Karnataka High Court: सोशल मीडिया पर खबर शेयर करने पर FIR रद्द, पुलिस को 6 निर्देश
कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक मामले में FIR रद्द कर सोशल मीडिया शिकायतों पर पुलिस को निर्देश दिए
Karnataka High Court: सोशल मीडिया पर समाचार साझा करने और स्वतंत्र अभिव्यक्ति को लेकर कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि किसी भी मीडिया रिपोर्ट या घटना से संबंधित खबर को केवल सोशल मीडिया पर रीपोस्ट अथवा शेयर कर देने मात्र से विभिन्न समुदायों के बीच नफरत फैलाने का आपराधिक मामला नहीं बनता। जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने ‘कर्नाटक पोर्टफोलियो’ नामक लोकप्रिय एक्स (पूर्व में ट्विटर) हैंडल के एडमिन संदीप कुमार के खिलाफ दक्षिण कन्नड़ जिले के पुत्तूर टाउन पुलिस स्टेशन में दर्ज प्राथमिकी को सिरे से खारिज कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने सोशल मीडिया पोस्ट्स के आधार पर नागरिकों के खिलाफ आंख मूंदकर एफआईआर दर्ज करने की प्रवृत्ति पर कड़ा प्रहार करते हुए राज्य पुलिस महकमे के लिए छह अहम दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
Karnataka High Court: क्या था पुत्तूर की घटना से जुड़ा पूरा विवाद
यह पूरा मामला दक्षिण कन्नड़ जिले के पुत्तूर क्षेत्र से शुरू हुआ था। रिपोर्टों के अनुसार, 8 जुलाई 2026 को छह युवकों द्वारा एक युवती को कथित तौर पर परेशान करने, उसका पीछा करने और धमकाने का मामला सामने आया था। इस संवेदनशील घटना से संबंधित खबर जब मीडिया में प्रसारित हुई, तो ‘कर्नाटक पोर्टफोलियो’ एक्स हैंडल के एडमिन संदीप कुमार ने उस मीडिया रिपोर्ट को रीपोस्ट करते हुए राज्य में महिलाओं की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की स्थिति पर सवाल खड़े किए थे। इसके बाद पुलिस ने एक शिकायत के आधार पर संदीप कुमार के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 353(2) के तहत गंभीर आपराधिक मुकदमा दर्ज कर लिया। इस धारा का उपयोग तब किया जाता है जब कोई व्यक्ति झूठी सूचना, अफवाह या बयान के जरिए विभिन्न धार्मिक या सामाजिक समुदायों के बीच वैमनस्य, शत्रुता या घृणा को बढ़ावा देता है। संदीप कुमार ने इस दंडात्मक कार्रवाई के खिलाफ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
हाई कोर्ट ने एफआईआर रद्द करते हुए दिया तार्किक फैसला
मामले की विस्तृत सुनवाई के दौरान जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने सोशल मीडिया पोस्ट की सामग्री और मूल शिकायत का गहनता से अध्ययन किया। अदालत ने अपने विस्तृत आदेश में रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता ने केवल एक पहले से प्रकाशित समाचार रिपोर्ट को साझा किया था और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाया था। पूरी पोस्ट में कहीं भी किसी विशिष्ट धर्म या समुदाय का नाम तक नहीं लिया गया था और न ही उसमें दो समुदायों के बीच सांप्रदायिक उन्माद भड़काने का कोई आपराधिक इरादा (मेंस रिया) नजर आया। अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा कि केवल किसी घटना की रिपोर्ट को रीपोस्ट करने से कोई व्यक्ति अपराधी नहीं बन जाता। किसी भी नागरिक पर कानूनी धाराएं थोपने से पहले पुलिस अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अपराध के वैधानिक घटक वास्तव में मौजूद हैं या नहीं। इन तर्कों के आधार पर अदालत ने संदीप कुमार के खिलाफ चल रही संपूर्ण कानूनी कार्यवाही को पूरी तरह रद्द कर दिया।
एक ही घटना पर सात अलग-अलग मुकदमे दर्ज करने पर जताई सख्त नाराजगी
हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस बात पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की कि पुत्तूर की एक ही घटना और लगभग समान सोशल मीडिया पोस्ट्स को लेकर एक ही पुलिस स्टेशन में सात अलग-अलग एफआईआर दर्ज कर ली गई थीं। अदालत ने इसे कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग करार देते हुए कहा कि केवल शिकायतकर्ता का नाम बदल जाने से पुलिस को एक ही विषय पर बार-बार समानांतर आपराधिक मामले दर्ज करने की छूट नहीं मिल जाती। पीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक किसी नई शिकायत में किसी बिल्कुल अलग संज्ञेय अपराध या नई घटना के स्वतंत्र तथ्य सामने न आएं, तब तक नागरिकों को बार-बार कानूनी शिकंजे में नहीं फंसाया जाना चाहिए। इस टिप्पणी का उद्देश्य पुलिस के अधिकारों को छीनना नहीं, बल्कि नागरिकों को अनावश्यक कानूनी उत्पीड़न और पुलिसिया प्रताड़ना से सुरक्षा प्रदान करना है।
सोशल मीडिया मामलों में पुलिस के लिए तय किए गए छह अनिवार्य दिशा-निर्देश
सोशल मीडिया पोस्ट्स को लेकर पुलिस द्वारा की जाने वाली मनमानी कार्रवाइयों पर लगाम लगाने के लिए कर्नाटक हाई कोर्ट ने छह अत्यंत कड़े निर्देश जारी किए हैं। पहले निर्देश के अनुसार, किसी भी सोशल मीडिया पोस्ट की शिकायत मिलने पर पुलिस को सबसे पहले यह तकनीकी और कानूनी जांच करनी होगी कि लगाए गए आरोपों में अपराध के बुनियादी तत्व वास्तव में मौजूद हैं या नहीं। केवल धाराओं का उल्लेख भर कर देने से काम नहीं चलेगा। दूसरे निर्देश में यह अनिवार्य किया गया है कि पुलिस को रिकॉर्ड खंगालकर यह देखना होगा कि उसी पोस्ट या घटना को लेकर पहले से कोई मामला तो दर्ज नहीं है। तीसरे निर्देश के तहत, जहां कानून इजाजत देता है, वहां भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173(3) के अंतर्गत प्राथमिक जांच (Preliminary Enquiry) की संभावना तलाशी जाए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि शिकायत केवल राजनीतिक या व्यक्तिगत द्वेष से प्रेरित तो नहीं है।
चौथे निर्देश में अदालत ने स्पष्ट किया कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 353(2) जैसी गंभीर धाराएं लगाने से पहले यह अनिवार्य रूप से सत्यापित करना होगा कि उस बयान से वास्तव में विभिन्न समूहों में दुश्मनी भड़कने की संभावना बन रही है या नहीं। पांचवें निर्देश में पुलिस को सख्त चेतावनी दी गई कि सोशल मीडिया के मामलों में एफआईआर दर्ज होने का मतलब यह कतई नहीं है कि आरोपी को तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाए। पुलिस अधिकारियों को बीएनएसएस की धारा 35 में उल्लिखित गिरफ्तारी संबंधी दिशा-निर्देशों और सुरक्षा उपायों का अक्षरशः पालन करना होगा। छठे और अंतिम निर्देश में अदालत ने कर्नाटक के पुलिस महानिदेशक और पुलिस महानिरीक्षक (DGP & IGP) को यह आदेश दिया कि वे इन सभी छह बिंदुओं को परिपत्र के रूप में राज्य के प्रत्येक पुलिस स्टेशन और जांच अधिकारी तक पहुंचाएं और इसका कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित कराएं।
Karnataka High Court: डिजिटल युग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पत्रकारिता के लिए बड़ी नजीर
कर्नाटक उच्च न्यायालय का यह निर्णय डिजिटल पत्रकारिता, स्वतंत्र विचारकों और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं के मौलिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक युगांतरकारी कदम माना जा रहा है। लोकतांत्रिक ढांचे में सरकार की नीतियों, प्रशासनिक खामियों या अपराध की घटनाओं पर सवाल उठाना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। आलोचना और असहमति को सीधे सांप्रदायिक नफरत या देशविरोधी कृत्य मान लेना कानून के शासन की मूल भावना के विपरीत है। अदालत के इस फैसले से यह साफ संदेश गया है कि सोशल मीडिया पर समाचार साझा करना कोई जुर्म नहीं है और पुलिस को यांत्रिक तरीके से सत्ता के दबाव में काम करने के बजाय कानून और न्याय के तराजू पर हर मामले को तौलना होगा।
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