India Peace Proposal: भारत का 3-सूत्रीय शांति प्रस्ताव, रूस-यूक्रेन युद्ध में ऊर्जा, ब्लैक सी और कमर्शियल शिपिंग पर फोकस
India Peace Proposal: भारत का 3-सूत्रीय शांति प्रस्ताव, रूस-यूक्रेन युद्ध में ऊर्जा, ब्लैक सी और कमर्शियल शिपिंग पर फोकस
India Peace Proposal: रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध को बातचीत के जरिए रोकने की कोशिशों के बीच भारत ने तीन सूत्रों वाला शांति प्रस्ताव रखा है। यह प्रस्ताव केवल तात्कालिक युद्धविराम तक सीमित नहीं है। इसमें ऊर्जा संयंत्रों और जरूरी बुनियादी ढांचे पर हमले रोकना, ब्लैक सी बंदरगाहों से खाद्यान्न की सुरक्षित आवाजाही और रणनीतिक समुद्री मार्गों पर व्यापारी जहाजों की सुरक्षा शामिल है। यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबीहा ने पुष्टि की है कि कीव को यह प्रस्ताव मिला है और उन्होंने इसे मौजूदा अंतरराष्ट्रीय पहलों में व्यापक बताया है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर के अनुसार भारत की भूमिका केवल अपील तक सीमित नहीं है। नई दिल्ली दोनों पक्षों से सीधे और व्यावहारिक स्तर पर बात कर रही है। भारत का रुख लगातार यह रहा है कि इस संघर्ष का समाधान सैन्य कार्रवाई से नहीं, कूटनीति से निकलना चाहिए।
India Peace Proposal: भारत के तीन सूत्रों में ऊर्जा ढांचे की सुरक्षा क्यों शामिल है?
प्रस्ताव का पहला बिंदु दोनों पक्षों से एक-दूसरे के ऊर्जा संयंत्रों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमले रोकने की अपील है। युद्ध के दौरान बिजलीघर, ग्रिड और ऊर्जा से जुड़ी सुविधाएं निशाना बनती रही हैं। इन पर हमले से नागरिकों की बिजली, गर्मी और जरूरी सेवाएं प्रभावित होती हैं। भारत का जोर इस नुकसान को सीमित करने पर है, ताकि युद्ध जारी रहने के दौरान भी मूलभूत सेवाएं पूरी तरह न ठप हों।
अमेरिकी पहल का मुख्य फोकस ऊर्जा क्षेत्र में संघर्ष विराम पर बताया गया है। भारत ने इस मुद्दे को अपने तीन सूत्रों में पहले स्थान पर रखा है, लेकिन इसे अकेले नहीं छोड़ा। ऊर्जा सुरक्षा को खाद्यान्न मार्ग और समुद्री व्यापार से जोड़कर प्रस्ताव को व्यापक बनाया गया है। कीव का कहना है कि अंतिम समझौते को केवल सैन्य गतिविधियों पर रोक तक सीमित नहीं रखना चाहिए। ऊर्जा ढांचा उस सूची में ऊपर है।
ब्लैक सी से खाद्यान्न आपूर्ति का प्रस्ताव क्या कहता है?
दूसरा सूत्र ब्लैक सी के बंदरगाहों से अनाज और अन्य खाद्य सामग्री की सुरक्षित तथा निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करने पर है। युद्ध के बाद से यह समुद्री मार्ग वैश्विक खाद्य आपूर्ति के लिए संवेदनशील बना हुआ है। निर्यात रुकने या असुरक्षित होने का असर उन देशों पर पड़ता है, जो काला सागर से अनाज मंगाते हैं। भारत ने इस मार्ग को खुला और सुरक्षित रखने की बात कही है।
तुर्की और मिस्र की पहल मुख्य रूप से ब्लैक सी के जरिए अनाज के सुरक्षित निर्यात पर केंद्रित बताई गई है। भारत का प्रस्ताव उस दायरे को मानता है, लेकिन उसे अलग नहीं रखता। यूक्रेन के अनुसार ऊर्जा, बंदरगाह और ब्लैक सी की सुरक्षा को किसी भी अंतिम व्यवस्था में शामिल किया जाना जरूरी है। खाद्यान्न वाला बिंदु इसी मांग के करीब है।
कमर्शियल शिपिंग की सुरक्षा को अलग सूत्र क्यों बनाया गया?
तीसरा बिंदु रणनीतिक समुद्री मार्ग से गुजरने वाले व्यापारी जहाजों पर हमले रोकने और समुद्री व्यापार को सुरक्षित रखने से जुड़ा है। अनाज वाहक जहाज ही नहीं, अन्य कमर्शियल शिपिंग भी जोखिम में रही है। भारत ने इसे अलग सूत्र इसलिए रखा है, ताकि सुरक्षा केवल खाद्यान्न कॉरिडोर तक सीमित न रहे। व्यापारिक पोतों पर हमले बीमा, मालभाड़ा और आपूर्ति श्रृंखला तीनों को प्रभावित करते हैं।
रिपोर्टों के अनुसार तुर्की-मिस्र की पहल अनाज निर्यात पर और अमेरिकी प्रस्ताव ऊर्जा संघर्ष विराम पर अधिक केंद्रित है। भारत ने इन दोनों मुद्दों के साथ कमर्शियल शिपिंग को भी जोड़ा है। यूक्रेन ने इसी वजह से भारतीय प्रस्ताव को व्यापक पहलों में गिना है। सिबीहा ने कहा कि कीव को प्रस्ताव मिल चुका है और युद्ध समाप्त करने के लिए अलग-अलग प्रारूपों पर चर्चा की जा सकती है।
जयशंकर और यूक्रेन ने इस पहल पर क्या रुख रखा?
जयशंकर ने साफ किया कि नई दिल्ली दोनों पक्षों के साथ व्यावहारिक बातचीत कर रही है। भारत लंबे समय से कहता रहा है कि समाधान बातचीत से निकले। यूक्रेन ने प्रस्ताव को व्यापक बताया, लेकिन इसे स्वीकार या लागू करने की कोई समयसीमा सार्वजनिक नहीं की। कीव का जोर इस बात पर है कि युद्धविराम केवल मोर्चे पर रुकने तक न सिमटे। ऊर्जा ढांचा, बंदरगाह और ब्लैक सी भी शर्तों का हिस्सा बनें।
इस समय यूक्रेन के सामने तुर्की, मिस्र और अमेरिका की पहल भी है। कीव ने संकेत दिया है कि वह अलग-अलग प्रारूपों पर चर्चा के लिए तैयार है। भारत का प्रस्ताव उन विकल्पों में एक है। किसी पक्ष की ओर से तीनों सूत्रों पर औपचारिक सहमति की खबर अभी नहीं है।
भारत के लिए यह प्रस्ताव कूटनीतिक रूप से क्यों मायने रखता है?
नई दिल्ली के रूस के साथ लंबे रणनीतिक संबंध हैं और पश्चिमी देशों तथा यूक्रेन के साथ भी उसके हित जुड़े हैं। ऐसे में तीन सूत्रों वाला प्रस्ताव युद्ध के मानवीय और आर्थिक असर को कम करने की व्यावहारिक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। यह क्षेत्रीय दावों का फैसला नहीं करता। फोकस बिजली, अनाज और समुद्री व्यापार पर है, जो युद्ध के बाहर भी देशों को प्रभावित करते हैं।
भारत की चुनौती दोनों पक्षों से बात बनाए रखना है, बिना किसी एक खेमे में खड़े हुए। प्रस्ताव उसी संतुलन को दर्शाता है। आगे की दिशा इस पर निर्भर करेगी कि मास्को और कीव इन तीन बिंदुओं पर बातचीत के लिए तैयार होते हैं या नहीं। फिलहाल यह पहल चर्चा में है और यूक्रेन ने इसे व्यापक प्रस्तावों में शामिल किया है।
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