Delhi High Court: महिला पर भी लग सकता है सामूहिक दुष्कर्म का आरोप, हाईकोर्ट ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला
दिल्ली हाईकोर्ट ने साझा आपराधिक मंशा और सामूहिक सहभागिता के आधार पर महिला के खिलाफ तय आरोपों को बरकरार रखा।
Delhi High Court: दिल्ली हाईकोर्ट ने यौन अपराधों और सामूहिक दुष्कर्म के विधिक दायित्व से जुड़े एक अत्यंत संवेदनशील मामले में ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई महिला साझा आपराधिक मंशा (Common Intention) रखते हुए अपराध को अंजाम देने में सक्रिय सहयोग करती है या षड्यंत्र का हिस्सा बनती है, तो उस पर भी सामूहिक दुष्कर्म (Gang Rape) का कानूनी आरोप लगाया जा सकता है। अदालत ने रेखांकित किया कि इसके लिए यह कतई आवश्यक नहीं है कि आरोपी महिला ने स्वयं शारीरिक रूप से दुष्कर्म का कृत्य किया हो। न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी की एकल पीठ ने निचली अदालत द्वारा एक महिला के खिलाफ सामूहिक दुष्कर्म और पॉक्सो अधिनियम के तहत तय किए गए आरोपों को बरकरार रखते हुए उसकी आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया।
Delhi High Court: कानून में ‘व्यक्ति’ शब्द केवल पुरुषों तक सीमित नहीं: हाईकोर्ट की अहम व्याख्या
न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी ने अपने विस्तृत आदेश में विधिक भाषा की बारीकियों की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि सामूहिक दुष्कर्म से संबंधित वैधानिक प्रावधानों में प्रयुक्त ‘व्यक्ति’ (Persons) शब्द को केवल पुरुष वर्ग तक सीमित रखकर नहीं देखा जा सकता। अदालत ने रेखांकित किया कि जब एक या एक से अधिक लोग किसी महिला के साथ दुष्कर्म करने के साझा इरादे से कोई कृत्य करते हैं, तो उस समूह का प्रत्येक सदस्य, चाहे उसका लिंग कुछ भी हो, उस अपराध के लिए समान रूप से जिम्मेदार माना जाएगा।
अदालत ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376D और नए आपराधिक कानून भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 70 का संदर्भ लेते हुए कहा कि वर्ष 2013 के आपराधिक कानून संशोधन के बाद सामूहिक दुष्कर्म को एक स्वतंत्र और गंभीर अपराध के रूप में संहिताबद्ध किया गया है। कानून का मूल उद्देश्य ऐसे अपराधों में सहायता करने, पीड़िता को विवश करने या अपराध स्थल पर उपस्थित होकर सहयोग देने वाले प्रत्येक सह-अभियुक्त को कठोर दंड के दायरे में लाना है। केवल महिला होने के आधार पर किसी को इस गंभीर आरोप से अलग नहीं किया जा सकता, यदि अभियोजन प्रथम दृष्टया उसकी सक्रिय संलिप्तता और आपराधिक मंशा सिद्ध करने में सक्षम है।
नाबालिग बेटी के यौन शोषण में मां की संलिप्तता का झकझोर देने वाला मामला
यह पूरा मामला एक नाबालिग किशोरी से जुड़ा है, जिसने अपनी ही सगी मां पर अत्यधिक गंभीर और चौंकाने वाले आरोप लगाए थे। अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता ने बयान दर्ज कराया था कि उसकी मां ने उसे डरा-धमकाकर और दबाव बनाकर एक अन्य सह-आरोपी पुरुष के साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर किया था। पीड़िता के अनुसार, दिसंबर 2023 से जुलाई 2024 के बीच की अवधि में उसकी मां की मौजूदगी और सहमति से इस घिनौने कृत्य को कई बार अंजाम दिया गया।
इस मामले में पुलिस ने जांच के बाद मां और सह-आरोपी पुरुष के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं और यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) कानून की सुसंगत धाराओं के तहत आरोप पत्र दाखिल किया था। तीस हजारी स्थित विशेष अदालत ने 17 जनवरी 2025 को दोनों आरोपियों के खिलाफ सामूहिक दुष्कर्म और पॉक्सो के तहत आरोप तय करने का आदेश दिया था, जिसके खिलाफ याचिकाकर्ता महिला ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।
याचिकाकर्ता महिला की कानूनी दलीलें और अदालत का कड़ा रुख
याचिकाकर्ता महिला के वकील ने अदालत में तर्क दिया था कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 63 और पूर्ववर्ती आईपीसी की धारा 375 में दुष्कर्म की परिभाषा केवल एक पुरुष द्वारा किए जाने वाले कृत्य के रूप में दी गई है। बचाव पक्ष का मुख्य तर्क यह था कि जैविक और कानूनी रूप से जब कोई महिला स्वयं दुष्कर्म का अपराध नहीं कर सकती, तो उस पर सामूहिक दुष्कर्म की धारा 70 या 376D के तहत आरोप तय करना कानूनन त्रुटिपूर्ण और अवैध है।
उच्च न्यायालय ने बचाव पक्ष के इस तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि एकल दुष्कर्म की परिभाषा और सामूहिक दुष्कर्म के सिद्धांत में स्पष्ट विधिक अंतर है। सामूहिक दुष्कर्म में आपराधिक दायित्व केवल शारीरिक क्रिया पर आधारित न होकर सामूहिक सहभागिता, सुविधा प्रदान करने और साझा आशय पर टिका होता है। अदालत ने कहा कि यदि कोई मां अपनी ही नाबालिग संतान को किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दुष्कर्म किए जाने के लिए सौंपती है या विवश करती है, तो वह उस अपराध को अंजाम देने वाले समूह का एक अभिन्न हिस्सा बन जाती है, जिसे कानून की नजर में समान रूप से दंडनीय माना जाएगा।
क्या कोई महिला अकेले दुष्कर्म की आरोपी बन सकती है? अदालत की सीमा रेखा
अपने इस अभूतपूर्व फैसले के साथ दिल्ली हाईकोर्ट ने एक स्पष्ट विधिक सीमा रेखा भी तय की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके समक्ष यह सवाल नहीं था कि क्या कोई महिला अकेले दम पर दुष्कर्म का अपराध कर सकती है या नहीं। कानून आज भी व्यक्तिगत दुष्कर्म को पुरुष द्वारा किया जाने वाला अपराध ही मानता है।
अदालत का यह फैसला केवल और केवल उन परिस्थितियों तक सीमित है जहां सामूहिक दुष्कर्म के अपराध में एक महिला सह-षड्यंत्रकारी, उकसाने वाली या सुविधा प्रदाता के रूप में किसी पुरुष आरोपी के साथ साझा मंशा रखती है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि वर्तमान फैसला केवल निचली अदालत द्वारा आरोप (Charges) तय किए जाने की वैधानिकता पर आधारित है। इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि महिला को दोषी ठहरा दिया गया है; अंतिम निर्णय निचली अदालत में चलने वाले मुकदमे, पेश किए जाने वाले गवाहों और साक्ष्यों के गहन परीक्षण के बाद ही निर्धारित होगा।
Delhi High Court: भारतीय न्यायशास्त्र में फैसले की प्रासंगिकता और दूरगामी प्रभाव
दिल्ली हाईकोर्ट का यह निर्णय भारतीय आपराधिक न्यायशास्त्र में महिलाओं और बालिकाओं की सुरक्षा को सुदृढ़ करने की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण नजीर बनेगा। अक्सर ऐसे जटिल मामलों में जहां परिवार की कोई महिला या कोई अन्य महिला पीड़िता को यौन तस्करों या बलात्कारियों के हवाले करने में बिचौलिए की भूमिका निभाती थी, वे लिंग का सहारा लेकर दुष्कर्म की कड़ी धाराओं से बच जाती थीं।
न्यायालय के इस रुख से यह स्पष्ट संदेश गया है कि जघन्य यौन अपराधों में न्यायिक उत्तरदायित्व तय करते समय आरोपी के लिंग को ढाल नहीं बनने दिया जाएगा। अपराध में निभाई गई सक्रिय भूमिका, साठगांठ और आपराधिक मंशा ही कानूनी उत्तरदायित्व का पैमाना होगी। यह निर्णय विशेष रूप से नाबालिगों के संरक्षण और मानव तस्करी जैसे सिंडिकेट्स के खिलाफ कानूनी शिकंजा कसने में जांच एजेंसियों और अभियोजन पक्ष के लिए एक सशक्त विधिक आधार प्रदान करेगा।
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