BRICS Summit 2026: ब्रिक्स सम्मेलन से पहले बड़ा खुलासा, भारत-रूस व्यापार में डॉलर की जगह अब रुपया-रूबल, जानें पूरी कहानी

BRICS Summit 2026: ब्रिक्स सम्मेलन से पहले बड़ा खुलासा, भारत-रूस व्यापार में डॉलर की जगह अब रुपया-रूबल, जानें पूरी कहानी

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BRICS Summit 2026: नई दिल्ली में इस सप्ताह होने जा रहे ब्रिक्स सम्मेलन से पहले भारत और रूस के आर्थिक रिश्तों को लेकर एक बड़ी जानकारी सामने आई है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के प्रवक्ता दमित्री पेस्कोव ने खुद इसकी पुष्टि की है कि भारत और रूस ने अपने आपसी व्यापार में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता काफी हद तक कम कर दी है। एक वरिष्ठ रूसी बैंकर के मुताबिक दोनों देशों के बीच करीब 96 प्रतिशत द्विपक्षीय व्यापार का भुगतान अब रुपये और रूबल के जरिए हो रहा है। हालांकि पेस्कोव ने स्पष्ट किया कि रूस औपचारिक रूप से डॉलर को खत्म करने की कोई नीति नहीं अपना रहा, बल्कि मॉस्को भुगतान के हर स्वीकार्य तरीके के लिए खुला है। यह पूरा घटनाक्रम भारत और रूस के बीच बढ़ते आर्थिक सहयोग की एक नई तस्वीर पेश करता है, जो आने वाले दिनों में वैश्विक कारोबार पर भी असर डाल सकता है।

BRICS Summit 2026: पेस्कोव के बयान से खुला डी-डॉलराइजेशन का राज

मंगलवार को ब्रिक्स सम्मेलन से पहले भारतीय पत्रकारों के साथ वर्चुअल बातचीत में पेस्कोव ने रूस की भुगतान व्यवस्था को लेकर कई अहम बातें साझा कीं। उन्होंने बताया कि कुछ देश अपनी राष्ट्रीय मुद्रा का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव के औजार के तौर पर कर रहे हैं, जिसकी वजह से रूस वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। पेस्कोव के अनुसार रूस और ब्रिक्स देशों के बीच करीब 90 फीसदी भुगतान अब स्थानीय मुद्राओं में हो रहा है, हालांकि उन्होंने यह साफ किया कि इसे डॉलर से पूरी तरह मुक्ति नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह डॉलर पर निर्भरता घटाने की दिशा में उठाया गया एक अहम कदम है।

कैसे सुलझा रुपये के भंडार का पुराना पेच

भारत-रूस व्यापार में एक पुरानी समस्या यह रही है कि रूस से भारत का आयात लंबे समय तक निर्यात से कहीं ज्यादा रहा है, खासकर बड़े पैमाने पर तेल खरीद के कारण रूस के पास भारतीय रुपयों का बड़ा भंडार जमा होने लगा था। रूसी कंपनियों के सामने यह सवाल था कि इतनी बड़ी मात्रा में जमा रुपयों का इस्तेमाल कहां किया जाए, जिसकी वजह से व्यापार संतुलन का मुद्दा लगातार चर्चा में रहा। अब पेस्कोव ने बताया है कि रूसी कंपनियों के पास जमा अतिरिक्त रुपयों के इस्तेमाल का मुद्दा धीरे-धीरे सुलझाया जा रहा है, जिससे स्थानीय मुद्रा में कारोबार की सबसे बड़ी व्यावहारिक अड़चन भी कम होती दिख रही है।

भारत के लिए इस बदलाव के क्या मायने हैं

भारत के लिए इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा यह है कि रूस से होने वाले बड़े कारोबार में हर बार डॉलर की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे दोनों देशों के बैंक अपनी-अपनी मुद्राओं में सीधे भुगतान कर सकते हैं। रूस भारत का प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ता है, इसलिए तेल जैसे बड़े कारोबार में भुगतान का यह वैकल्पिक रास्ता भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से भी काफी अहम माना जा रहा है। इसके अलावा अगर भविष्य में किसी वजह से डॉलर आधारित भुगतान व्यवस्था में कोई दिक्कत आती है, तो भारत और रूस के पास पहले से ही एक भरोसेमंद विकल्प मौजूद रहेगा, जो दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों को और मजबूती देगा।

BRICS Summit 2026: क्या चीन के साथ भी संभव होगा ऐसा मॉडल

भारत-रूस के बीच बने इस मॉडल के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या इसी तरह की व्यवस्था चीन के साथ भी लागू हो सकती है। हालांकि भारत का चीन के साथ कारोबार रूस से बिल्कुल अलग है, क्योंकि यहां भारत का आयात निर्यात से कहीं ज्यादा है, जिससे रुपये-युआन आधारित व्यवस्था में भी वही असंतुलन वाला सवाल खड़ा हो सकता है। इसके अलावा भारत और चीन के बीच रणनीतिक और सीमा संबंधी तनाव भी मौजूद है, इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि रूस वाला मॉडल चीन के साथ हूबहू लागू करना आसान नहीं होगा। फिर भी ब्रिक्स के मंच पर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार की बढ़ती चर्चा यह संकेत देती है कि दुनिया के उभरते देश अब सिर्फ एक मुद्रा पर निर्भर रहने के बजाय कई विकल्पों पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं।

रूसी राष्ट्रपति पुतिन 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल होंगे, जबकि इससे पहले 11 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पुतिन के बीच द्विपक्षीय बैठक भी प्रस्तावित है। पेस्कोव के मुताबिक इस बैठक में व्यापार और अर्थव्यवस्था सबसे बड़ा मुद्दा रहेगा, साथ ही दुर्लभ खनिजों की खोज में सहयोग और रूसी एसयू-57 लड़ाकू विमान की भारत को संभावित बिक्री जैसे विषय भी एजेंडे में शामिल हैं। कुल मिलाकर भारत-रूस के बीच रुपये-रूबल में बढ़ता कारोबार यह दिखाता है कि दोनों देश अब सिर्फ कागजी घोषणाओं तक सीमित नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर भी डॉलर के विकल्प को अपना रहे हैं, जिसका असर आने वाले समय में वैश्विक व्यापार व्यवस्था पर भी देखने को मिल सकता है।

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