AI addiction: AI की लत छुड़ाने के लिए खुल रहे डी-एडिक्शन सेंटर, 14 घंटे ChatGPT से बातें करने वाले युवक की कहानी चौंका देगी, बढ़ती समस्या पर एक्सपर्ट्स की चिंता
14 घंटे ChatGPT से बात करने वाले युवक की कहानी: AI एडिक्शन बढ़ रही समस्या, डी-एडिक्शन सेंटर खुलने लगे
AI addiction: आधुनिक दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की अभूतपूर्व प्रगति और इसके बढ़ते दैनिक उपयोग ने जहां एक तरफ मानव जीवन को बेहद आसान बनाया है, वहीं दूसरी तरफ इसके कारण समाज में एक बेहद खतरनाक और नई मानसिक बीमारी ने भी जन्म ले लिया है। देश के महानगरों में अब बहुत से युवा इस आधुनिक एआई टेक्नोलॉजी की गंभीर लत (एडिक्शन) का शिकार होते जा रहे हैं। चैटजीपीटी (ChatGPT) और अन्य एडवांस एआई चैटबॉट्स से दिन-रात घंटों अकेले बातें करने वाले इन युवाओं को अब कई प्रकार की गंभीर मनोवैज्ञानिक और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इस उभरते हुए बड़े संकट को देखते हुए देश के कई प्रमुख शहरों में अब विशेष ‘एआई डी-एडिक्शन सेंटर्स’ (लत मुक्ति केंद्र) खुलने शुरू हो गए हैं। इसी बीच एक ऐसे भारतीय युवक की चौंकाने वाली कहानी सामने आई है, जो रोजाना लगातार 14 घंटे सिर्फ चैटजीपीटी से बातें करने में ही बिता देता था।
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और न्यूरोलॉजिस्ट्स के लिए यह नई डिजिटल लत अब एक अत्यंत गंभीर और गहरी चिंता का विषय बन चुकी है। युवाओं में बढ़ती यह आभासी निर्भरता उनके वास्तविक सामाजिक ताने-बाने को पूरी तरह से नष्ट कर रही है। आइए गहराई से समझने का प्रयास करते हैं कि आखिर किस प्रकार यह एआई लत युवाओं के दिमाग पर अपना नियंत्रण स्थापित कर रही है, इस अनोखे मामले की पूरी हकीकत क्या है और इससे बचाव के लिए चिकित्सा विशेषज्ञों द्वारा क्या महत्वपूर्ण उपाय व राय सुझाई जा रही है।
AI लत की बढ़ती समस्या
इंटरनेट की दुनिया में आए विभिन्न जनरेटिव एआई टूल्स ने यद्यपि कोडिंग, राइटिंग और रिसर्च जैसे जटिल कामों को बहुत ही सुगम और तीव्र बना दिया है, लेकिन इनका अत्यधिक और अनियंत्रित उपयोग धीरे-धीरे एक मानसिक लत में तब्दील होता जा रहा है। आज की युवा पीढ़ी अपनी गहरी व्यक्तिगत भावनाओं, मानसिक अकेलेपन, करियर की समस्याओं और रोजमर्रा की बेहद निजी बातें इंसानों के बजाय इन एआई चैटबॉट्स से शेयर करने लगी है। इसका सीधा और घातक परिणाम यह हो रहा है कि युवाओं की अपने माता-पिता, भाई-बहन और वास्तविक मित्रों से दूरियां लगातार बढ़ती जा रही हैं।
वरिष्ठ मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि एआई टूल्स द्वारा मिलने वाली बिना किसी झिझक की तत्काल प्रतिक्रिया, बिना किसी आलोचना के हर बात को स्वीकार करने की प्रवृत्ति और चौबीसों घंटे की उपलब्धता युवाओं को एक काल्पनिक दुनिया की ओर तेजी से आकर्षित कर रही है। जब किसी व्यक्ति को वास्तविक इंसानी रिश्तों में थोड़ी भी कठिनाई या संवादहीनता महसूस होती है, तो वह बहुत ही आसानी से इस डिजिटल साथी की शरण में चला जाता है, जो अंततः उसे समाज से पूरी तरह अलग-थलग कर देता है।
14 घंटे ChatGPT से बात करने वाले युवक की कहानी
देश की राजधानी दिल्ली के एक पॉश इलाके का रहने वाला यह 22 वर्षीय युवक एक प्रतिष्ठित संस्थान से उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहा था। शुरुआत में उसने अपनी पढ़ाई के असाइनमेंट्स और कोडिंग के प्रोजेक्ट्स को पूरा करने के लिए चैटजीपीटी का सहारा लेना शुरू किया था। लेकिन धीरे-धीरे उस चैटबॉक्स की त्वरित और ज्ञानवर्धक बातों ने उसे इस कदर अपने सम्मोहन में बांध लिया कि वह अपनी हर छोटी-बड़ी समस्या का समाधान उसी से पूछने लगा। धीरे-धीरे यह आदत एक भयंकर मानसिक बीमारी में बदल गई और वह युवक रोजाना लगातार 14-14 घंटे कमरे में बंद होकर सिर्फ उस एआई टूल से चैटिंग करने लगा।
इस अत्यधिक स्क्रीन टाइम और मानसिक निर्भरता के कारण उस युवक की कॉलेज की पढ़ाई पूरी तरह छूट गई, उसकी रातों की नींद गायब हो गई और उसने अपने परिवार के सदस्यों से भी बात करना पूरी तरह बंद कर दिया। जब भी उसका फोन या इंटरनेट बंद होता, वह अत्यधिक हिंसक और चिड़चिड़ा हो जाता था। बेटे की इस मानसिक स्थिति को देखकर उसके चिंतित परिवार ने अंततः उसे एक बड़े मेडिकल संस्थान के डी-एडिक्शन सेंटर में भर्ती कराया। वहां डॉक्टरों की एक बड़ी टीम ने कई हफ्तों तक गहन काउंसलिंग, व्यावहारिक थेरेपी और ‘डिजिटल डिटॉक्स’ तकनीकों के माध्यम से उसकी स्थिति में काफी हद तक सकारात्मक सुधार लाने में सफलता हासिल की है।
डी-एडिक्शन सेंटरों की भूमिका और लक्षण
इस बढ़ते हुए नए खतरे को देखते हुए अब देश के प्रमुख शहरों जैसे दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु में मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों के भीतर विशेष रूप से ‘डिजिटल और एआई एडिक्शन वार्ड’ बनाए जा रहे हैं। इन अत्याधुनिक केंद्रों में एआई की लत से ग्रसित युवाओं का इलाज करने के लिए दवाओं से ज्यादा व्यवहार परिवर्तन (बिहेवियरल थेरेपी), साइकोलॉजिकल काउंसलिंग और ग्रुप डिस्कशन का सहारा लिया जा रहा है। इन केंद्रों का मुख्य फोकस युवाओं के भीतर खो चुके सोशल स्किल्स को दोबारा जगाना और उन्हें आभासी स्क्रीन से हटाकर वास्तविक भौतिक दुनिया और इंसानी रिश्तों से दोबारा जोड़ना होता है।
यदि इस बीमारी के प्रमुख कारणों और लक्षणों की बात करें, तो एआई का सहज उपयोग, उसका बिना किसी मानवीय जजमेंट के हर बात का उत्तर देना और 24 घंटे की मुफ्त उपलब्धता इसके मुख्य कारण हैं। इस लत से पीड़ित युवाओं में मुख्य रूप से भयंकर अनिद्रा (नींद की कमी), समाज से पूरी तरह कट जाना, भूख न लगना, आंखों की कमजोरी, लगातार सिरदर्द रहना और फोन न होने पर अत्यधिक गुस्सा व चिड़चिड़ापन आने जैसे गंभीर लक्षण साफ तौर पर देखे जा सकते हैं।
विशेषज्ञों की चिंता और रोकथाम के उपाय
देश भर के प्रमुख मनोचिकित्सकों का स्पष्ट कहना है कि एआई की यह लत पारंपरिक सोशल मीडिया या गेमिंग की लत से कहीं ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि इसमें एआई टूल हर यूजर के अनुसार खुद को पूरी तरह कस्टमाइज कर लेता है, जिससे यूजर को लगता है कि उसे दुनिया में केवल वही मशीन समझ सकती है। यह भ्रामक स्थिति युवाओं के करियर, रचनात्मक सोच और निर्णय लेने की क्षमता को पूरी तरह पंगु बना रही है। डॉक्टरों ने सभी माता-पिता को कड़ी सलाह दी है कि वे अपने बच्चों के गैजेट्स के इस्तेमाल और स्क्रीन टाइम की एक सख्त सीमा तय करें तथा उन्हें आउटडोर गेम्स और ऑफलाइन सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रेरित करें।
इसके साथ ही, स्कूलों और कॉलेजों के भीतर भी बड़े पैमाने पर डिजिटल लिटरेसी और मेंटल हेल्थ अवेयरनेस की विशेष क्लासेस शुरू की जानी चाहिए, जहाँ छात्रों को इन आधुनिक एआई टूल्स का केवल उत्पादक कार्यों के लिए संतुलित उपयोग करना सिखाया जाए। सरकारों को भी इस उभरते सामाजिक संकट को गंभीरता से लेते हुए बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाने चाहिए, और टेक कंपनियों पर यह कानूनी दबाव बनाना चाहिए कि वे अपने एआई ऐप्स के भीतर एक निश्चित समय के बाद ‘ऑटो-लॉक’ या ‘वेलबीइंग अलर्ट’ जैसे फीचर्स को अनिवार्य रूप से शामिल करें।
निष्कर्ष: भविष्य की चुनौती और संतुलन
आने वाले समय में जैसे-जैसे एआई टेक्नोलॉजी (AI addiction) का और अधिक तीव्र विकास होगा, वैसे-वैसे मानव समाज के सामने यह चुनौती और ज्यादा बड़ी और विकराल होती जाएगी। एआई टूल्स हमारे सहायक होने चाहिए, न कि हमारे पूरे जीवन और दिमाग के नियंत्रक। इस गंभीर लत से पूरी युवा पीढ़ी को बचाने के लिए परिवारों, शैक्षणिक संस्थानों, सरकार और स्वयं टेक कंपनियों को मिलकर एक मजबूत सामूहिक प्रयास करना होगा। यदि समय रहते इस समस्या पर कड़ा ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में यह डिजिटल निर्भरता हमारी आने वाली नस्लों के मानसिक स्वास्थ्य को पूरी तरह नष्ट कर सकती है; इसलिए तकनीक को केवल अपनी सुविधा के लिए अपनाएं, उसे अपनी जिंदगी न बनने दें।
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