरकम राशि वसूली जाती थी। परीक्षा के प्रत्येक चरण, यानी प्रारंभिक परीक्षा से लेकर अंतिम चयन तक के लिए अलग-अलग दरें तय की गई थीं।
JPSC Merit Scam: सीआईडी की रिमांड पूछताछ में खुले सिंडिकेट के बड़े नाम
रांची स्थित सीआईडी मुख्यालय में चल रही गहन पूछताछ में गिरफ्तार अभय तिवारी ने घोटाले की पूरी कार्यप्रणाली का विवरण दिया। उसने सीआईडी को बताया कि इस संगठित भ्रष्टाचार में जेपीएससी के पूर्व अध्यक्ष एवं राज्य के पूर्व मुख्य सचिव एल. खियांग्ते का नाम मुख्य रूप से शामिल है। इसके अलावा आयोग की पूर्व सदस्य डॉ. अजिता भट्टाचार्य, डॉ. अनिमा हांसदा और डॉ. जमाल अहमद की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई है।
जांच में पतंजलि कोचिंग संस्थान के संचालक रवि कुमार और टीडीपीएल के निदेशक रामवीर सिंह के बीच सीधी साठगांठ की बात सामने आई है। अभय तिवारी ने स्पष्ट किया कि कोचिंग संचालक और स्थानीय एजेंट अभ्यर्थियों को फंसाकर सिंडिकेट तक लाते थे, जिसके बाद आयोग के वरिष्ठ स्तर पर उनके प्राप्तांकों में फेरबदल करने का काम अंजाम दिया जाता था।
साक्षात्कार में अंक बढ़ाने का तय खेल और 15 लाख की वसूली
सीआईडी को दिए गए बयान के मुताबिक, 11वीं और 13वीं जेपीएससी परीक्षा के साक्षात्कार (इंटरव्यू) में अभ्यर्थियों को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए प्रति प्रतिभागी 15 लाख रुपये का रेट तय किया गया था। इस प्रक्रिया में आदित्य पांडेय नामक कोचिंग संचालक के जरिए अभ्यर्थियों की व्यवस्था की जाती थी।
आदित्य पांडेय ने पूर्व सदस्य डॉ. अजिता भट्टाचार्य के निजी सहायक (PA) ब्रजराम के माध्यम से सिंडिकेट के पदाधिकारियों से संपर्क साधा और कुल सात अभ्यर्थियों के इंटरव्यू में मनमाने नंबर बढ़वाए। ब्रजराम ही अभ्यर्थियों से इस तय राशि का संग्रह करता था और बाद में इसे संबंधित अधिकारियों के बीच वितरित किया जाता था।
अवैध तरीके से सफल अभ्यर्थियों में पुलिस अधिकारी और जेल उप कारापाल शामिल
पूछताछ के दौरान सीआईडी को उन अभ्यर्थियों के नाम भी प्राप्त हुए हैं, जिन्हें साक्षात्कार में अतिरिक्त नंबर देकर अंतिम रूप से सफल घोषित कराया गया था। चौंकाने वाली बात यह है कि अनुचित लाभ उठाकर पास होने वाले अभ्यर्थियों में वर्तमान में कार्यरत पुलिस अधिकारी भी शामिल हैं।
इनमें तीन डीएसपी—रोबिन कुमार, रोबिन सिन्हा और मनीष कुमार—तथा उप कारापाल (डेप्युटी जेलर) राजेश कुमार रजक और एक अन्य अभ्यर्थी गौतम कुमार का नाम शामिल है। जानकारी के अनुसार, कोडरमा के एजेंट लालू यादव ने डीएसपी रोबिन कुमार, रोबिन सिन्हा और उप कारापाल राजेश कुमार रजक को पास कराने के लिए अभय तिवारी से संपर्क साधा था, जिसके बाद तत्कालीन अध्यक्ष और सदस्य के माध्यम से बोर्ड में मदद पहुंचाई गई थी। वहीं, गौतम कुमार का संपर्क पतंजलि कोचिंग के संचालक रवि कुमार के जरिए सिंडिकेट से हुआ था।
पीटी से लेकर अंतिम चयन तक का रेट कार्ड जारी, कोड-डीकोड का खेल
अभय तिवारी के खुलासे से यह भी स्पष्ट हुआ है कि जेपीएससी की परीक्षाओं में सफलता का एक पूरा ‘रेट कार्ड’ तैयार था। 11वीं और 13वीं जेपीएससी परीक्षा में प्रारंभिक परीक्षा (PT) पास कराने के लिए सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों से 5 लाख रुपये और अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST) वर्ग से 2 से 3 लाख रुपये वसूले जाते थे। वहीं, मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार मिलाकर अंतिम चयन सूची में नाम दर्ज कराने के लिए प्रति अभ्यर्थी 60 से 70 लाख रुपये की मोटी रकम वसूली जाती थी।
आयोग के पूर्व अध्यक्ष एल. खियांग्ते द्वारा मुख्य सचिव के आवासीय कार्यालय के कंप्यूटर ऑपरेटर धर्मेंद्र के माध्यम से पैसों का लेन-देन किया जाता था, जबकि सदस्य डॉ. जमाल अहमद के लिए हजारीबाग के बिचौलिए धन एकत्र करते थे। साक्षात्कार के दौरान अभ्यर्थियों की पहचान छिपाने के लिए दिए जाने वाले कोड को डीकोड करने का काम टीडीपीएल निदेशक रामवीर सिंह के निर्देशों पर किया जाता था। कोड की जानकारी के आधार पर ही इंटरव्यू बोर्ड में बैठे सदस्य संबंधित अभ्यर्थियों को अधिक नंबर देते थे।
सीडीपीओ परीक्षा में भी व्यापक धांधली का खुलासा
सीआईडी जांच में यह भी सामने आया है कि यह सिंडिकेट सिर्फ सिविल सेवा परीक्षाओं तक ही सीमित नहीं था, बल्कि राज्य की अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में भी पूरी तरह से सक्रिय था। अभय तिवारी ने बताया कि बाल विकास परियोजना अधिकारी (CDPO) की परीक्षा में अभ्यर्थियों को पास कराने के लिए प्रति अभ्यर्थी 10 लाख रुपये की दर निर्धारित की गई थी।
सीडीपीओ परीक्षा के लिए भी टीडीपीएल के जरिए ही अभ्यर्थियों का प्रबंध किया गया था। इस प्रक्रिया में सामान्य वर्ग की सीटों पर झारखंड से बाहर के अन्य राज्यों के अभ्यर्थियों का भी अनुचित तरीके से चयन कराया गया था, जिससे स्थानीय योग्य प्रतिभागी अवसर से वंचित रह गए।
JPSC Merit Scam: राज्य की परीक्षा व्यवस्था पर गहरा असर और सीआईडी की आगे की रणनीति
जेपीएससी जैसी संवैधानिक संस्था में इतने बड़े पैमाने पर सिंडिकेट का सक्रिय होना राज्य के प्रशासनिक ढांचे और प्रतियोगी परीक्षाओं की शुचिता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। वर्षों से ईमानदारी से तैयारी कर रहे हजारों युवाओं के भविष्य के साथ हुए इस खिलवाड़ ने छात्रों के बीच गहरे असंतोष और आक्रोश को जन्म दिया है।
सीआईडी अब अभय तिवारी द्वारा दिए गए बयानों के आधार पर तकनीकी साक्ष्य, बैंक खातों का ब्योरा और कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDR) खंगाल रही है। आने वाले दिनों में जांच एजेंसी इस सिंडिकेट में शामिल पूर्व अधिकारियों, सदस्यों, पीए ब्रजराम, कोचिंग संचालकों और अवैध रूप से लाभ उठाने वाले अभ्यर्थियों को समन भेजकर पूछताछ की तैयारी कर रही है। राज्य सरकार और जांच एजेंसियों पर अब इस पूरे मामले की पारदर्शी जांच कराकर दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने का भारी दबाव है।
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