Sensex Today: कच्चे तेल में तेजी और अमेरिका-ईरान तनाव का असर, शेयर बाजार की कमजोर शुरुआत; सेंसेक्स 250 अंक नीचे, निफ्टी भी फिसला

कच्चे तेल की तेजी और भू-राजनीतिक तनाव से बाजार पर दबाव, निफ्टी 24,232 के करीब

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Sensex Today: मंगलवार, 18 अगस्त 2026 को भारतीय शेयर बाजार की शुरुआत सुस्त और दबावपूर्ण रही। कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में आए तेज उछाल और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच निवेशक बेहद सतर्क नजर आए। बंबई स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का प्रमुख संवेदी सूचकांक सेंसेक्स लगभग 250 अंकों की गिरावट के साथ 77,477 के स्तर पर कारोबार करता दिखा। दूसरी ओर, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के निफ्टी 50 में भी लगभग 55 अंकों की नरमी दर्ज की गई और यह 24,232 के आसपास ट्रेड करता नजर आया। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते राजनयिक व सैन्य तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड तेल एक बार फिर 90 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया, जिसने सीधे तौर पर बाजार की धारणा को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया।

इससे पहले सोमवार को भी भारतीय बाजार लगातार पांचवें कारोबारी सत्र में गिरावट के साथ बंद हुए थे, जो 24 जुलाई के बाद का सबसे लंबा गिरावट का दौर था। सोमवार के सत्र में सेंसेक्स 281.09 अंक (0.36%) गिरकर 77,728.16 पर बंद हुआ था, जबकि निफ्टी 78.35 अंक (0.32%) की कमजोरी के साथ 24,287.65 पर समाप्त हुआ था। मंगलवार की कमजोर शुरुआत ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि बाजार पर बना यह दबाव फिलहाल जारी रह सकता है। सिंगापुर स्थित ‘जीआईएफटी निफ्टी’ (GIFT Nifty) भी शुरुआती कारोबार में नकारात्मक रुख दिखा रहा था, जिसने घरेलू बाजारों के लिए पहले ही सुस्त संकेत दे दिए थे।

Sensex Today: कच्चे तेल की कीमतों में उछाल का असर: आयात बिल और महंगाई की चिंता

भारतीय शेयर बाजार पर सबसे बड़ा तात्कालिक दबाव कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण देखा जा रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने मध्य पूर्व से ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने की चिंताओं को बढ़ा दिया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 91 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी 85 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है; ऐसे में तेल की कीमतों में यह वृद्धि देश के व्यापार घाटे (Trade Deficit) को बढ़ा सकती है और भारतीय रुपये पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।

निवेशकों में यह चिंता भी गहरा रही है कि ऊंचे ऊर्जा दाम विभिन्न कंपनियों के परिचालन मार्जिन और कॉर्पोरेट मुनाफे को सीधे चोट पहुंचा सकते हैं, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां ईंधन या लॉजिस्टिक्स लागत मुख्य भूमिका निभाती है। पिछले कुछ कारोबारी सत्रों से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों का उतार-चढ़ाव ही भारतीय शेयर बाजार की दिशा तय कर रहा है। मंगलवार को भी यही रुझान हावी रहा, जिसके चलते ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों पर निवेशकों की करीबी नजर बनी रही जबकि अन्य सेक्टर्स में मिला-जुला रुख देखने को मिला।

सोमवार के बंद भाव और लगातार गिरावट का सिलसिला

सोमवार को बाजार बंद होने के समय बिकवाली का चौतरफा दबाव साफ तौर पर दिखाई दिया था। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों लगातार पांचवें दिन लाल निशान में बंद हुए थे। यह 24 जुलाई के बाद की सबसे लंबी लगातार गिरावट की श्रृंखला है। सोमवार के कारोबार में आईटी (IT) क्षेत्र में सबसे अधिक बिकवाली देखी गई, जबकि मेटल (धातु) और रियल्टी जैसे कुछ चुनिंदा सेक्टर्स ने बाजार को कुछ हद तक सहारा देने का प्रयास किया। दिग्गज आईटी कंपनियों जैसे इन्फोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) और एचसीएल टेक (HCL Tech) के शेयर भारी दबाव में रहे। वहीं दूसरी तरफ, हिंडाल्को और टाटा स्टील जैसे मेटल शेयरों ने निवेशकों को कुछ राहत प्रदान की।

बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, कच्चे तेल के ऊंचे दाम और वैश्विक अनिश्चितता ने निवेशकों को ‘रिस्क-ऑफ’ (जोखिम से बचने) का रुख अपनाने पर मजबूर कर दिया है। इसके अलावा, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) द्वारा की जा रही लगातार बिकवाली भी इस गिरावट की एक मुख्य वजह बनी हुई है। घरेलू संस्थागत और खुदरा निवेशक भी इस स्थिति में सतर्क रुख अपना रहे हैं। तकनीकी चार्ट पर निफ्टी 24,225 के स्तर के आसपास बार-बार सहारा (Support) लेता दिख रहा है, लेकिन ऊपरी स्तरों पर तुरंत बिकवाली का सामना करना पड़ रहा है। मंगलवार की शुरुआत में भी ठीक यही पैटर्न दोहराया गया।

एशियाई बाजारों का रुख और वैश्विक संकेत

भारतीय बाजार के खुलने से पहले एशियाई शेयर बाजारों में भी मिला-जुला और काफी हद तक गिरावट का माहौल देखा गया। जापान का निक्केई 225 (Nikkei 225) सूचकांक लगातार फिसल रहा था, जबकि ऑस्ट्रेलिया का एएसएक्स 200 (ASX 200) लगभग सपाट स्तर पर कारोबार करता नजर आया। हालांकि, दक्षिण कोरिया का कोस्पी (KOSPI) सूचकांक लंबी छुट्टी के बाद खुलने पर अच्छी बढ़त के साथ आगे बढ़ा, लेकिन कुल मिलाकर पूरे एशियाई क्षेत्र से बाजार के लिए संकेत कमजोर ही रहे। बीते सत्र में अमेरिकी शेयर बाजारों (वॉल स्ट्रीट) में भी हल्की गिरावट दर्ज की गई थी, जो वैश्विक स्तर पर निवेशकों के बीच बने जोखिम के माहौल को दर्शाती है।

मध्य पूर्व में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा कीमतों में अचानक आया उछाल एशियाई क्षेत्र की अर्थव्यवस्थाओं के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। भारतीय शेयर बाजार भी इन वैश्विक घटनाक्रमों से सीधे प्रभावित हो रहे हैं। जीआईएफटी निफ्टी के नकारात्मक संकेत के बाद जैसे ही भारतीय बाजार खुले, सूचकांक तुरंत लाल निशान में चले गए। अब निवेशकों की नजरें अमेरिका के केंद्रीय बैंक ‘फेडरल रिजर्व’ की आगामी मौद्रिक नीति बैठकों और आने वाले वैश्विक आर्थिक आंकड़ों पर टिकी हैं।

मुख्य शेयरों और क्षेत्रों का प्रदर्शन

मंगलवार के शुरुआती कारोबारी सत्र में कई प्रमुख क्षेत्रों और कंपनियों के शेयरों में स्पष्ट गिरावट देखी गई। विमानन (Aviation) क्षेत्र के शेयरों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ा; स्पाइसजेट के शेयरों में करीब 1.66 प्रतिशत की कमी आई, जबकि देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंटरग्लोब एविएशन (इंडीगो) के शेयर भी 1 प्रतिशत से अधिक की गिरावट के साथ ट्रेड करते दिखे। उड्डयन क्षेत्र में एविशन टरबाइन फ्यूल (ATF) की लागत बढ़ने की सीधी आशंका के कारण यह बिकवाली देखने को मिली। वहीं, वैश्विक मांग को लेकर बनी अनिश्चितताओं के कारण आईटी सेक्टर पर भी दबाव बना रहा।

हालांकि, ऑटो और मेटल जैसे कुछ सेक्टर्स में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन देखा गया, लेकिन ये सूचकांकों को हरे निशान में लाने के लिए पर्याप्त नहीं थे। बैंकिंग सेक्टर्स के शेयरों में मिला-जुला कारोबार देखने को मिला। बाजार में सेक्टोरल रोटेशन (एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में फंड्स का जाना) साफ नजर आ रहा है; जहां कुछ सेक्टर्स में मुनाफावसूली हो रही है, वहीं कुछ में चुनिंदा खरीदारी आ रही है। व्यापक बाजार में जोखिम उठाने के बजाय निवेशक फिलहाल चुनिंदा गुणवत्ता वाले शेयरों पर ही दांव लगा रहे हैं।

रुपये की चाल और मुद्रा बाजार पर असर

भारतीय रुपये पर भी वैश्विक परिस्थितियों और कच्चे तेल की कीमतों का नकारात्मक असर साफ दिखाई दे रहा है। सोमवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी दर्ज की गई थी और मंगलवार को भी मुद्रा बाजार से ऐसे ही सुस्त संकेत मिलते रहे। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल सीधे तौर पर भारत के आयात बिल (Import Bill) को बढ़ा देता है, जिससे डॉलर की मांग बढ़ जाती है और रुपया कमजोर होने लगता है।

यद्यपि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पास मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) मौजूद है, जो किसी भी बड़े उतार-चढ़ाव को संभालने में सक्षम है, फिर भी अल्पकालिक दबाव बना हुआ है। मुद्रा बाजार के सहभागी फिलहाल कच्चे तेल की चाल और वैश्विक डॉलर सूचकांक (Dollar Index) की मजबूती पर पैनी नजर बनाए हुए हैं। रुपये की इस कमजोरी से आयात पर निर्भर कंपनियों की लागत बढ़ेगी, जबकि आईटी और फार्मा जैसे निर्यात-आधारित (Export-oriented) सेक्टर्स को विनिमय दर का कुछ फायदा मिल सकता है।

सोना-चांदी और कमोडिटी बाजार का हाल

शेयर बाजार में जारी इस अनिश्चितता के बीच कीमती धातुओं के बाजार में भी हलचल तेज हो गई है। सोना और चांदी जैसी कीमती धातुओं की कीमतें भू-राजनीतिक तनाव और मुद्रास्फीति (Inflation) की चिंताओं से प्रभावित हो रही हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना अपने ऊपरी स्तरों के आसपास बना हुआ है, जबकि घरेलू सर्राफा बाजार में भी मजबूत रुझान देखने को मिला है। जब-जब कच्चे तेल में तेजी आती है या युद्ध जैसी स्थितियां बनती हैं, तब-तब निवेशक सोने को एक ‘सुरक्षित निवेश’ (Safe Haven) के रूप में देखते हैं।

भारत के मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर सोना और चांदी के वायदा अनुबंधों में हलचल बनी हुई है। निवेशक अपने पोर्टफोलियो को बाजार के जोखिम से बचाने के लिए सोने और चांदी में निवेश बढ़ा रहे हैं। कमोडिटी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहीं, तो इसका असर अन्य औद्योगिक धातुओं और कृषि कमोडिटीज पर भी देखने को मिल सकता है।

निवेशकों की भावना और आगे की संभावनाएं

वर्तमान में घरेलू शेयर बाजार में अत्यधिक सतर्कता और ‘वेट एंड वॉच’ (इंतजार करो और देखो) का माहौल हावी है। लगातार पांच दिनों की गिरावट के बाद मंगलवार की कमजोर शुरुआत ने खुदरा और संस्थागत दोनों तरह के निवेशकों को रक्षात्मक रुख अपनाने पर मजबूर कर दिया है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि यदि ब्रेंट क्रूड 90 डॉलर के ऊपर ही टिका रहता है, तो भारतीय सूचकांकों पर दबाव बना रहेगा। हालांकि, यदि मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव कम होता है और तेल की आपूर्ति सामान्य होती है, तो निचले स्तरों से बाजार में एक तेज रिकवरी (सुधार) आ सकती है।

घरेलू मोर्चे पर, निवेशक कंपनियों के त्रैमासिक नतीजों और देश के आने वाले आर्थिक आंकड़ों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। यदि विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की बिकवाली की रफ्तार धीमी पड़ती है या वे वापस खरीदारी में आते हैं, तो बाजार को मजबूत सहारा मिलेगा। तकनीकी नजरिए से देखें तो निफ्टी के लिए 24,200 – 24,225 का दायरा बेहद महत्वपूर्ण सपोर्ट जोन (सहारा) बना हुआ है। यदि यह स्तर टूटता है, तो निफ्टी नीचे की तरफ फिसल सकता है। वहीं, ऊपरी स्तरों पर निफ्टी को 24,400 के आसपास कड़े प्रतिरोध (Resistance) का सामना करना पड़ सकता है।

सेंसेक्स के लिए भी 77,500 का स्तर अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ऐसे उतार-चढ़ाव वाले माहौल में खुदरा निवेशक सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के जरिए म्यूचुअल फंड्स में अपना निवेश जारी रखे हुए हैं, जिससे बाजार को निचले स्तरों पर लिक्विडिटी का सहारा मिल रहा है।

भू-राजनीतिक तनाव का सीधा गणित

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य और कूटनीतिक तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है। रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ‘हार्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz)—जहां से दुनिया के कुल कच्चे तेल का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है—वहां किसी भी प्रकार की रुकावट की आशंका मात्र से अंतरराष्ट्रीय व्यापारी प्रीमियम वसूलने लगते हैं।

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर मध्य पूर्व के देशों पर निर्भर है। यदि यह तनाव लंबा खींचता है, तो भारत में ईंधन की दरें, लॉजिस्टिक्स खर्च और अंततः माल ढुलाई महंगी हो सकती है, जिसका सीधा असर देश की खुदरा महंगाई पर पड़ेगा। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक मध्य पूर्व के हालात शांत नहीं होते, तब तक वैश्विक और भारतीय बाजारों में यह उतार-चढ़ाव बना रहेगा।

Sensex Today: निष्कर्ष और निवेशकों के लिए व्यावहारिक रणनीति

मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार की गिरावट के साथ शुरुआत पूरी तरह से कच्चे तेल के उछाल, अमेरिकी-ईरान तनाव और सुस्त वैश्विक संकेतों का नतीजा है। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों ही सूचकांक अपने महत्वपूर्ण तकनीकी स्तरों के आसपास संघर्ष कर रहे हैं।

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