भागलपुर के गोपालपुर में फर्जी ऑडिट के आरोप में MDM BRP हटाए गए, मध्याह्न भोजन योजना की जांच पर उठे सवाल
बिहार के भागलपुर जिले के गोपालपुर प्रखंड में मध्याह्न भोजन योजना के ऑडिट में कथित गड़बड़ियों के बाद BRP को जिम्मेदारी से हटा दिया गया है।
Bihar MDM News: बिहार के सरकारी प्राथमिक और मध्य विद्यालयों में संचालित मध्याह्न भोजन योजना (Mid-Day Meal Scheme) की निगरानी व्यवस्था एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। भागलपुर जिले के गोपालपुर प्रखंड में कार्यरत मध्याह्न भोजन योजना के प्रखंड साधन सेवी (BRP) को कथित रूप से फर्जी ऑडिट कराने और वित्तीय अभिलेखों में हेरफेर के गंभीर आरोपों के बाद पद से हटा दिया गया है। शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन द्वारा की गई इस सख्त कार्रवाई के बाद जिले के प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मच गया है। यह प्रकरण इसलिए भी अत्यंत संवेदनशील माना जा रहा है क्योंकि स्कूलों में नौनिहालों के पोषण के लिए आवंटित सार्वजनिक बजट की शुद्धता और पारदर्शिता की जांच स्वयं ऑडिट व्यवस्था पर निर्भर करती है।
Bihar MDM News: फर्जी ऑडिट रिपोर्ट तैयार करने के आरोप में गिरी गाज
गोपालपुर प्रखंड के विभिन्न विद्यालयों में मध्याह्न भोजन योजना के तहत खाद्यान्न उठाव, कन्वर्जन कॉस्ट (परिवर्तन लागत), रसोई गैस सिलेंडर की खरीद और मेन्यू के अनुसार भोजन वितरण से संबंधित वित्तीय अभिलेखों के ऑडिट में गंभीर विसंगतियां पाई गई थीं। प्रारंभिक शिकायतों के अनुसार, भौतिक निरीक्षण और वाउचरों के वास्तविक मिलान के बिना ही ऑडिट की औपचारिकता पूरी कर फर्जी रिपोर्ट तैयार करने का प्रयास किया गया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्चाधिकारियों ने संज्ञान लिया और वित्तीय अनुशासनहीनता के दृष्टिगत संबंधित बीआरपी को उनके दायित्वों से तत्काल प्रभाव से मुक्त कर दिया। हालांकि, विभागीय अधिकारियों का कहना है कि किसी कर्मचारी को पद से हटाया जाना एक प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है, जबकि वास्तविक वित्तीय क्षति और दायित्व का निर्धारण विस्तृत विभागीय जांच और अभिलेखीय सत्यापन के बाद ही तय होगा।
मध्याह्न भोजन योजना में ऑडिट प्रक्रिया की अनिवार्यता और निगरानी का ढांचा
केंद्र और राज्य सरकार द्वारा वित्तपोषित मध्याह्न भोजन योजना का प्राथमिक उद्देश्य वंचित वर्ग के बच्चों में कुपोषण को दूर करना और स्कूलों में नामांकन व उपस्थिति बढ़ाना है। इस योजना के सुचारू संचालन के लिए प्रखंड से लेकर राज्य स्तर तक त्रिस्तरीय निगरानी ढांचा स्थापित है, जिसमें बीआरपी की भूमिका जमीनी स्तर पर स्कूलों की रसोई, स्वच्छता, राशन की गुणवत्ता और वित्तीय खर्च का नियमित अनुश्रवण करने की होती है।
ऑडिट प्रक्रिया के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता है कि बच्चों की दर्ज उपस्थिति और वास्तव में परोसे गए भोजन के आंकड़ों में कोई विसंगति न हो। यदि ऑडिट की इसी बुनियादी प्रक्रिया में फर्जीवाड़ा या मिलीभगत के आरोप सामने आते हैं, तो यह सीधे तौर पर सार्वजनिक धन के दुरुपयोग और बच्चों के पोषण अधिकार के साथ खिलवाड़ की ओर इशारा करता है।
भागलपुर शिक्षा विभाग में पूर्व में भी उजागर हुई थीं वित्तीय अनियमितताएं
भागलपुर जिले का शिक्षा विभाग हाल के महीनों में लगातार वित्तीय विसंगतियों और प्रशासनिक जांचों के केंद्र में रहा है। अक्टूबर माह में मानव संसाधन प्रबंधन प्रणाली (HRMS) पोर्टल के माध्यम से फर्जी भुगतान और वेतन आहरण से संबंधित गड़बड़ियां उजागर हुई थीं।
विभागीय आंतरिक ऑडिट रिपोर्टों के अनुसार, भागलपुर सहित पटना और नवादा जिलों में सॉफ्टवेयर पोर्टल और वेतन अभिलेखों में अनधिकृत हस्तक्षेप कर गैर-मौजूद व काल्पनिक शिक्षकों के नाम पर करोड़ों रुपये के अवैध निकासी के मामले प्रकाश में आए थे। उस व्यापक प्रकरण के बाद शिक्षा विभाग ने राज्य के सभी 38 जिलों में एचआरएमएस डाटाबेस के सघन फॉरेंसिक और वित्तीय ऑडिट के आदेश जारी किए थे। हालांकि, गोपालपुर का मध्याह्न भोजन ऑडिट प्रकरण तकनीकी रूप से एचआरएमएस घोटाले से भिन्न है, किंतु यह शिक्षा विभाग के आंतरिक वित्तीय नियंत्रण की कमजोरियों को पुनः रेखांकित करता है।
Bihar MDM News: प्रशासनिक जवाबदेही और आगे की कार्रवाई पर टिकी निगाहें
गोपालपुर प्रखंड में बीआरपी पर हुई इस दंडात्मक कार्रवाई के बाद जिले के अन्य प्रखंडों में भी मध्याह्न भोजन योजना के अभिलेखों की पड़ताल तेज होने की संभावना है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और अभिभावकों ने मांग की है कि केवल बीआरपी को पद से हटाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस फर्जी ऑडिट से लाभान्वित होने वाले विद्यालय प्रभारियों, राशन आपूर्तिकर्ताओं और उच्च स्तर पर बैठे संरक्षकों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
विभागीय सूत्रों के अनुसार, जिला स्तर पर एक जांच समिति गठित कर संबंधित अवधि के सभी स्कूलों के एमडीएम रजिस्टरों, बैंक पासबुकों और ऑडिट वर्कशीट्स की विस्तृत फोरेंसिक जांच कराई जा सकती है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विभाग इस प्रकरण में गबन की राशि की वसूली और संलिप्त कर्मियों के विरुद्ध प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराने जैसे कड़े विधिक कदम कब तक उठाता है।
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