Akshara Singh New Bhojpuri Song: ‘बाढ़ में बिहार, छठी मइया खेवनहार’ गाने ने छुआ दिल, जानें खासियत
अक्षरा सिंह के नए भोजपुरी गीत में बिहार की बाढ़ की त्रासदी और छठी मइया के प्रति आस्था की झलक।
Akshara Singh New Bhojpuri Song: भोजपुरी सिनेमा की लोकप्रिय अभिनेत्री और पार्श्व गायिका अक्षरा सिंह अपने नए सामाजिक व लोक आस्था से ओतप्रोत भोजपुरी गीत को लेकर चर्चा में आ गई हैं। उनका नया विशेष गीत ‘बाढ़ में बिहार, छठी मइया खेवनहार’ आधिकारिक तौर पर रिलीज कर दिया गया है। बिहार में विनाशकारी बाढ़ के कारण विस्थापित हुए लाखों परिवारों के संघर्ष, उनकी आजीविका के नुकसान और लोक आस्था के महापर्व छठ की अधिष्ठात्री छठी मइया के प्रति अटूट विश्वास को केंद्र में रखकर यह गीत तैयार किया गया है। मनोरंजन से इतर यह प्रस्तुति प्राकृतिक आपदा से जूझ रहे आम जनमानस के दर्द को मार्मिक संगीत और शब्दों के जरिए बयां करती है।
Akshara Singh New Bhojpuri Song: आपदा और आस्था का अनूठा संगम बना नया भोजपुरी गीत
अक्षरा सिंह का यह नया गीत केवल एक सामान्य संगीत ट्रैक नहीं है, बल्कि बिहार में हर वर्ष आने वाली विनाशकारी बाढ़ और उसके बाद उत्पन्न होने वाले मानवीय संकट का संवेदनशील चित्रण है। बाढ़ के पानी में डूबे आशियाने, बर्बाद हुई फसलें और रोजी-रोटी के लिए जूझते किसानों की बेबसी को गीत में बड़ी सादगी से उकेरा गया है।
गीत का शीर्षक ‘बाढ़ में बिहार, छठी मइया खेवनहार’ अपने आप में गहरे अर्थ समेटे हुए है। आगामी दिनों में बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में छठ महापर्व की शुरुआत होने जा रही है। ऐसी विषम परिस्थितियों में जब चारों ओर केवल जलप्रलय और तबाही का मंजर हो, तब आम बिहारी परिवार केवल छठी मइया के चरणों में ही अपनी गुहार लगाता है। गीत में यह दर्शाया गया है कि चाहे कितनी भी बड़ी विपदा आ जाए, लोक आस्था और माता के प्रति विश्वास लोगों को टूटने नहीं देता।
गीतकार मनोज भावुक के मर्मस्पर्शी बोल और सामाजिक सरोकार
इस भावुक कर देने वाले गीत की रचना सुप्रसिद्ध भोजपुरी गीतकार, कवि और शोधकर्ता मनोज भावुक ने की है। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से बाढ़ की त्रासदी, उजड़ते गांवों और किसानों की सजल आंखों के दर्द को सीधे श्रोताओं के हृदय तक पहुंचाने का काम किया है। गीतों के माध्यम से जलमग्न खेतों, घर-बार छोड़ने की मजबूरी और ईश्वर से संकट हरने की विनती को बेहद संजीदगी से पिरोया गया है।
मनोज भावुक पहले भी अपनी रचनाओं में माटी की खुशबू और आम जनता की पीड़ा को प्रमुखता से उठाते रहे हैं। ‘पलायन के दर्द’, ‘जागे यूपी-बिहार’ और ‘सुन ऐ छठी मइया’ जैसी कालजयी रचनाओं के जरिए उन्होंने सदैव भोजपुरी भाषा की गरिमा और सामाजिक सरोकारों को मंच दिया है। इस नए गीत में भी उनका वही गहरा सामाजिक जुड़ाव स्पष्ट रूप से झलकता है।
बाढ़ पीड़ितों के बीच जमीनी स्तर पर पहुंची थीं अक्षरा सिंह
इस गीत के पीछे अक्षरा सिंह का व्यक्तिगत और जमीनी अनुभव भी जुड़ा हुआ है। हाल ही में बिहार के कई जिलों में जब बाढ़ का पानी घुसा था, तब अक्षरा सिंह ने स्वयं जमीनी स्तर पर उतरकर प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया था। उन्होंने पीड़ितों के बीच राहत सामग्री का वितरण किया था और जलमग्न गांवों में पहुंचकर महिलाओं और बच्चों की स्थिति को करीब से देखा था।
उस जमीनी हकीकत और पीड़ितों के आंसुओं ने अभिनेत्री को भावनात्मक रूप से गहराई से प्रभावित किया। यही कारण है कि इस गीत में उनका गायन केवल व्यावसायिक प्रस्तुति न लगकर दिल से निकली एक सच्ची पुकार जैसा महसूस होता है। उन्होंने अपनी कला का उपयोग समाज के इस विकट संकट की ओर नीति-निर्माताओं और आम जनता का ध्यान आकर्षित करने के लिए किया है।
सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मिल रही सराहना
गीत के रिलीज होते ही यूट्यूब और तमाम सोशल मीडिया हैंडल्स पर श्रोताओं की भावुक प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। भोजपुरी संगीत प्रेमियों ने फूहड़ता से परे हटकर माटी के दर्द और लोक पर्व की महिमा को उजागर करने वाले इस कदम की मुक्तकंठ से सराहना की है। कई प्रशंसकों ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अक्षरा सिंह ने बिहार के असल दर्द को अपनी आवाज दी है।
छठ पर्व की पूर्व संध्या पर इस प्रकार के गीतों का महत्व और बढ़ जाता है क्योंकि यह हर प्रवासी और स्थानीय नागरिक को अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और आपदा के समय एक-दूसरे का हाथ थामने की मानवीय भावना की याद दिलाता है।
Akshara Singh New Bhojpuri Song: पारंपरिक भोजपुरी लोक संगीत की मूल आत्मा को पुनर्स्थापित करने की पहल
भोजपुरी लोक संगीत का इतिहास हमेशा से सामाजिक चेतना, किसान जीवन, प्रकृति और त्योहारों से जुड़ा रहा है। यह नया गीत उसी गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाता है जहां संगीत केवल नाच-गाने का जरिया नहीं, बल्कि जनमानस की पीड़ा, विस्थापन के आंसू और ईश्वर के प्रति अगाध निष्ठा को व्यक्त करने का सशक्त माध्यम बनता है। अक्षरा सिंह और मनोज भावुक का यह संयुक्त प्रयास साबित करता है कि सार्थक विषयों पर आधारित लोक संगीत आज भी लाखों दिलों को छूने का सामर्थ्य रखता है।
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