मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के प्रस्ताव पर ओम बिरला का बड़ा बयान, नियमों के तहत होगी कार्रवाई

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के संभावित प्रस्ताव पर लोकसभा स्पीकर ने स्पष्ट किया रुख।

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CEC Gyanesh Kumar: मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की विपक्षी दलों की लगातार उठ रही मांग के बीच संसद की ओर से बड़ा बयान सामने आया है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने स्पष्ट किया है कि यदि विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कोई नया प्रस्ताव या महाभियोग नोटिस सदन में लाता है, तो उस पर स्थापित संसदीय नियमों और संवैधानिक प्रक्रियाओं के तहत ही कदम उठाया जाएगा। ब्रिक्स संसदीय मंच के सिलसिले में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान स्पीकर ने दो टूक कहा कि लोकतंत्र में हर दल और सदस्य को अपनी बात व असहमति व्यक्त करने का अधिकार है, लेकिन किसी भी वैधानिक नोटिस पर कार्रवाई निर्धारित नियमों की परिधि में ही संभव है।

CEC Gyanesh Kumar: विपक्ष के संभावित महाभियोग नोटिस पर स्पीकर की दो टूक

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने संवाददाताओं से मुखातिब होते हुए कहा कि चुनाव आयोग के प्रमुख को हटाने की एक निश्चित संवैधानिक व्यवस्था मौजूद है। उन्होंने रेखांकित किया कि जिस प्रकार सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को पद से हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया तय है, ठीक वही प्रक्रिया मुख्य चुनाव आयुक्त के मामले में भी लागू होती है। स्पीकर ने साफ किया कि जब तक विपक्ष सदन के पटल पर विधिवत नोटिस पेश नहीं करता, तब तक केवल राजनीतिक बयानों के आधार पर संसद कोई कदम नहीं उठाती। जैसे ही कोई नया नोटिस सचिवालय के समक्ष आएगा, उसकी ग्राह्यता (स्वीकार्यता) की जांच संविधान और संसदीय नियमावली के आधार पर की जाएगी।

पहले भी विपक्ष कर चुका है हटाने की कोशिश

मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्ष का यह टकराव नया नहीं है, इससे पहले भी विपक्षी खेमे की ओर से ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए दो बार प्रयास किए जा चुके हैं। पूर्व में दोनों सदनों में दिए गए नोटिस संसदीय प्रक्रियाओं की प्राथमिक कसौटी पर खरे न उतरने के कारण खारिज कर दिए गए थे, जबकि दूसरी कोशिश से जुड़ा एक नोटिस उच्च सदन यानी राज्यसभा में प्रक्रियाधीन बताया गया है। विपक्षी दलों का दावा है कि उनके पास आवश्यक सांसदों का समर्थन है, वहीं सत्ता पक्ष इसे चुनावी प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करने की सुनियोजित राजनीतिक साजिश करार दे रहा है।

मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) को लेकर गहराया विवाद

इस समूचे विवाद के केंद्र में चुनाव आयोग द्वारा चलाया जाने वाला मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) कार्यक्रम है। विपक्षी दलों का आरोप है कि इस पुनरीक्षण अभियान के दौरान बड़े पैमाने पर प्रशासनिक अनियमितताएं हुई हैं और कई क्षेत्रों में मतदाताओं के नाम अनुचित तरीके से प्रभावित हुए हैं। इस विवाद ने तब और तूल पकड़ा जब मीडिया में यह दावा सामने आया कि चुनाव आयोग के भीतर ही अन्य चुनाव आयुक्तों ने पिछले महीनों के दौरान कई प्रशासनिक निर्णयों और निर्देशों पर अपनी असहमति जताई थी। विपक्ष इन्हीं कथित असहमतियों और कार्यप्रणाली को आधार बनाकर आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर रहा है और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग पर अड़ा हुआ है।

पद से हटाने की क्या है जटिल संवैधानिक प्रक्रिया

भारतीय संविधान के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद की सुरक्षा प्रदान की गई है ताकि वे बिना किसी राजनीतिक दबाव के स्वतंत्र निर्णय ले सकें। संविधान के अनुच्छेद 324 के प्रावधानों के अनुसार, मुख्य निर्वाचन आयुक्त को केवल उन्हीं आधारों और उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के लिए निर्धारित है। इसके लिए साबित कदाचार (साबित हुआ दुर्व्यवहार) या असमर्थता का ठोस आधार होना अनिवार्य है। यदि सदन के पीठासीन अधिकारी प्रस्ताव को स्वीकार करते हैं, तो आरोपों की पड़ताल के लिए न्यायाधीशों की एक जांच समिति गठित होती है। आरोप सिद्ध पाए जाने के बाद ही संसद के दोनों सदनों में कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना जरूरी होता है, जिसके बाद राष्ट्रपति निष्कासन आदेश जारी करते हैं।

CEC Gyanesh Kumar: राजनीतिक खींचतान के बीच आगे की राह

लोकसभा अध्यक्ष के इस बयान के बाद अब पूरी गेंद विपक्षी गठबंधन के पाले में है कि वह आगामी दिनों में किन ठोस कानूनी आधारों और हस्ताक्षरों के साथ संसद में औपचारिक प्रस्ताव पेश करता है। संसदीय विशेषज्ञों का मानना है कि संसद में संख्याबल और कड़े संवैधानिक प्रावधानों को देखते हुए इस तरह के प्रस्ताव को पारित कराना अत्यंत कठिन चुनौती है। फिलहाल, स्पीकर के स्पष्ट रुख से यह संकेत मिल गया है कि संसद किसी भी राजनीतिक दबाव में आए बिना केवल कानूनी और संवैधानिक नियमों के दायरे में रहकर ही इस संवेदनशील मसले पर निर्णय लेगी।

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