Madhya Pradesh High Court: भोपाल एफएसएल की डीएनए रिपोर्ट्स में कट-पेस्ट त्रुटि के बाद पिछले 5 वर्षों की 20% वैज्ञानिक रिपोर्ट्स की स्वतंत्र जांच के निर्देश

कट-पेस्ट त्रुटि के बाद 20% रिपोर्ट्स की रैंडम जांच, 7 दिन में बनेगी विशेषज्ञ समिति

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Madhya Pradesh High Court: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भोपाल स्थित राज्य फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी की डीएनए रिपोर्ट्स में कट-पेस्ट त्रुटि के मामले को गंभीरता से लेते हुए स्वतंत्र जांच के आदेश दिए हैं। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति विवेक जैन की युगलपीठ ने पिछले पांच वर्षों में तैयार की गई डीएनए और अन्य वैज्ञानिक रिपोर्ट्स में से बीस प्रतिशत रिपोर्ट्स की रैंडम जांच कराने का निर्देश जारी किया है। कोर्ट ने मुख्य सचिव को सात दिन के भीतर प्रदेश के बाहर के तीन वैज्ञानिक अधिकारियों की स्वतंत्र समिति गठित करने को कहा है। यह समिति छह महीने में जांच पूरी करेगी।

हाईकोर्ट ने फोरेंसिक लैब की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि एक मामले में गलत नाम दर्ज होने जैसी गलती सामने आई है तो यह जांचना जरूरी है कि अन्य रिपोर्ट्स में भी ऐसी त्रुटियां तो नहीं हुईं। सुनवाई के दौरान एफएसएल की प्रभारी निदेशक डॉ. हर्षा सिंह अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुईं और उन्होंने स्वीकार किया कि डीएनए रिपोर्ट में गलत नाम दर्ज होना कट-पेस्ट की गलती के कारण हुआ हो सकता है। मामले की अगली सुनवाई चौदह अगस्त को होगी।

Madhya Pradesh High Court: मामले की पृष्ठभूमि और गलत नाम की गलती

यह मामला नर्मदापुरम जिले के साकेत इटारसी निवासी पंकज कुमार बिंदोलिया की आपराधिक अपील से जुड़ा है। पंकज ने पॉक्सो विशेष न्यायालय द्वारा सोलह मार्च 2026 को सुनाई गई उम्रकैद की सजा को चुनौती दी है। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य आया कि इकतीस दिसंबर 2024 की एफएसएल रिपोर्ट में गलत व्यक्ति का नाम दर्ज था। यह त्रुटि कट-पेस्ट के जरिए हुई बताई गई है। कोर्ट ने इस गलती को गंभीरता से लिया क्योंकि फोरेंसिक रिपोर्ट्स आपराधिक मामलों में महत्वपूर्ण सबूत मानी जाती हैं।

डीएनए रिपोर्ट जैसी वैज्ञानिक जांच पर आधारित सबूत अदालतों के फैसलों को प्रभावित करते हैं। यदि रिपोर्ट में नाम या अन्य विवरण गलत दर्ज हो जाएं तो निर्दोष व्यक्ति को सजा या दोषी व्यक्ति के बचने की आशंका बढ़ जाती है। हाईकोर्ट ने इसी चिंता को ध्यान में रखते हुए व्यापक जांच के आदेश दिए हैं ताकि सिस्टम की खामियां सामने आ सकें और भविष्य में ऐसी गलतियां दोहराई न जाएं।

स्वतंत्र समिति गठित करने के निर्देश

कोर्ट ने मुख्य सचिव को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सात दिन के अंदर प्रदेश के बाहर के तीन वैज्ञानिक अधिकारियों की स्वतंत्र समिति बनाई जाए। यह समिति भोपाल एफएसएल की पिछले पांच वर्षों की रिपोर्ट्स में से बीस प्रतिशत रिपोर्ट्स का रैंडम सैंपल लेकर जांच करेगी। समिति को छह महीने का समय दिया गया है ताकि गहन पड़ताल हो सके। बाहरी विशेषज्ञों को शामिल करने का उद्देश्य जांच की निष्पक्षता सुनिश्चित करना है।

हाईकोर्ट का यह कदम फोरेंसिक सिस्टम की विश्वसनीयता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कई आपराधिक मामलों में डीएनए रिपोर्ट अंतिम फैसला तय करने में अहम भूमिका निभाती है। यदि लैब की प्रक्रियाओं में लापरवाही या त्रुटियां हैं तो पूरी न्याय प्रणाली प्रभावित होती है। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि एक गलती सामने आने के बाद पूरे सिस्टम की जांच जरूरी हो जाती है।

एफएसएल निदेशक पद पर विशेषज्ञ नियुक्ति का सुझाव

अदालत ने राज्य सरकार को यह भी निर्देश दिए हैं कि एफएसएल निदेशक पद पर फोरेंसिक साइंस, बायोलॉजी या बायोकैमिस्ट्री जैसे संबंधित विषयों के विशेषज्ञ की नियुक्ति पर गंभीरता से विचार किया जाए। वर्तमान व्यवस्था में प्रशासनिक अधिकारियों के नेतृत्व में लैब चलने से तकनीकी खामियां बढ़ने की आशंका जताई गई है। विशेषज्ञ नेतृत्व से रिपोर्ट्स की गुणवत्ता और सटीकता दोनों सुधर सकती हैं।

डॉ. हर्षा सिंह ने अदालत में कट-पेस्ट गलती की संभावना स्वीकार की। इस पर कोर्ट ने चिंता जताई कि ऐसी छोटी लगने वाली गलती बड़े अन्याय का कारण बन सकती है। फोरेंसिक लैब में काम करने वाले कर्मचारियों की ट्रेनिंग, सॉफ्टवेयर सिस्टम और जांच प्रक्रियाओं की नियमित मॉनिटरिंग की जरूरत पर भी जोर दिया गया।

फोरेंसिक रिपोर्ट्स का महत्व और चुनौतियां

आपराधिक न्याय प्रणाली में फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। डीएनए टेस्ट, फिंगरप्रिंट, बैलिस्टिक और अन्य वैज्ञानिक जांच अदालतों को वस्तुनिष्ठ सबूत उपलब्ध कराती हैं। लेकिन यदि इन रिपोर्ट्स में त्रुटियां होती हैं तो पूरे मुकदमे की दिशा बदल सकती है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का यह आदेश अन्य राज्यों के लिए भी मिसाल बन सकता है जहां फोरेंसिक लैब्स की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते रहे हैं।

कई मामलों में देरी, गलत रिपोर्टिंग या प्रक्रियागत खामियों की शिकायतें सामने आती रही हैं। कट-पेस्ट जैसी गलती तकनीकी लापरवाही को दर्शाती है। आधुनिक सॉफ्टवेयर और ऑटोमेशन के बावजूद मानवीय त्रुटियां हो सकती हैं इसलिए डबल चेक सिस्टम और विशेषज्ञ निगरानी जरूरी है। हाईकोर्ट के आदेश से उम्मीद जगी है कि भोपाल एफएसएल की प्रक्रियाओं में सुधार आएगा।

अगली सुनवाई और संभावित असर

मामले की अगली सुनवाई चौदह अगस्त को निर्धारित है। तब तक मुख्य सचिव को स्वतंत्र समिति गठित करने के निर्देशों का पालन करना होगा। समिति की रिपोर्ट आने के बाद कोर्ट आगे की कार्रवाई तय करेगा। यदि जांच में और त्रुटियां सामने आती हैं तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठ सकती है। साथ ही पुराने मामलों की समीक्षा की भी संभावना बन सकती है जहां एफएसएल रिपोर्ट्स पर आधारित फैसले हुए हैं।

पंकज कुमार बिंदोलिया की अपील में यह मुद्दा उठा था लेकिन कोर्ट ने इसे व्यक्तिगत मामले से आगे बढ़ाकर सिस्टम की जांच का विषय बना दिया। यह न्यायपालिका की सक्रियता को दर्शाता है जहां एक गलती को व्यापक सुधार का अवसर माना गया।

राज्य सरकार और एफएसएल पर दबाव

हाईकोर्ट के आदेश के बाद राज्य प्रशासन पर एफएसएल की कार्यप्रणाली सुधारने का दबाव बढ़ गया है। विशेषज्ञ निदेशक की नियुक्ति, कर्मचारियों की ट्रेनिंग और रिपोर्टिंग सिस्टम को मजबूत बनाने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। फोरेंसिक लैब की विश्वसनीयता बहाल करना न्याय प्रणाली के लिए आवश्यक है क्योंकि आम नागरिक अदालतों और वैज्ञानिक सबूतों पर भरोसा करते हैं।

डीएनए रिपोर्ट जैसी जटिल जांच में छोटी सी गलती बड़े परिणाम ला सकती है। इसलिए प्रक्रियाओं को और अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की जरूरत है। हाईकोर्ट का यह रुख भविष्य में अन्य वैज्ञानिक रिपोर्ट्स की गुणवत्ता सुनिश्चित करने में मददगार साबित हो सकता है।

Madhya Pradesh High Court: न्याय प्रणाली पर प्रभाव

इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर फोरेंसिक सबूतों की सटीकता पर चर्चा छेड़ दी है। आपराधिक मामलों में वैज्ञानिक रिपोर्ट्स को निर्णायक माना जाता है। यदि लैब भरोसेमंद नहीं रहतीं तो निर्दोषों के सजा पाने या दोषियों के बचने का खतरा बढ़ जाता है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने समय रहते इस मुद्दे को गंभीरता से लिया है।

स्वतंत्र जांच से न सिर्फ खामियां सामने आएंगी बल्कि सुधार के उपाय भी सुझाए जा सकेंगे। छह महीने में रिपोर्ट आने के बाद सिस्टम में बदलाव की उम्मीद की जा सकती है। यह आदेश न्यायपालिका की उस भूमिका को रेखांकित करता है जहां वह सिर्फ व्यक्तिगत मामलों का निपटारा नहीं बल्कि व्यवस्थागत सुधार पर भी ध्यान देती है।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का भोपाल एफएसएल की डीएनए रिपोर्ट्स पर स्वतंत्र जांच का आदेश महत्वपूर्ण है। कट-पेस्ट त्रुटि से गलत नाम दर्ज होने के मामले ने फोरेंसिक लैब की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए थे। कोर्ट ने बीस प्रतिशत रिपोर्ट्स की रैंडम जांच और बाहरी विशेषज्ञों की समिति गठित करने के निर्देश देकर इस मुद्दे को गंभीरता से लिया है, जिससे भविष्य में न्याय प्रणाली पर लोगों का भरोसा बना रहे।

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