Jharkhand Student Protest: रांची छात्र आंदोलन में CJP के बड़े चेहरे क्यों हैं गायब? स्थानीय नेतृत्व को आगे करने की रणनीति या अंदरूनी सियासत, उठे कई गंभीर सवाल
CJP ने रांची में स्थानीय नेतृत्व को आगे किया, राष्ट्रीय चेहरों की गैरमौजूदगी पर उठे सवाल
Jharkhand Student Protest: झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों और धांधली के विरोध में छात्रों का आंदोलन लगातार गहराता जा रहा है। राजधानी रांची स्थित जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में राज्यभर से पहुंचे अभ्यर्थी अपनी मांगों को लेकर लगातार डटे हुए हैं। इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक विषय राज्य के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा का केंद्र बना हुआ है। दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर परीक्षा पेपर लीक के खिलाफ विशाल छात्र प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाली कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के मुख्य चेहरे रांची के मुख्य मंच से पूरी तरह नदारद दिखाई दे रहे हैं।
राष्ट्रीय संयोजक अभिजीत दीपके, सह-संयोजक सौरभ दास और आशुतोष रांका जैसे बड़े नाम, जिन्होंने दिल्ली में केंद्र सरकार और शिक्षा मंत्रालय के खिलाफ बड़ा मोर्चा खोला था, रांची के इस आंदोलन में प्रत्यक्ष रूप से नजर नहीं आ रहे हैं। इस अनुपस्थिति को लेकर छात्रों और विश्लेषकों के बीच कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि सीजेपी ने इन दावों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि यह संगठन की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है, ताकि झारखंड के स्थानीय छात्र नेतृत्व को मजबूत और सशक्त बनाया जा सके।
दूसरी ओर, राज्य सरकार और आंदोलनकारी अभ्यर्थियों के बीच वार्ता के दौर जारी हैं। अनशन पर बैठे छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो ने स्पष्ट कर दिया है कि वे केवल ऐसा पारदर्शी परीक्षा तंत्र चाहते हैं, जिससे आने वाली पीढ़ियों को ऐसी अनिश्चितता से न गुजरना पड़े। यदि सरकार की ओर से कोई ठोस समाधान नहीं निकला, तो यह आंदोलन और अधिक उग्र रूप धारण कर सकता है।
Jharkhand Student Protest: स्थानीय नेतृत्व को आगे करने का सीजेपी का दावा और पर्दे के पीछे की रणनीति
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन में सीजेपी ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तक की मांग उठाकर राष्ट्रीय स्तर पर हलचल मचा दी थी। उस दौरान संगठन के शीर्ष पदाधिकारी खुद सड़क पर उतरकर मोर्चा संभाल रहे थे। इसके विपरीत, रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में चल रहे विरोध प्रदर्शन में सीजेपी के राष्ट्रीय चेहरे मंच पर दिखाई नहीं दे रहे हैं। संगठन का कहना है कि यह कोई दूरी बनाने की कोशिश नहीं, बल्कि स्थानीय छात्र नेताओं को स्वावलंबी बनाने की दिशा में उठाया गया एक कदम है।
सीजेपी के राष्ट्रीय संयोजक अभिजीत दीपके ने इस संबंध में छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो से संवाद किया था। जब उनसे रांची जाने को लेकर सवाल पूछा गया, तो उनका कहना था कि महतो झारखंड के स्थानीय मुद्दों और छात्रों की भावनाओं को बेहतर ढंग से समझते हैं और आंदोलन की अगुवाई बहुत प्रभावी तरीके से कर रहे हैं। सीजेपी का उद्देश्य इस आंदोलन का श्रेय लेना या इसे अपने पूर्ण नियंत्रण में लेना बिल्कुल नहीं है।
यद्यपि बड़े चेहरे मंच पर मौजूद नहीं हैं, लेकिन सीजेपी ने एक 25 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल को जमीनी स्थिति का जायजा लेने के लिए झारखंड भेजा है। इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व राजस्थान के सामाजिक और छात्र कार्यकर्ता मुकेश ऑलराउंडर कर रहे हैं। रांची पहुंचे इस प्रतिनिधिमंडल ने अभ्यर्थियों और वालंटियर्स के साथ बैठकें कीं। इस दौरान प्रदर्शन को अनुशासित रखने, सुरक्षा सुनिश्चित करने और कानूनी प्रक्रियाओं को लेकर चर्चा हुई। राष्ट्रीय नेतृत्व के निर्देशानुसार यह तय किया गया है कि संगठन का सहयोग फ्रंट स्टेज से न होकर बैकस्टेज सपोर्ट के रूप में रहेगा।
एबीवीपी का विरोध और बाहरी हस्तक्षेप को लेकर उठे सवाल
रांची में जारी इस छात्र प्रदर्शन के बीच विभिन्न छात्र संगठनों के अलग-अलग दृष्टिकोण भी सामने आ रहे हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने बाहरी संगठनों की भूमिका पर खुले तौर पर आपत्ति जताई है। एबीवीपी नेता सत्यम मिश्रा का कहना है कि झारखंड का छात्र वर्ग अपने अधिकारों के लिए स्वयं लड़ने में सक्षम है और उसे किसी बाहरी संगठन के एजेंडे पर चलने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि रांची के अभ्यर्थियों ने सीजेपी को वैसा समर्थन नहीं दिया है जैसा दिल्ली में देखा गया था।
एबीवीपी का आरोप है कि दिल्ली में हुए प्रदर्शनों के दौरान कुछ वामपंथी और बाहरी तत्वों के कारण स्थितियां तनावपूर्ण हो गई थीं। संगठन का मानना है कि झारखंड के आंदोलन को पूरी तरह गैर-राजनीतिक और शांतिपूर्ण बनाए रखना आवश्यक है। सत्यम मिश्रा के अनुसार, यहां ‘आजादी’ जैसे अनावश्यक नारों या दिल्ली शैली के राजनीतिक एजेंडे की कोई गुंजाइश नहीं है। अभ्यर्थियों का लक्ष्य केवल परीक्षा प्रणाली में सुधार और भ्रष्टाचार पर रोक लगाना होना चाहिए।
राजनीतिक दबाव समूह बनने की राह पर सीजेपी का दीर्घकालिक विजन
आंदोलन में शीर्ष नेताओं की गैर-मौजूदगी पर सीजेपी की कानूनी मामलों की प्रमुख रत्ना सिंह ने संगठन का पक्ष रखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि सीजेपी का लक्ष्य किसी व्यक्ति विशेष की पूजा कराना या खुद को सिर्फ तीन चेहरों की पार्टी के रूप में स्थापित करना नहीं है। संगठन एक राजनीतिक दबाव समूह के रूप में विकसित हो रहा है। उनका कहना है कि जंतर-मंतर का प्रदर्शन भी मूल रूप से एक नेतृत्वविहीन और विकेंद्रीकृत आंदोलन था, जिसकी सफलता ने देश के युवाओं को अपने अधिकारों के लिए खड़े होने का हौसला दिया है।
रत्ना सिंह के अनुसार, जब तक स्थानीय स्तर पर छात्र खुद आगे आकर अपनी मांगों के लिए सरकार से जवाबदेही तय नहीं करेंगे, तब तक कोई भी आंदोलन स्थायी बदलाव नहीं ला सकता। इसलिए युवाओं को सक्षम और आत्मनिर्भर बनाना प्राथमिकता है। उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि सीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व लगातार झारखंड के छात्र नेताओं के संपर्क में है और आवश्यकता पड़ने पर कानूनी अथवा रणनीतिक सहायता प्रदान करने के लिए पूरी तरह तत्पर है।
प्रदर्शन का आंतरिक विभाजन और स्थानीय राजनीति का प्रभाव
रांची का यह आंदोलन शुरुआत से ही कई मोड़ देखता रहा है। 25 जुलाई को बापू वाटिका से शुरू हुआ यह सत्याग्रह बाद में जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में स्थानांतरित कर दिया गया। शुरुआत में सभी अभ्यर्थी परीक्षाओं की सीबीआई जांच की मांग को लेकर एकजुट थे। परंतु समय बीतने के साथ आंदोलनकारी छात्र दो अलग-अलग गुटों में बंटते नजर आए—पहला ‘जेपीएससी-जेएसएससी सुधार मंच’ और दूसरा ‘जेपीएससी-जेएसएससी अभ्यर्थी न्याय मंच’।
इस विभाजन ने आंदोलन की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुधार मंच का आरोप है कि न्याय मंच से जुड़े कई छात्र राज्य के एक नए राजनीतिक दल ‘झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा’ का पक्ष ले रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ, न्याय मंच का दावा है कि दूसरा गुट मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के प्रभाव में काम कर रहा है, क्योंकि विपक्षी नेता लगातार उनसे मुलाकात कर रहे हैं। सरकार के साथ बातचीत के दौरान भी दोनों गुटों ने अपने अलग-अलग प्रतिनिधिमंडल भेजे, जिससे अभ्यर्थियों का पक्ष थोड़ा कमजोर होता दिखा।
जंतर-मंतर और रांची आंदोलन के बीच की असमानताएं
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुआ प्रदर्शन और रांची का यह आंदोलन, दोनों ही परीक्षा में हुई कथित गड़बड़ियों के खिलाफ हैं, लेकिन दोनों की तासीर में बड़ा अंतर है। जंतर-मंतर पर हुआ आंदोलन मुख्य रूप से राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाओं (जैसे नीट) से जुड़ा था, जिसमें पूरे देश के युवा शामिल थे। वहां मीडिया का ध्यान और राष्ट्रीय स्तर का राजनीतिक दबाव बहुत ज्यादा था।
इसके विपरीत, रांची का यह प्रदर्शन राज्य स्तरीय भर्ती परीक्षाओं (जेपीएससी और जेएसएससी) पर केंद्रित है। यहां हिस्सा लेने वाले अभ्यर्थियों में एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो सालों से इन नौकरियों की तैयारी कर रहा है और जिनकी उम्र सीमा भी खत्म होने के कगार पर है। स्थानीय समस्याओं, क्षेत्रीय राजनीति और राज्य सरकार की नीतियों के कारण यहां की चुनौतियां अलग प्रकार की हैं। यही कारण है कि सीजेपी ने यहां सीधा हस्तक्षेप करने के बजाय स्थानीय चेहरे देवेंद्र नाथ महतो को आगे रखने का निर्णय लिया है।
Jharkhand Student Protest: आगामी दिशा और सरकार के साथ बातचीत का महत्व
इस समय अभ्यर्थियों की नजरें सरकार के साथ होने वाली बैठकों और वार्ताओं के नतीजों पर टिकी हैं। अनशन पर बैठे देवेंद्र नाथ महतो की सेहत को लेकर भी चिंताएं बढ़ रही हैं, जिससे प्रशासन पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। यदि सरकार मांगों को मानते हुए परीक्षा प्रणाली में सुधार और पारदर्शी जांच का ठोस आश्वासन देती है, तो यह गतिरोध समाप्त हो सकता है।
यदि वार्ता किसी नतीजे पर नहीं पहुंचती है, तो आंदोलनकारी छात्र राज्यव्यापी प्रदर्शन की तैयारी में हैं। इस पूरे प्रकरण ने भारतीय छात्र राजनीति में एक नया मॉडल पेश किया है, जहां राष्ट्रीय स्तर के संगठन सीधे कमान संभालने के बजाय पर्दे के पीछे रहकर स्थानीय आंदोलनों को खाद-पानी देने की रणनीति अपना रहे हैं। अब देखना यह होगा कि यह रणनीति रांची के छात्रों को उनका हक दिलाने में कितनी कारगर साबित होती है।
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