CCTV Footage: मद्रास HC सख्त, पुलिस थानों में 18 महीने रिकॉर्डिंग पर रिपोर्ट तलब

15 दिन की फुटेज मिलने पर हाई कोर्ट नाराज, तमिलनाडु DGP से 18 महीने के बैकअप पर रिपोर्ट

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CCTV Footage: देश भर के पुलिस स्टेशनों और जांच एजेंसियों के कार्यालयों में मानवाधिकारों के संरक्षण और हिरासत में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी ऐतिहासिक दिशा-निर्देशों के अनुपालन को लेकर मद्रास हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अख्तियार किया है। अदालत के समक्ष जब यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि भ्रष्टाचार निरोधक शाखा के एक पुलिस कार्यालय में सीसीटीवी फुटेज केवल पिछले 15 दिनों तक ही सुरक्षित रखी जा रही है, तो न्यायमूर्ति ने राज्य पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर नाराजगी जताई। उच्च न्यायालय ने सवाल किया कि जब शीर्ष अदालत ने पुलिस थानों में 18 महीने तक सीसीटीवी रिकॉर्डिंग को अनिवार्य रूप से सुरक्षित रखने का स्पष्ट आदेश दिया हुआ है, तो तमिलनाडु में महज 15 दिनों में फुटेज कैसे मिटाई जा रही है।

इस गंभीर प्रशासनिक चूक को संज्ञान में लेते हुए मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु के पुलिस महानिदेशक (DGP) को पूरे राज्य के पुलिस स्टेशनों और जांच कार्यालयों में लागू सीसीटीवी स्टोरेज व्यवस्था पर एक विस्तृत हलफनामा पेश करने का निर्देश दिया है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 10 सितंबर 2026 तय करते हुए स्पष्ट किया है कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को समय से पूर्व नष्ट या ओवरराइट होने देना न्यायिक प्रक्रिया और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों के साथ खिलवाड़ है।

CCTV Footage: राशन चावल तस्करी और रिश्वतखोरी के मामले में खुली तकनीकी व्यवस्था की पोल

यह पूरा मामला एक सब-इंस्पेक्टर द्वारा दायर याचिका की सुनवाई के दौरान प्रकाश में आया। याचिकाकर्ता पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के राशन वाले चावल की कथित अवैध तस्करी को मौन सहमति देने के एवज में रिश्वत मांगने का आरोप है, जिसकी जांच राज्य का सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक निदेशालय (DVAC) कर रहा है।

याचिकाकर्ता ने अदालत से गुहार लगाई थी कि मामले की निष्पक्ष सुनवाई और अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए संबंधित समयावधि के डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित किया जाए। इनमें संबंधित अधिकारियों के मोबाइल नंबरों के कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR), टावर लोकेशन और जांच कार्यालय के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज शामिल थी। किंतु जब सरकारी अभियोजक ने अदालत को सूचित किया कि संबंधित पुलिस कार्यालय के पास केवल पिछले 15 दिनों की रिकॉर्डिंग उपलब्ध है और उससे पूर्व का डेटा स्वतः ओवरराइट हो चुका है, तो अदालत स्तब्ध रह गई।

सुप्रीम कोर्ट का परमवीर सिंह सैनी फैसला: 18 महीने का डेटा संरक्षण अनिवार्य

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत का ध्यान वर्ष 2020 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह’ मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले की ओर आकृष्ट कराया। इस निर्णय में देश की शीर्ष अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया था कि देश के प्रत्येक पुलिस स्टेशन के प्रवेश द्वार, निकास द्वार, मुख्य लॉकअप, कॉरिडोर, इंस्पेक्टर व सब-इंस्पेक्टर के कक्षों और स्वागत कक्ष में नाइट विजन और ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग क्षमता वाले आधुनिक सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं।

शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में यह विशेष निर्देश भी दिया था कि इन कैमरों का डिजिटल वीडियो रिकॉर्डर (DVR) और नेटवर्क स्टोरेज कम से कम 18 महीने (डेढ़ वर्ष) तक का डेटा सुरक्षित रखने में सक्षम होना चाहिए। इसका उद्देश्य यह था कि यदि किसी नागरिक के साथ हिरासत में हिंसा, अवैध वसूली या दुर्व्यवहार होता है और वह कुछ महीनों बाद शिकायत दर्ज कराता है, तो जांच एजेंसी यह बहाना न बना सके कि तकनीकी कारणों से फुटेज उपलब्ध नहीं है।

केवल कैमरा लगाना पर्याप्त नहीं, पर्याप्त स्टोरेज और बैकअप भी जरूरी

मद्रास हाई कोर्ट ने रेखांकित किया कि थानों में केवल कैमरे टांग देना अदालत के निर्देशों का औपचारिकता मात्र पालन है; जब तक उनके बैकअप और स्टोरेज की पुख्ता व्यवस्था नहीं होगी, तब तक इस पूरी कवायद का कोई कानूनी मूल्य नहीं रह जाता। आधुनिक डिजिटल न्यायप्रणाली में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य (Electronic Evidence) किसी भी आपराधिक या विभागीय जांच की रीढ़ होते हैं।

अदालत का मानना था कि यदि रिकॉर्डिंग 15 दिनों में अपने आप डिलीट हो जाती है, तो किसी भी भ्रष्ट आचरण या पुलिसिया ज्यादती के मामलों में साक्ष्य स्वतः नष्ट हो जाएंगे। डिजिटल युग में सर्वर स्पेस, क्लाउड स्टोरेज अथवा एक्सटर्नल हार्ड ड्राइव के माध्यम से 18 महीने का बैकअप बनाए रखना तकनीकी रूप से पूरी तरह संभव है। ऐसे में 15 दिनों की सीमा यह संदेह पैदा करती है कि क्या यह केवल तकनीकी विफलता है या फिर पारदर्शिता से बचने की कोई प्रशासनिक शिथिलता।

पूरे तमिलनाडु के थानों का मांगा ब्योरा: 10 सितंबर को होगी अहम सुनवाई

उच्च न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे केवल एक स्थानीय थाने या कार्यालय तक सीमित न रखकर राज्यव्यापी समीक्षा का विषय बना दिया है। अदालत ने डीजीपी को निर्देश दिया है कि वे 10 सितंबर 2026 से पूर्व एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत कर यह स्पष्ट करें कि राज्य के कुल कितने थानों और विशेष जांच इकाइयों में कैमरे चालू हालत में हैं तथा विभिन्न जिलों में वर्तमान में कितने दिनों का वीडियो बैकअप सुरक्षित रखा जा रहा है। इसके साथ ही अदालत ने यह भी पूछा है कि क्या राज्य सरकार ने 18 महीने के स्टोरेज नियम को पूरा करने के लिए आवश्यक बजट और आधुनिक डीवीआर व सर्वर उपकरण स्वीकृत किए हैं, और संबंधित भ्रष्टाचार निरोधक कार्यालय में 18 महीने के स्थान पर केवल 15 दिन की फुटेज उपलब्ध होने के लिए कौन से अधिकारी जिम्मेदार हैं।

CCTV Footage: पारदर्शिता और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी नजीर बनेगा मामला

विधिक विशेषज्ञों का मानना है कि मद्रास हाई कोर्ट की यह तल्ख टिप्पणी केवल तमिलनाडु ही नहीं, बल्कि देश के अन्य राज्यों के पुलिस महकमों के लिए भी एक बड़ा संकेत है। कई राज्यों में पुलिस स्टेशन अक्सर ‘स्टोरेज फुल’ या ‘सिस्टम खराब’ होने का तर्क देकर विवादित मामलों में फुटेज देने से बचते रहे हैं।

यदि 10 सितंबर की सुनवाई में हाई कोर्ट राज्य भर के लिए एक केंद्रीय डिजिटल स्टोरेज ग्रिड या सख्त मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) लागू करने का आदेश देता है, तो इससे पुलिस प्रणाली की जवाबदेही तय करने में एक बड़ा मील का पत्थर स्थापित होगा। आम नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए पुलिस स्टेशनों का तीसरी आंख की सतत निगरानी में रहना और उसका रिकॉर्ड सुरक्षित रहना वर्तमान समय की सबसे अनिवार्य कानूनी आवश्यकता है।

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