BRICS Pay: ब्रिक्स पे क्या है, UPI जैसी व्यवस्था से स्थानीय मुद्रा में होगा भुगतान

BRICS Pay से सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में सीमा-पार भुगतान आसान बनाने की कोशिश

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BRICS Pay:  भारत की अध्यक्षता में राष्ट्रीय राजधानी के भारत मंडपम में आयोजित हो रहे 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के बीच सीमा-पार डिजिटल भुगतान और स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन को सुगम बनाने की दिशा में ‘ब्रिक्स पे’ (BRICS Pay) का मुद्दा वैश्विक चर्चा के केंद्र में आ गया है। वैश्विक व्यापार में डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता कम करने, लेन-देन की लागत घटाने और सदस्य देशों की संप्रभु डिजिटल भुगतान प्रणालियों को आपस में जोड़ने के उद्देश्य से तैयार की जा रही इस व्यवस्था को भविष्य के अंतरराष्ट्रीय वित्तीय ढांचे का बड़ा कदम माना जा रहा है।
ब्रिक्स पे किसी एक नई साझा मुद्रा (कॉमन करेंसी) की शुरुआत नहीं है, बल्कि यह सदस्य देशों के मौजूदा घरेलू डिजिटल भुगतान तंत्रों के बीच एक सुरक्षित डिजिटल सेतु का निर्माण करने की तकनीकी पहल है। इसके जरिए भारत का यूपीआई, रूस का फास्टर पेमेंट्स सिस्टम और ब्राजील का पिक्स जैसे राष्ट्रीय नेटवर्क एक-दूसरे से संवाद करने में सक्षम होंगे, जिससे पर्यटन, शिक्षा और द्विपक्षीय व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का सीधा आदान-प्रदान संभव हो सकेगा।

BRICS Pay: ब्रिक्स पे क्या है और क्यों पड़ी इसकी आवश्यकता?

पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेन-देन में अधिकांश सीमा-पार भुगतान स्विफ्ट (SWIFT) संदेश प्रणाली और चुनिंदा वैश्विक मुद्राओं—विशेष रूप से अमेरिकी डॉलर—के माध्यम से होते हैं। इस प्रक्रिया में मुद्रा विनिमय शुल्क, मध्यस्थ बैंकों का कमीशन और समय की बर्बादी जैसे कई अवरोध शामिल रहते हैं। साथ ही एकपक्षीय प्रतिबंधों के दौर में अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणालियों में बाधा का जोखिम भी लगातार बना रहता है।
ब्रिक्स पे इस जटिलता को समाप्त करने के लिए एक बहुपक्षीय डिजिटल वित्तीय संरचना प्रस्तुत करता है। यह किसी देश के घरेलू भुगतान बुनियादी ढांचे को प्रतिस्थापित करने के बजाय एक इंटरऑपरेबल (आपस में तालमेल बैठाने वाला) प्लेटफॉर्म के रूप में कार्य करता है। इसके माध्यम से यदि भारत और रूस अथवा भारत और ब्राजील के बीच कोई लेन-देन होता है, तो वह दोनों देशों की अपनी स्थानीय मुद्राओं में सीधे प्रोसेस हो सकेगा, जिससे किसी तीसरी मुद्रा को अनिवार्य मध्यस्थ बनाने की जरूरत खत्म हो जाएगी।

क्या यह भारत के UPI का अंतरराष्ट्रीय रूप है?

ब्रिक्स पे की तुलना अक्सर भारत के यूपीआई से की जाती है क्योंकि इसका अंतिम उपभोक्ता अनुभव यूपीआई जैसा ही सहज, त्वरित और क्यूआर कोड आधारित होगा। हालांकि संरचनात्मक स्तर पर दोनों में अंतर है। यूपीआई एक देश के भीतर बैंकों के बीच तुरंत भुगतान की प्रणाली है, जबकि ब्रिक्स पे विभिन्न देशों के अलग-अलग भुगतान तंत्रों को परस्पर जोड़ने वाली एक विकेंद्रीकृत व्यवस्था है।
भारत और रूस के बीच हाल ही में भारत के यूपीआई को रूस के फास्टर पेमेंट्स सिस्टम (FPS) से सीधे जोड़ने की सहमति इसी दिशा में उठाया गया पहला ठोस कदम है। इस समझौते के पूरी तरह प्रभावी होने पर भारतीय यात्री, छात्र अथवा व्यापारी रूस में सीधे अपने यूपीआई-सक्षम बैंक ऐप से रूबल में भुगतान कर सकेंगे, और इसी प्रकार रूसी नागरिक भारत में बिना किसी विदेशी मुद्रा कार्ड के त्वरित लेन-देन कर पाएंगे।

स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और डी-डॉलराइजेशन की वास्तविक स्थिति

ब्रिक्स पे को लेकर यह भ्रम अक्सर देखा जाता है कि यह अमेरिकी डॉलर के वैश्विक वर्चस्व को तुरंत समाप्त कर देगा। वित्तीय विश्लेषकों के अनुसार यह दावा व्यावहारिक रूप से सही नहीं है। वैश्विक व्यापार, विदेशी मुद्रा भंडार और ऋण समझौतों में डॉलर की ऐतिहासिक भूमिका बहुत गहरी है, जिसे कोई एक तकनीक रातों-रात नहीं बदल सकती।
ब्रिक्स पे का प्राथमिक उद्देश्य डॉलर का बहिष्कार करना नहीं, बल्कि सदस्य देशों को एक स्वतंत्र, विश्वसनीय और वैकल्पिक भुगतान गलियारा उपलब्ध कराना है। इससे व्यापारिक साझेदारों को यह विकल्प मिलता है कि वे अपनी जरूरत के अनुसार भारतीय रुपये, चीनी युआन, रूसी रूबल अथवा ब्राजीलियाई रियाल में सीधा लेन-देन कर सकें। यह कदम वैश्विक वित्तीय प्रणाली को एकध्रुवीय प्रभाव से मुक्त कर अधिक संतुलित और लचीला बनाने में सहायक होगा।

यात्रियों, छात्रों और सूक्ष्म-लघु उद्योगों को सीधा लाभ

ब्रिक्स पे के पहले चरण को पर्यटन और व्यक्तिगत यात्राओं को आसान बनाने पर केंद्रित किया गया है। वर्तमान समय में विदेश यात्रा करने वाले पर्यटकों और विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों को महंगे फॉरेक्स कार्ड, भारी मुद्रा रूपांतरण शुल्क और नकदी निकासी पर अतिरिक्त टैक्स वहन करना पड़ता है।
राष्ट्रीय भुगतान प्रणालियों के आपस में जुड़ने से यात्री अपने मोबाइल फोन से स्थानीय दुकानों, होटलों और परिवहन सेवाओं का भुगतान उसी प्रकार कर सकेंगे जैसा वे अपने गृह देश में करते हैं। इसके अगले चरण में बिजनेस-टू-बिजनेस (B2B) और बिजनेस-टू-कंज्यूमर (B2C) व्यापारिक लेन-देन को शामिल करने की योजना है, जिससे आयातकों और निर्यातकों को सीमा-पार माल ढुलाई के तुरंत भुगतान में सुगमता होगी और सूक्ष्म व मध्यम उद्योगों की कार्यशील पूंजी नहीं फंसेगी।

सीबीडीसी (CBDC) और भविष्य की तकनीकी चुनौतियां

ब्रिक्स देशों के वित्तीय सहयोग में केवल पारंपरिक डिजिटल भुगतान ही शामिल नहीं हैं, बल्कि केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC) को जोड़ने की दिशा में भी विमर्श तेज हुआ है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा जारी डिजिटल रुपये और अन्य सदस्य देशों की केंद्रीय बैंक मुद्राओं के सीमा-पार संचालन पर तकनीकी अध्ययन जारी हैं।
हालांकि इस प्रणाली को व्यापक रूप से लागू करने के मार्ग में कई नियामक और कानूनी चुनौतियां भी हैं। प्रत्येक देश के बैंकिंग नियम, डेटा गोपनीयता कानून, एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग (AML) प्रावधान और अपने ग्राहक को जानो (KYC) मानक अलग-अलग हैं। किसी भी अंतरराष्ट्रीय डिजिटल नेटवर्क को साइबर सुरक्षा के उच्चतम स्तर पर सुरक्षित रखना और वित्तीय अपराधों से मुक्त बनाना सभी केंद्रीय बैंकों के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता है।

भारत की कूटनीतिक और आर्थिक स्थिति होगी सुदृढ़

भारत के लिए ब्रिक्स पे का विकास एक रणनीतिक अवसर के रूप में देखा जा रहा है। विश्व के लगभग 50 प्रतिशत रियल-टाइम डिजिटल भुगतानों का संचालन करने वाले भारत के पास दुनिया का सबसे उन्नत और परीक्षित फिनटेक इकोसिस्टम मौजूद है।
ब्रिक्स के विस्तारित 21 देशों के परिवार में भारत की यह तकनीकी क्षमता उसे डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) के वैश्विक मानक तय करने का नेतृत्व प्रदान करती है। भारतीय रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण की दिशा में भी ब्रिक्स पे एक उत्प्रेरक का कार्य करेगा, जिससे भारतीय निर्यातकों को मुद्रा विनिमय के जोखिमों से सुरक्षा मिलेगी।

BRICS Pay: निष्कर्ष

18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में चर्चा के केंद्र में आया ब्रिक्स पे भविष्य के बहुध्रुवीय आर्थिक जगत की अनिवार्य आवश्यकता बनता जा रहा है। यह किसी समानांतर मुद्रा को जन्म देने के बजाय राष्ट्रीय भुगतान तंत्रों को परस्पर जोड़कर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रवाह को लोकतांत्रिक और पारदर्शी बनाने का माध्यम है। आने वाले महीनों में सदस्य देशों के केंद्रीय बैंकों द्वारा तैयार किए जाने वाले तकनीकी और विनियामक ढांचे ही यह निर्धारित करेंगे कि यह व्यवस्था कितनी शीघ्रता से सामान्य यात्रियों और अंतरराष्ट्रीय व्यापारियों के दैनिक जीवन का हिस्सा बन पाती है।

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