Commonwealth Games 2026: तीन साल के बेटे की मां और पीएचडी स्कॉलर सीमा कलीरामना ने ग्लासगो में जीता कांस्य, डिस्कस थ्रो में रचा इतिहास

तीन साल के बेटे की मां और पीएचडी स्कॉलर सीमा कलीरामना ने ग्लासगो में डिस्कस थ्रो में भारत को दिलाया कांस्य पदक।

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Commonwealth Games 2026: स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित राष्ट्रमंडल खेल 2026 में भारतीय एथलेटिक्स दल ने एक ऐतिहासिक और गर्व से भर देने वाला पल अपने नाम किया है। हरियाणा के भिवानी जिले की 27 वर्षीय जांबाज एथलीट सीमा कलीरामना ने महिलाओं के डिस्कस थ्रो स्पर्धा में 58.65 मीटर की दूरी तय करते हुए कांस्य पदक पर कब्जा जमाया। तीन साल के मासूम बच्चे की मां होने और इसके साथ ही शारीरिक शिक्षा में पीएचडी की पढ़ाई पूरी करने के दोहरे संघर्ष के बीच सीमा का यह अभूतपूर्व प्रदर्शन न केवल उनके व्यक्तिगत समर्पण की जीत है, बल्कि यह देश की करोड़ों महिलाओं और माताओं के लिए दृढ़ संकल्प और अटूट इच्छाशक्ति का एक अमिट प्रतीक बन गया है। इस कांस्य पदक के साथ ही सीमा ने यह साबित कर दिया है कि यदि सपनों को पूरा करने की जिद हो, तो पारिवारिक जिम्मेदारियाँ और जीवन की परिस्थितियाँ कभी भी सफलता के मार्ग में बाधा नहीं बन सकतीं।

फाइनल्स की रोमांचक जंग और सीमा का थ्रो बाय थ्रो प्रदर्शन

ग्लासगो के प्रसिद्ध स्कॉट्स्टाउन स्टेडियम में आयोजित महिला डिस्कस थ्रो का फाइनल मुकाबला बेहद उतार-चढ़ाव और रोमांच से भरा रहा। स्कॉटलैंड की कड़ाके की ठंड और जमा देने वाली हवाओं के बीच प्रतियोगिता की शुरुआत सीमा के लिए थोड़ी निराशाजनक रही। उनका पहला थ्रो नेट से टकराकर फाउल घोषित हो गया, जिससे उन पर दबाव बढ़ गया था। परंतु हार न मानने का जज्बा रखने वाली सीमा ने दूसरे प्रयास में शानदार वापसी करते हुए 57.32 मीटर की दूरी नापी और सीधे तीसरे स्थान पर पहुँच गईं। इसके बाद तीसरे दौर में अपनी पूरी ताकत और सटीक तकनीक का प्रदर्शन करते हुए सीमा ने 58.65 मीटर का थ्रो फेंका, जिसने उन्हें पदक की रेस में मजबूती से बनाए रखा। हालांकि, इसके बाद के उनके तीन थ्रो फाउल रहे, जिससे अंतिम राउंड तक पदक की सांसे अटकी रहीं।

अंतिम दौर में कैमरून की ताकतवर एथलीट मोनी नोरा अतिम के पास सीमा को पछाड़कर पदक छीनने का अंतिम मौका था, लेकिन वह केवल 11.18 मीटर ही फेंक सकीं और इस तरह सीमा का कांस्य पदक पूरी तरह पक्का हो गया। इस प्रतियोगिता में जमैका की सामंथा हॉल ने 61.66 मीटर के विशाल थ्रो के साथ स्वर्ण पदक हासिल किया, जबकि कनाडा की जूलिया टंक्स ने 60.67 मीटर का थ्रो कर रजत पदक अपने नाम किया। भारत के लिए एक और अच्छी बात यह रही कि भारत की ही निधि रानी ने भी शानदार प्रदर्शन करते हुए चौथे स्थान पर अपनी जगह बनाई, जिससे भारत का दबदबा इस खेल में स्पष्ट दिखा।

मातृत्व के बाद मैदान में वापसी: संघर्ष, समर्पण और असीम धैर्य की मिसाल

सीमा कलीरामना का खेल के मैदान तक पहुँचने और फिर राष्ट्रमंडल खेलों के मंच पर पदक जीतने का सफर बेहद कांटों भरा रहा है। वर्ष 2022 में उनके बेटे रुद्र के जन्म के बाद वे लंबे समय के लिए खेल के मैदान और प्रतिस्पर्धी एथलेटिक्स से दूर हो गई थीं। उस दौर में उनका व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ थ्रो केवल 48 मीटर के आसपास ही था और एक मां बनने के बाद शरीर की फिटनेस को पुनः उस अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। शारीरिक बदलावों और मातृत्व की जिम्मेदारियों के बावजूद सीमा ने अपने खेल के प्रति जुनून को कम नहीं होने दिया।

वर्ष 2024 में उन्होंने धीरे-धीरे मैदान पर वापसी की और अपनी ताकत और थ्रोइंग तकनीक में सुधार करना शुरू किया। उनकी मेहनत रंग लाई जब 2025 के नेशनल गेम्स में उन्होंने गोल्ड मेडल जीतकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी ज़बरदस्त वापसी का बिगुल बजाया। इस वर्ष आयोजित भारतीय राष्ट्रीय चैंपियनशिप में सीमा ने अपने करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 59.73 मीटर का थ्रो किया, जिससे उन्हें राष्ट्रमंडल खेल 2026 का टिकट मिला। सीमा का मानना है कि मां बनने के बाद उनके भीतर न केवल शारीरिक सहनशीलता बढ़ी है, बल्कि उनमें गजब का धैर्य और खुद पर विश्वास करने की क्षमता पैदा हुई है, जिसने उन्हें दबाव भरे पलों में शांत रहने में मदद की।

पीएचडी की कठिन पढ़ाई और उच्च स्तरीय खेल का बेजोड़ संतुलन

सीमा केवल एथलेटिक्स के मैदान में ही भाले और डिस्कस से इतिहास नहीं रच रही हैं, बल्कि वे शिक्षा के क्षेत्र में भी नए कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं। वे हरियाणा की प्रसिद्ध चौधरी बंसीलाल यूनिवर्सिटी से शारीरिक शिक्षा विषय में पीएचडी की पढ़ाई कर रही हैं। एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के एथलीट के लिए दिन में कई घंटे कड़ा अभ्यास करने के साथ-साथ शोध कार्य, डेटा कलेक्शन और अकादमिक लेख लिखना बेहद थकाऊ होता है। लेकिन सीमा ने बेहतरीन समय प्रबंधन का परिचय देते हुए खेल और शिक्षा दोनों में संतुलन बनाया हुआ है।

उन्हें अपने रिसर्च गाइड डॉक्टर सुरेश कुमार मलिक का पूरा प्रशासनिक और नैतिक सहयोग मिल रहा है। ग्लासगो में पदक जीतने के बाद सीमा ने मुस्कुराते हुए बताया कि कड़ाके की ठंड की वजह से शरीर को बार-बार वार्मअप करना पड़ता था, लेकिन उनके दिमाग में खेल के साथ-साथ अपनी पीएचडी के रिसर्च वर्क का डेटा कलेक्शन भी चल रहा था। उन्होंने कहा कि भारत लौटते ही वे अपने अकादमिक काम को पूरा करेंगी। उनका यह समर्पण यह दिखाता है कि एक खिलाड़ी अपने बौद्धिक और शारीरिक दोनों दायरों को एक साथ नए शिखरों पर ले जा सकता है।

Commonwealth Games 2026: पति सह-कोच और परिवार का मजबूत सम्बल

सीमा की इस स्वर्णिम सफलता के पीछे उनके परिवार का अभूतपूर्व और निस्वार्थ योगदान रहा है। उनके पति रविंदर कलीरामना खुद एक पूर्व राष्ट्रीय स्तर के उत्कृष्ट डिस्कस थ्रोअर रह चुके हैं, जिन्होंने जूनियर और सब-जूनियर स्तर पर कई राष्ट्रीय खिताब जीते हैं। शादी के बाद रविंदर ने खुद मैदान में उतरने के बजाय अपनी पत्नी सीमा के सपनों को पंख देने का फैसला किया और उनके मुख्य कोच बन गए। सीमा का कहना है कि पति का कोच होना एक दोधारी तलवार जैसा होता है, लेकिन रविंदर ने दोनों रिश्तों के बीच बहुत ही परिपक्व संतुलन बनाया है।

क्योंकि रविंदर खुद इस खेल की बारीकियों और मानसिक दबाव को जानते हैं, इसलिए वे सीमा को मानसिक रूप से मजबूत बनाए रखने में बहुत मदद करते हैं। वहीं जब सीमा ट्रेनिंग या प्रतियोगिताओं में व्यस्त रहती हैं, तब उनके तीन साल के बेटे रुद्र की देखभाल और लालन-पालन का पूरा जिम्मा उनकी सास बहुत प्यार से संभालती हैं। रुद्र अक्सर अपनी मां को देखने खेल के मैदान में आता है, जिससे सीमा को अतिरिक्त ऊर्जा मिलती है। परिवार का यही समर्थन सीमा को दुनिया के किसी भी कोने में बिना किसी पारिवारिक तनाव के भारत का झंडा गाड़ने की ताकत देता है।

राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के लिए इस पदक का ऐतिहासिक महत्व

सीमा कलीरामना (Commonwealth Games 2026) द्वारा जीते गए इस कांस्य पदक के साथ ही राष्ट्रमंडल खेल 2026 की पदक तालिका में भारत के कुल पदकों की संख्या बढ़कर 17 हो गई है, जिससे भारत समग्र पदक तालिका में 10वें स्थान पर मजबूती से कायम है। एथलेटिक्स स्पर्धाओं में यह भारत का चौथा पदक है, जो यह दर्शाता है कि भारतीय एथलीट अब वैश्विक मंच पर अन्य विकसित देशों को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। महिला डिस्कस थ्रो का इतिहास भारत के लिए हमेशा से समृद्ध रहा है, और यह राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास में भारत का इस स्पर्धा में नौवां मेडल है।

सीमा कलीरामना अब इस विशिष्ट स्पर्धा में राष्ट्रमंडल खेलों का पदक जीतने वाली भारत की छठी महिला एथलीट बन गई हैं। इससे पहले दिग्गज एथलीट सीमा पुनिया ने इस इवेंट में भारत के लिए चार पदक जीतकर इतिहास रचा था। सीमा कलीरामना की यह जीत इस बात की तस्दीक करती है कि भारत में महिला थ्रोअर्स की नई पीढ़ी पूरी तरह से तैयार है और वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की विरासत को आगे बढ़ाने में पूरी तरह सक्षम है। निधि रानी का चौथे स्थान पर रहना भी यह दर्शाता है कि भारतीय एथलेटिक्स का भविष्य बेहद उज्ज्वल है।

भावुक प्रतिक्रिया और एशियन गेम्स का अगला बड़ा लक्ष्य

ऐतिहासिक पदक हासिल करने के बाद सीमा ने अपने भावुक बयान में कहा कि यह उनके जीवन का सबसे परिवर्तनकारी और यादगार पल है। उन्होंने स्वीकार किया कि वे यहाँ 60 मीटर की दूरी पार करने के उद्देश्य से आई थीं, लेकिन ग्लासगो के मौसम और अत्यधिक ठंड के कारण शरीर को अचानक ढालना थोड़ा मुश्किल था। फिर भी, उन्होंने अपने प्रदर्शन पर पूर्ण संतोष जताया और कहा कि पिछले साल एशियन चैंपियनशिप में खेलने का जो अनुभव उनके पास था, उसी ने उन्हें अंतिम थ्रो तक संयमित और एकाग्र बनाए रखा।

अब सीमा का अगला मुख्य लक्ष्य इस वर्ष के अंत में आयोजित होने वाले एशियन गेम्स हैं। वे अपनी थ्रोइंग तकनीक में सूक्ष्म सुधार करने और मानसिक रूप से खुद को और अधिक मजबूत बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। उनके दीर्घकालिक लक्ष्यों में 2028 का लॉस एंजिल्स ओलंपिक खेल भी शामिल है, लेकिन फिलहाल उनका ध्यान आगामी एशियन गेम्स और अपनी पीएचडी की डिग्री पूरी करने पर है। हरियाणा के भिवानी जिले के छोटे से गांव दिनोद से निकलकर ग्लासगो के अंतरराष्ट्रीय मंच तक का उनका यह सफर भारत की हर उस महिला के लिए आशा की नई किरण है, जो अपने सपनों को पंख देना चाहती हैं।

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