India Gems Export: अप्रैल 2026 में भारत के रत्न-आभूषण निर्यात में 9.07% की भारी गिरावट, सोने के गहनों का निर्यात 21.77% टूटा – मध्य पूर्व तनाव और अमेरिकी टैरिफ अनिश्चितता का असर

सोने के आभूषण निर्यात 21.77% घटा, कुल निर्यात $2.22 अरब, चांदी के गहनों में 444% उछाल

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India Gems Export: वित्तीय विश्लेषकों और विशेष रूप से सराफा बाजार (Bullion Market) के दिग्गजों के लिए एक अत्यंत गंभीर और विश्लेषणात्मक चिंतन का मुख्य केंद्र बना हुआ है। भारत के सबसे पारंपरिक, प्रतिष्ठित और विदेशी मुद्रा अर्जित करने वाले सर्वोच्च आर्थिक स्तंभों में से एक—रत्न और आभूषण उद्योग (Gem & Jewellery Industry)—के लिए नए वित्त वर्ष का पहला महीना यानी अप्रैल 2026 उम्मीदों के विपरीत एक बहुत बड़ी और खौफनाक मंदी का गवाह बना है। आधिकारिक औद्योगिक आंकड़ों के अनुसार, इस विशिष्ट अवधि के दौरान भारत से होने वाले सोने के आभूषणों (Gold Jewellery Exports) के विदेशी निर्यात में 21.77 प्रतिशत की एक बहुत बड़ी और अभूतपूर्व गिरावट दर्ज की गई है, जिसके चलते यह मूल्य घटकर मात्र 84.15 करोड़ अमेरिकी डॉलर के निचले स्तर पर सिमट गया है। इसके साथ ही, यदि हम समूचे रत्न और आभूषण क्षेत्र के कुल संचयी निर्यात की बात करें, तो उसमें भी पिछले वर्ष के मुकाबले 9.07 प्रतिशत की तीव्र संकुचन देखी गई है, जिससे देश का कुल ज्वेलरी एक्सपोर्ट घटकर 222.64 करोड़ अमेरिकी डॉलर के नाजुक स्तर पर आ गया है।

इस भयंकर और अप्रत्याशित मूल्य गिरावट के पीछे वैश्विक भू-राजनीतिक कूटनीति के कई कड़े और अत्यंत प्रतिकूल कारण एक साथ सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार के विशेषज्ञों का स्पष्ट रूप से मानना है कि पश्चिम एशिया (Middle East) में ईरान और इजरायल के बीच जारी तीव्र सैन्य गतिरोध, पूरी दुनिया के बाजारों में लग्जरी सामानों की मांग में आई भारी सुस्ती और भारत के सबसे बड़े खरीदार देश संयुक्त राज्य अमेरिका में नई अमेरिकी आयात शुल्क (Tariff Policy) को लेकर बनी भयंकर अनिश्चितता ही इस पूरी आर्थिक मंदी के मुख्य सूत्रधार हैं। रत्न और आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद (GJEPC) द्वारा जारी किए गए इन ताजा और डरावने आंकड़ों ने न केवल मुंबई के बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (BKC) और सूरत के हीरा कतई कारखानों में हड़कंप मचा दिया है, बल्कि केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय के भीतर भी गहरी रणनीतिक चिंताएं पैदा कर दी हैं; क्योंकि यह विशिष्ट क्षेत्र देश के विदेशी मुद्रा भंडार को भरने का सबसे बड़ा जरिया होने के साथ-साथ देश के भीतर करोड़ों कुशल कारीगरों और उनके परिवारों को प्रत्यक्ष रोजगार प्रदान करता है। आइए, अप्रैल के इस कमजोर प्रदर्शन, इसके पीछे छिपे आंतरिक तकनीकी कारणों, सप्लाई चेन के व्यवधानों और भविष्य के रोडमैप का गहराई से विस्तार के साथ विस्तृत और विश्लेषणात्मक विश्लेषण करते हैं।

अप्रैल 2026 के निर्यात प्रदर्शन का सूक्ष्म आर्थिक विश्लेषण: आंकड़ों की जुबानी कड़वी हकीकत

रत्न और आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद (GJEPC) द्वारा जारी किए गए रीयल-टाइम डेटा शीट का यदि हम बारीक और सूक्ष्म आर्थिक मूल्यांकन करें, तो यह साफ हो जाता है कि नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत भारतीय आभूषण निर्यातकों के लिए बेहद कमजोर और चुनौतीपूर्ण रही है। पिछले वर्ष की इसी समान अवधि यानी अप्रैल 2025 के दौरान जहाँ भारत का कुल रत्न-आभूषण निर्यात 244.85 करोड़ अमेरिकी डॉलर के एक बेहद सुदृढ़ स्तर पर बना हुआ था, वह अब चालू अप्रैल 2026 में करीब 22 करोड़ डॉलर टूटकर सीधे 222.64 करोड़ डॉलर के स्तर पर आ गया है, जिसे यदि हम भारतीय मुद्रा (INR) के वर्तमान विनिमय दर के अनुसार देखें तो यह मूल्य लगभग 20,825 करोड़ रुपये के भारी वित्तीय घाटे को प्रदर्शित करता है।

इस पूरी मंदी की सबसे मारक और घातक कैंची हमारे सोने के आभूषणों के कारोबार पर चली है, जहाँ 21.77% की संचयी गिरावट के भीतर भी एक और कड़वा तकनीकी सच छिपा हुआ है। आंकड़ों के अनुसार, बिना किसी रत्न या नगीने वाले शुद्ध सोने के आभूषणों, जिन्हें हम साधारण या प्लेन गोल्ड ज्वेलरी (Plain Gold Jewellery) कहते हैं, के अंतरराष्ट्रीय निर्यात में लगभग 47 प्रतिशत की भयंकर और एकतरफा गिरावट दर्ज की गई है, जिसने इस कारीगरी से जुड़े छोटे और मध्यम विनिर्माण कारखानों को पूरी तरह ठप होने की कगार पर पहुँचा दिया है। इसके साथ ही, भारत की विश्व प्रसिद्ध हीरा तराशने की इंडस्ट्री को भी तगड़ा झटका लगा है; जहाँ कटे और पॉलिश्ड हीरों (Cut & Polished Diamonds) का निर्यात 19.65% की गिरावट के साथ मात्र 89.09 करोड़ डॉलर रह गया है, और पिछले कुछ वर्षों से भारत की नई उम्मीद माने जाने वाले लैब ग्रोन डायमंड्स (LGD) के पॉलिश्ड एक्सपोर्ट में भी 15.53 प्रतिशत की आंशिक कमी देखी गई है। इस पूरे अंधेरे के बीच एकमात्र सकारात्मक और चमकीली खबर देश के चांदी के आभूषणों (Silver Jewellery) के मोर्चे से आई है; जहाँ वैश्विक मांग में आए एक बड़े बदलाव के कारण चांदी के गहनों का निर्यात 444 प्रतिशत की एक रिकॉर्ड तोड़ और जोरदार बढ़त के साथ 26.83 करोड़ अमेरिकी डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर जा पहुँचा है, जो यह साफ प्रदर्शित करता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उपभोक्ताओं की क्रय प्राथमिकताएं अब बहुत तेजी से बदल रही हैं।

पश्चिम एशिया का सैन्य संकट: लॉजिस्टिक्स की बाधाएं और अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन का पूरी तरह ध्वस्त होना

जीजेईपीसी (GJEPC) के वर्तमान चेयरमैन किरीट भंसाली ने वाणिज्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ हुई हाई-प्रोफाइल बैठक में यह कड़ाई से साफ किया है कि पश्चिम एशिया (Middle East) की सरजमीं पर जारी भयंकर सैन्य संघर्ष और राजनीतिक अस्थिरता ही इस चालू वित्त वर्ष में आभूषण निर्यात के डूबने की सबसे मुख्य और प्राथमिक वजह है। होर्मुज स्ट्रेट और लाल सागर (Red Sea) के समुद्री मार्गों में वाणिज्यिक जहाजों पर होने वाले हमलों और नाकेबंदी के कारण भारत से यूरोप और खाड़ी देशों को जाने वाली पूरी नौवहन लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन (Supply Chain) पूरी तरह से छिन्न-भिन्न हो चुकी है, जिसके चलते जहाजों का माल ढुलाई किराया और सुरक्षा इंश्योरेंस प्रीमियम रातोंरात आसमान छूने लगा है।

भारत ऐतिहासिक रूप से पश्चिम एशिया के संपन्न देशों के लिए सोने के आभूषणों का एक बहुत बड़ा और पारंपरिक निर्यातक रहा है, जहाँ संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब, ओमान और कतर जैसे देशों के शाही परिवारों और वहां की खुदरा मंडियों में भारतीय सोने की कारीगरी की भयंकर मांग हमेशा बनी रहती थी। परंतु, वर्तमान युद्ध की विभीषिका और क्षेत्रीय असुरक्षा के कारण इन प्रमुख खरीदार देशों के बड़े कॉर्पोरेट खरीदारों ने अपनी नई खरीद को पूरी तरह से होल्ड (रुकवा) दिया है या पुराने ऑर्डर्स की डिलीवरी लेने से साफ मना कर दिया है। इसके अतिरिक्त, अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कीमती धातुओं के दामों में आने वाले रोज-रोज के भारी उतार-चढ़ाव ने विदेशी आभूषण आयातकों को अत्यधिक सतर्क और रक्षात्मक मुद्रा में आने पर मजबूर कर दिया है, जिससे वे नए सौदे करने से पूरी तरह कतरा रहे हैं और इसका सीधा नकारात्मक असर हमारे देश के निर्यात बिल पर साक्षात दिखाई दे रहा है।

अमेरिकी टैरिफ अनिश्चितता और पश्चिमी बाजारों में मंदी की मार: लग्जरी उपभोग में भारी गिरावट

वैश्विक आभूषण व्यापार के कड़े नियमों के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) हमेशा से भारतीय तराशे गए हीरों और नक्काशीदार सोने के आभूषणों का पूरी दुनिया में सबसे बड़ा और सर्वप्रमुख गंतव्य (Largest Destination Market) रहा है। परंतु, साल 2026 के इस दौर में वाशिंगटन की नई सरकार द्वारा अपनी वैश्विक व्यापार नीतियों और विशेष रूप से भारत जैसे विकासशील देशों से आने वाले लग्जरी सामानों पर लगाए जाने वाले इंपोर्ट टैरिफ (Import Tariff Policy) को लेकर जो एक भयंकर नीतिगत अस्पष्टता और कानूनी गतिरोध बना रखा है, उसने अमेरिकी खुदरा बाजार के भीतर एक बड़े असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है। इस अनिश्चितता के खौफ से अमेरिका के बड़े-बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर्स और ज्वेलरी चेन्स के मालिकों ने भारत से होने वाले अपने नियमित आयातों की मात्रा में भारी कटौती कर दी है।

इसके साथ ही, अमेरिका और यूरोपीय संघ के देशों के भीतर आंतरिक खुदरा महंगाई (Retail Inflation) और उच्च ब्याज दरों के लंबे समय तक टिके रहने के कारण वहां के आम नागरिकों की वास्तविक क्रय शक्ति और उपभोक्ता भावना (Consumer Sentiment) इस समय अपने सबसे कमजोर दौर से गुजर रही है। जब किसी भी विकसित देश की अर्थव्यवस्था संकट में होती है, तो वहां का मध्यम वर्ग सबसे पहले अपने गैर-जरूरी और विलासिता के खर्चों, जैसे कि हीरे, सोने के आभूषण और घड़ियों की खरीद पर पूरी तरह से कड़ा ब्रेक लगा देता है। पश्चिमी देशों के उपभोक्ताओं की इसी बदली हुई बचत-केंद्रित मानसिकता का सबसे खौफनाक और सीधा प्रहार भारत के सूरत और मुंबई जैसे एक्सपोर्ट हब्स की ऑर्डर बुक्स पर पड़ा है, जिनकी मैन्युफैक्चरिंग इकाइयां इस समय नए विदेशी ऑर्डर्स के अभाव में पूरी तरह से खाली बैठी हुई हैं।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की आसमान छूती कीमतें: विदेशी खरीदारों की पहुँच से बाहर होती प्लेऑफ ज्वेलरी

अप्रैल 2026 के इस पूरे महीने के दौरान अंतरराष्ट्रीय जिंस एक्सचेंजों (जैसे COMEX) और भारतीय बाजारों में भी सोने की हाजिर कीमतें (Spot Gold Prices) लगातार नए-नए ऐतिहासिक रिकॉर्ड तोड़ती हुई अपने सर्वोच्च शिखर पर बनी रही हैं। सोने के कच्चे माल (Gold Bars) की कीमतों में आई इस अप्रत्याशित और भयंकर तेजी के कारण भारत में निर्मित होने वाली प्लेन गोल्ड ज्वेलरी की अंतिम उत्पादन लागत इतनी अधिक महंगी हो गई कि वह विदेशी थोक खरीदारों के निर्धारित बजटीय दायरे से पूरी तरह बाहर (Out of Budget) हो गई। यही मुख्य वजह है कि विदेशी खरीदारों ने प्लेन गोल्ड के मुकाबले अन्य किफायती धातुओं की ओर अपना रुख बहुत तेजी से मोड़ लिया।

हालांकि, इस कड़े हार्डवेयर डेटा के भीतर एक छोटी सी राहत की बात यह भी देखने को मिली है कि कीमती हीरों और रंगीन रत्नों से जड़े हुए सोने के गहनों, जिन्हें तकनीकी भाषा में स्टडेड गोल्ड ज्वेलरी (Studded Gold Jewellery) कहा जाता है, के निर्यात मूल्य में इस मंदी के बावजूद लगभग 16 प्रतिशत की एक सम्मानजनक और सकारात्मक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह विशिष्ट आंकड़ा साफ तौर पर यह प्रदर्शित करता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारत के केवल साधारण और कम मार्जिन वाले उत्पादों की मांग ही गिरी है, जबकि जो हमारे अत्यधिक मूल्य संवर्धित उत्पाद (Value-Added Products) हैं—जिनमें भारतीय कारीगरों की जटिल नक्काशी, बारीक मीनाकारी और हीरे की जड़ाई का हुनर शामिल है—उनकी साख और मांग वैश्विक रईसों के बीच आज भी मजबूती से अपनी जगह बनाए हुए है; परंतु चूंकि हमारे कुल आभूषण निर्यात में बड़ा हिस्सा प्लेन गोल्ड का होता है, इसलिए इसकी भारी गिरावट को स्टडेड ज्वेलरी का यह छोटा सा मुनाफा पूरी तरह संभालने में नाकाम सिद्ध हुआ।

घरेलू विनिर्माण हब्स पर इस मंदी का प्रभाव: सूरत और मुंबई के कारीगरों के सामने खड़ी रोजगार की चुनौती

रत्न और आभूषण का यह पूरा वैश्विक कारोबार केवल कागजी आंकड़ों या विदेशी मुद्रा की कमाई तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे देश की जमीनी अर्थव्यवस्था का एक ऐसा अत्यंत संवेदनशील और विशाल श्रम-प्रधान (Labor-intensive) स्तंभ है जो गुजरात के सूरत व नवसारी, महाराष्ट्र के मुंबई (SEEPZ), राजस्थान के जयपुर, तथा दिल्ली और कोलकाता जैसे बड़े महानगरीय क्लस्टरों में लाखों हुनरमंद पारंपरिक कारीगरों की रोजी-रोटी का एकमात्र सहारा है। निर्यात के इन आंकड़ों में आई यह 9 प्रतिशत की एकमुश्त गिरावट सीधे तौर पर इन विनिर्माण हब्स के भीतर काम करने वाले जमीनी कारीगरों, हीरा घिसने वाले मजदूरों और छोटे सप्लाई चेन वेंडर्स के घरों के चूल्हे को प्रभावित कर रही है।

ऑर्डर्स की भारी कमी और तैयार माल के स्टॉक (Inventory) के गोदामों में डंप हो जाने के कारण सूरत की कई बड़ी डायमंड प्रोसेसिंग यूनिट्स और मुंबई की एक्सपोर्ट ओरिएंटेड आभूषण इकाइयों ने अपने दैनिक उत्पादन क्षमता को 40 से 50% तक कड़ाई से घटा दिया है; और लागत को नियंत्रित करने के लिए कई फैक्ट्रियों के मालिकों ने अपने कर्मचारियों के काम के दिनों में कटौती (Weekly Offs बढ़ाना) या मजबूरन छंटनी (Layoffs) का एक बेहद दर्दनाक रास्ता अपनाना शुरू कर दिया है। विशेष रूप से डायमंड कटर और पॉलिशर का काम करने वाले मध्यमवर्गीय मजदूर इस समय भयंकर वित्तीय संकट से गुजर रहे हैं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्राकृतिक हीरों के दाम गिरने और लैब ग्रोन डायमंड्स के बाजार में भी आंशिक सुस्ती आ जाने के कारण उनके सामने अपने परिवारों के भरण-पोषण की एक बहुत बड़ी और गंभीर सामाजिक चुनौती खड़ी हो गई है।

सरकार और GJEPC की जुगलबंदी: लॉजिस्टिक्स लागत को कम करने और विशेष राहत पैकेज की मांग

इस गंभीर औद्योगिक संकट और मंदी की मार से अपने निर्यातकों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए रत्न और आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद (GJEPC) ने केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय और वित्त मंत्रालय के सामने कड़े कूटनीतिक सुझाव रखते हुए एक विशेष आपातकालीन वित्तीय पैकेज (Relief Package) जारी करने की पुरजोर अपील की है। काउंसिल की मुख्य मांग यह है कि इस संकटकालीन परिस्थिति को देखते हुए निर्यातकों को मिलने वाले प्री-शिपमेंट और पोस्ट-शिपमेंट वर्किंग कैपिटल लोन पर ब्याज दर की छूट (Interest Equalization Scheme) के दायरे को और अधिक बढ़ाया जाए, ताकि कंपनियों के पास नकदी (Liquidity) का संकट पैदा न हो सके।

इसके साथ ही, जीजेईपीसी ने सरकार से यह भी कड़ा आग्रह किया है कि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर लगने वाले कार्गो हैंडलिंग शुल्कों और कस्टम क्लीयरेंस की प्रक्रियाओं को अत्यधिक सुगम व सस्ता बनाया जाए ताकि भारतीय निर्यातकों की वैश्विक लॉजिस्टिक्स लागत (Logistics Cost) को कम करके उनके उत्पादों को विदेशी बाजारों में प्रतिस्पर्धी बनाया जा सके। यद्यपि केंद्र सरकार अपनी ‘रुपे कार्ड’ डिप्लोमेसी, विभिन्न देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTAs) और ‘ई-कॉमर्स ज्वेलरी एक्सपोर्ट’ जैसी महत्वाकांक्षी नीतियां पहले से ही पूरी मुस्तैदी से चला रही है, परंतु वर्तमान भू-राजनीतिक आग को देखते हुए सराफा बाजार के दिग्गजों का मानना है कि जब तक सरकार कच्चे सोने के आयात पर लगने वाली कस्टम ड्यूटी (सीमा शुल्क) के ढांचे में एक बड़ा और तार्किक सुधार नहीं करती, तब तक भारतीय निर्यातकों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अन्य प्रतिस्पर्धी देशों को मात देना बेहद कठिन साबित होगा।

संकट में छिपा नया स्वर्ण अवसर: चांदी के आभूषणों का चमत्कारी उभार और बाजार विविधीकरण

चिकित्सा और आर्थिक विज्ञान का यह बेहद शाश्वत नियम है कि हर बड़े संकट के भीतर ही एक नई और सुनहरी तरक्की का बीज भी पूरी तरह से छुपा होता है; और भारत के आभूषण उद्योग के लिए यह स्वर्ण अवसर इस समय चांदी के गहनों (Silver Jewellery) के मोर्चे से निकलकर सामने आया है। अप्रैल के महीने में चांदी के आभूषणों के निर्यात में दर्ज की गई 444 प्रतिशत की यह चमत्कारी और ऐतिहासिक वृद्धि इस बात का साक्षात प्रमाण है कि पश्चिमी देशों का जो युवा उपभोक्ता वर्ग सोने की अत्यधिक ऊंचे दामों के कारण उसे खरीद नहीं पा रहा था, वह अब पूरी तेजी के साथ भारतीय चांदी के ट्रेंडी, एंटीक और स्टडेड डिजाइनर आभूषणों की ओर आकर्षित हो रहा है।

भारतीय निर्यातकों को अब अपनी पूरी व्यावसायिक रणनीति को केवल पारंपरिक सोने और हीरों के भरोसे न रखकर, बहुत तेजी से अपने पोर्टफोलियो का विविधीकरण (Diversification) करना होगा। हमें प्लैटिनम आभूषणों, सेमी-प्रीशियस कलर्ड स्टोन्स (जैसे जयपुर के पन्ने और नीलम) और उच्च श्रेणी के फ्यूजन डिजाइनर प्रोडक्ट्स के निर्माण पर अपना पूरा फोकस और निवेश बढ़ाना होगा। आज की इस आधुनिक और जागरूक दुनिया में ‘सस्टेनेबल और एथिकल ज्वेलरी’ (Sustainable & Ethical Fashion) का एक बहुत बड़ा वैश्विक ट्रेंड चल पड़ा है, जहां विदेशी ग्राहक केवल उन आभूषणों को खरीदना पसंद करते हैं जिनके निर्माण में पर्यावरण को नुकसान न पहुँचाया गया हो और कारीगरों को पूरी मजदूरी मिली हो; भारत अपनी प्राचीन हस्तशिल्प और हरित तकनीकों के बल पर इस नए अंतरराष्ट्रीय बाजार पर बहुत आसानी से अपना पूरा कब्जा जमा सकता है।

निष्कर्ष: शॉर्ट-टर्म की यह मंदी भारतीय ज्वेलरी की वैश्विक धाक को तोड़ने में पूरी तरह नाकाम रहेगी

निष्कर्षतः, अप्रैल 2026 के ये ताजा व्यापारिक आंकड़े निश्चित रूप से भारत के रत्न और आभूषण उद्योग के नीति-निर्माताओं और निर्यातकों के लिए एक बहुत बड़ी कड़वी सच्चाई और कड़ा अलार्म (Wake-up Call) हैं। सोने के आभूषणों में 21.77% की यह विशाल गिरावट और कुल एक्सपोर्ट का 9% तक डूब जाना अल्पावधि के लिए हमारी आर्थिक रफ्तार को थोड़ा मद्धम जरूर करेगा; परंतु हमें यह बात भी हमेशा अपने ध्यान में रखनी चाहिए कि भारतीय आभूषणों की साख, यहां के कारीगरों के हाथों का हुनर और हीरों को तराशने की हमारी जो अद्भुत वैश्विक क्षमता है, उसकी बराबरी पूरी दुनिया में दूसरा कोई भी देश (चाहे वह चीन हो या थाईलैंड) कभी नहीं कर सकता। हमारी यह मंदी पूरी तरह से बाहरी और भू-राजनीतिक कारणों से प्रेरित है, हमारी आंतरिक क्षमता में कोई कमी नहीं है।

जैसे ही आगामी महीनों में पश्चिम एशिया का यह सैन्य तनाव शांत होगा, अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतें एक निश्चित स्थिर दायरे में वापस लौटेंगी और अमेरिका की नई सरकार अपनी टैरिफ नीतियों को पूरी तरह स्पष्ट करेगी; वैसे ही भारतीय आभूषणों का यह पूरा निर्यात बाजार एक बार फिर से अपनी पुरानी और बुलेट जैसी तेज रफ्तार को पूरी तरह से हासिल कर लेगा। आगामी त्योहारों और अंतरराष्ट्रीय विंटर वेडिंग सीजन को ध्यान में रखते हुए देश के बड़े निर्यातकों को अभी से ही अपनी डिजिटल मार्केटिंग, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स और अफ्रीका व लैटिन अमेरिका जैसे नए गैर-पारंपरिक बाजारों (New Markets) की ओर अपनी कूटनीतिक पहुँच को मजबूत करना शुरू कर देना चाहिए; क्योंकि कड़े धैर्य, निरंतर इनोवेशन और सरकार के सही प्रशासनिक सहयोग के बल पर हमारा यह गौरवशाली रत्न-आभूषण उद्योग बहुत जल्द इस मंदी के बादलों को चीरकर वैश्विक पटल पर भारत के नाम का डंका एक बार फिर से पूरी मजबूती के साथ बजाएगा।

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