Health Tips: 9 घंटे की डेस्क जॉब से कमजोर हो सकती हैं हड्डियां, 30 की उम्र से ही इन आदतों में करें बदलाव
डेस्क जॉब में लंबे समय तक बैठने से बचें, 30 की उम्र से ही हड्डियों की मजबूती के लिए अपनाएं ये आदतें।
Health Tips: आधुनिक जीवनशैली और कॉरपोरेट संस्कृति के चलते आज की कामकाजी आबादी का एक बड़ा हिस्सा दिन के 8 से 10 घंटे लगातार कंप्यूटर स्क्रीन के सामने एक ही जगह बैठकर बिता रहा है। सुबह घर से निकलकर कैब या कार में बैठना, पूरे दिन ऑफिस की आरामदायक रिवॉल्विंग चेयर पर काम करना और शाम को थककर घर लौटने के बाद सोफे या बिस्तर पर लेटकर मोबाइल चलाना अब एक सामान्य दैनिक दिनचर्या बन चुका है। लेकिन शारीरिक गतिशीलता से पूरी तरह दूर रहने की यह सुस्त जीवनशैली चुपचाप हमारी हड्डियों और कंकाल तंत्र को खोखला कर रही है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक निष्क्रिय बैठे रहने, धूप की कमी, जंक फूड के सेवन और नियमित कसरत के अभाव से हड्डियों का घनत्व तेजी से घटने लगता है। हड्डियों से जुड़ी समस्याओं को केवल वृद्धावस्था की बीमारी मानकर नजरअंदाज करने के बजाय 30 की उम्र पार करते ही अपनी हड्डियों की सेहत के प्रति जागरूक होना बेहद जरूरी है।
Health Tips: लंबे समय तक बैठकर काम करने से हड्डियों पर क्या पड़ता है असर?
मानव कंकाल एक जीवित और निरंतर परिवर्तित होने वाला ढांचा है, जो जीवनभर ‘बोन रीमॉडलिंग’ की एक प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया से गुजरता रहता है। इस प्रक्रिया में पुरानी और कमजोर हड्डी की कोशिकाएं टूटती हैं और उनके स्थान पर नई, मजबूत हड्डी की कोशिकाएं बनती हैं। जब हम दौड़ते हैं, तेज चलते हैं, सीढ़ियां चढ़ते हैं या वजन उठाने वाले व्यायाम करते हैं, तो हड्डियों पर एक सकारात्मक गुरुत्वाकर्षण तनाव पड़ता है, जो नई हड्डियों के निर्माण और कैल्शियम के अवशोषण को सक्रिय करता है। इसके ठीक विपरीत, जब कोई व्यक्ति दिनभर कुर्सी पर निष्क्रिय बैठा रहता है, तो हड्डियों को यह जरूरी मैकेनिकल स्टिम्युलेशन मिलना बंद हो जाता है, जिससे हड्डियां धीरे-धीरे अपनी सघनता खोने लगती हैं।
लगातार घंटों बैठे रहने की यह आदत सीधे तौर पर समय से पहले ‘ऑस्टियोपेनिया’ और आगे चलकर ‘ऑस्टियोपोरोसिस’ के खतरे को बढ़ा देती है। ऑस्टियोपोरोसिस एक ऐसा मौन विकार है जिसमें हड्डियों की आंतरिक संरचना मधुमक्खी के छत्ते की तरह खोखली और बेहद नाजुक हो जाती है, जिससे मामूली झटके, फिसलने या छींकने तक से कूल्हे, रीढ़ या कलाई की हड्डी टूटने का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
मांसपेशियों की कमजोरी और संरचनात्मक असंतुलन के छिपे संकेत
हड्डियों और मांसपेशियों का आपसी संबंध शरीर को गतिशीलता, संतुलन और संरचनात्मक मजबूती प्रदान करने के लिए आधारभूत है। जब हम लंबे समय तक एक ही मुद्रा में बैठे रहते हैं, तो नितंबों की ग्लूटियल मांसपेशियां, कोर और जांघों की मांसपेशियां निष्क्रिय होकर कमजोर पड़ने लगती हैं। यदि आपको चार-छह सीढ़ियां चढ़ते ही पिंडलियों और जांघों में असहनीय दर्द या थकान महसूस होती है, लंबे समय तक लाइन में खड़े रहने में कमर टूटने लगती है, या कुर्सी से उठते समय पीठ में जकड़न होती है, तो यह स्पष्ट संकेत है कि आपका मस्कुलोस्केलेटल सिस्टम दबाव में है।
कमजोर मांसपेशियां शरीर का वजन सही ढंग से संभालने में असमर्थ होती हैं, जिसका पूरा अनुचित दबाव सीधे रीढ़ की हड्डी के डिस्क और घुटने के जोड़ों पर पड़ने लगता है। इसके अलावा, मांसपेशियों की पकड़ कमजोर होने से शरीर का संतुलन बिगड़ता है और अचानक लड़खड़ाकर गिरने की संभावना बढ़ जाती है। यदि किसी व्यक्ति की हड्डियां पहले से ही कमजोर हैं, तो ऐसा मामूली गिरना भी गंभीर और लंबे समय तक बिस्तर पर बांधने वाले फ्रैक्चर का कारण बन सकता है।
30 की उम्र पार करते ही बोन हेल्थ पर ध्यान देना क्यों है अनिवार्य?
मानव शरीर में हड्डियों का विकास और उनकी मजबूती का उच्चतम स्तर यानी ‘पीक बोन मास’ आमतौर पर 25 से 30 वर्ष की आयु के आसपास हासिल हो जाता है। 30 की उम्र तक शरीर हड्डियों के क्षरण से कहीं अधिक तेजी से नई हड्डियों का निर्माण करने में सक्षम होता है। लेकिन जैसे ही 30 का पड़ाव पार होता है, हार्मोनल बदलावों और उम्र बढ़ने के प्राकृतिक प्रभाव के कारण हड्डियों के टूटने की गति उनके बनने की गति से तेज होने लगती है।
विशेष रूप से 30 वर्ष के बाद यदि आहार में पर्याप्त पोषण और जीवनशैली में सक्रियता न हो, तो हड्डियों का द्रव्यमान प्रतिवर्ष एक निश्चित दर से कम होने लगता है। महिलाओं में मेनोपॉज के बाद एस्ट्रोजन हार्मोन की कमी से यह गिरावट और भी तेज हो जाती है, लेकिन पुरुषों में भी 30 के बाद निष्क्रियता के कारण हड्डियां समय से पहले कमजोर हो रही हैं। इसलिए 30 वर्ष की दहलीज पर कदम रखते ही सही पोषण, पर्याप्त कैल्शियम, विटामिन डी और सक्रियता को दिनचर्या का हिस्सा बनाकर ही वृद्धावस्था में होने वाले फ्रैक्चर और झुकती कमर से बचा जा सकता है।
केवल 45 मिनट का जिम वर्कआउट काफी नहीं: ‘एक्टिव सिटिंग’ का महत्व
कई कामकाजी लोग यह मान बैठते हैं कि सुबह या शाम को 30 से 45 मिनट जिम में पसीना बहा लेने से दिनभर की 9 घंटे की कुर्सी पर बैठने वाली निष्क्रियता की पूरी भरपाई हो जाती है। चिकित्सा विज्ञान इसे ‘एक्टिव काउच पोटैटो’ सिंड्रोम कहता है। शोध बताते हैं कि भले ही आप रोजाना एक घंटा कसरत करते हों, लेकिन यदि दिन के शेष 8 से 10 घंटे बिना हिले-डुले एक ही जगह बैठे रहते हैं, तो लंबे समय तक बैठने से होने वाले मेटाबॉलिक और हड्डियों के नुकसान को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता।
जिम में भारी वजन उठाने के साथ-साथ कार्यस्थल पर अपने बैठने के घंटों के दौरान ‘एक्टिव’ रहना उतना ही जरूरी है। इसके लिए काम के बीच हर 30 से 45 मिनट के अंतराल पर अपनी कुर्सी से 2 मिनट के लिए उठना, फोन पर बात करते समय टहलना, लिफ्ट के बजाय एक-दो मंजिल सीढ़ियों का उपयोग करना और अपनी मेज के पास ही खड़े होकर हल्की स्ट्रेचिंग करना शामिल है। यह छोटी-छोटी शारीरिक गतिविधियां पूरे दिन रक्त संचार को बनाए रखती हैं और जोड़ों तथा हड्डियों को जमने से रोकती हैं।
हड्डियों को लोहे जैसा मजबूत बनाने के लिए दैनिक जीवन में जरूरी बदलाव
अपनी हड्डियों को लंबे समय तक स्वस्थ और मजबूत बनाए रखने के लिए सबसे पहले अपने कार्यस्थल के एर्गोनॉमिक्स में सुधार करें। कुर्सी पर बैठते समय अपनी पीठ के निचले हिस्से को सहारा देने के लिए लम्बर कुशन का उपयोग करें, पैरों को जमीन पर सपाट रखें और लैपटॉप या मॉनिटर को आंखों के समानांतर रखें ताकि गर्दन और रीढ़ पर अनुचित झुकाव न बने। काम के दौरान गर्दन और कंधों को गोल घुमाने तथा रीढ़ को सीधा खींचने वाली हल्की स्ट्रेचिंग्स को अपनी आदत बनाएं।
आहार के स्तर पर हड्डियों के निर्माण के लिए जरूरी कच्चे माल की आपूर्ति सुनिश्चित करें। अपने दैनिक भोजन में केवल पैकेज्ड सप्लीमेंट्स के भरोसे रहने के बजाय प्राकृतिक स्रोतों को शामिल करें, जैसे गाय का दूध, गाढ़ा दही, पनीर, रागी, सोयाबीन, काले और सफेद तिल, राजमा, छोले और पालक, मेथी जैसी हरी पत्तेदार सब्जियां। कैल्शियम के साथ-साथ शरीर को इसे हड्डियों में सोखने के लिए पर्याप्त विटामिन डी3 की आवश्यकता होती है, जिसके लिए प्रतिदिन सुबह 15 से 20 मिनट गुनगुनी धूप में बैठना सबसे सुरक्षित और प्राकृतिक माध्यम है। यदि आप सप्लीमेंट्स लेना चाहते हैं, तो बिना डॉक्टर की सलाह और खून की जांच कराए अंधाधुंध गोलियां खाने से बचें।
Health Tips: किन गंभीर लक्षणों पर तुरंत डॉक्टर और बोन डेंसिटी टेस्ट की जरूरत है?
अक्सर हड्डियों की कमजोरी तब तक कोई लक्षण नहीं दिखाती जब तक कि अचानक कोई गंभीर चोट न लग जाए। हालांकि, यदि आप लगातार पीठ के निचले हिस्से या गर्दन में सुस्त दर्द महसूस करते हैं, बिना किसी भारी चोट के केवल मामूली ठोकर लगने से कलाई या पैर में फ्रैक्चर हो जाता है, आपके चलने के तरीके में लचक आने लगी है या कद में थोड़ा झुकाव महसूस हो रहा है, तो इसे बिल्कुल भी सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज न करें।
ऐसे संकेत दिखने पर तुरंत किसी हड्डी रोग विशेषज्ञ या फिजिशियन से परामर्श लेना चाहिए। डॉक्टर आपकी स्थिति का सटीक मूल्यांकन करने के लिए खून में विटामिन डी और सीरम कैल्शियम के स्तर की जांच कराने के साथ-साथ ‘डेक्सा स्कैन’ (DEXA Scan यानी Dual-Energy X-ray Absorptiometry) कराने की सलाह दे सकते हैं। डेक्सा स्कैन एक दर्द रहित और बेहद सटीक परीक्षण है जो रीढ़ और कूल्हे की हड्डियों के घनत्व (T-Score) को मापकर यह बता देता है कि आपकी हड्डियां सामान्य हैं, ऑस्टियोपेनिया के शुरुआती दौर में हैं या ऑस्टियोपोरोसिस के गंभीर खतरे में पहुंच चुकी हैं। समय पर सही पहचान और दवाओं व जीवनशैली में सुधार से हड्डियों को दोबारा मजबूत बनाया जा सकता है।
Read more here
SBI Loan Interest Rate Hike: SBI ने लोन की ब्याज दरें बढ़ाईं, अब EMI बढ़ सकती है, नई दरें चेक करें
Bihar News: राघोपुर नाव हादसे पर तेजस्वी यादव का आरोप, बच्चों की मौत पर सरकार को घेरा