US Iran Conflict: ईरानी ठिकानों पर अमेरिकी हमलों के बाद कुवैत पर ड्रोन-मिसाइल अटैक का दावा, युद्धविराम वार्ता पर गहराया संकट, वैश्विक तेल बाजार और अर्थव्यवस्था पर बढ़ा दबाव
हमलों और जवाबी कार्रवाई के दावों के बीच सीजफायर की उम्मीदों को झटका
US Iran Conflict: अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने इस बात की आधिकारिक पुष्टि की है कि शनिवार और रविवार को अमेरिकी वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने ईरान के गेरुक शहर और केशम द्वीप के आसपास स्थित प्रमुख सैन्य ढांचों को निशाना बनाया। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि यह कार्रवाई ईरान द्वारा उनके एक एमक्यू-1 प्रीडेटर ड्रोन को मार गिराए जाने के विरोध में की गई थी। इसके तुरंत बाद ईरान की ओर से भी आक्रामक जवाबी कार्रवाई की गई, जिसने फारस की खाड़ी के पड़ोसी देशों की सुरक्षा को सीधे तौर पर संकट में डाल दिया है।
तनाव की वर्तमान स्थिति
अमेरिका और ईरान के बीच पिछले कई हफ्तों से लगातार युद्ध जैसे विनाशकारी हालात बने हुए हैं। दोनों पक्षों के राजनयिकों द्वारा सीजफायर की अवधि बढ़ाने और तनाव को कम करने की कोशिशें लगातार की जा रही थीं, लेकिन जमीनी स्तर पर हवाई हमले और जवाबी हिंसक कार्रवाइयां थमने का नाम नहीं ले रही हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति न केवल मध्य पूर्व बल्कि वैश्विक स्तर पर ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है।
ईरान ने इस युद्ध के दौरान दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक, होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) पर अपना कड़ा सैन्य नियंत्रण कायम रखा है। इस संकरे जलमार्ग से पूरी दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता है। ऐसे में इस क्षेत्र में जारी सैन्य संघर्ष के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार आसमान छू रही हैं, जिसका सीधा असर वैश्विक महंगाई पर पड़ रहा है।
अमेरिकी हवाई हमलों का ब्यौरा
अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने सोमवार को जारी अपने एक विस्तृत बयान में बताया कि अमेरिकी लड़ाकू विमानों ने बेहद सटीक रणनीति के तहत ईरानी वायु रक्षा प्रणालियों, जमीनी नियंत्रण केंद्रों और दो घातक ड्रोनों को हवा में ही नष्ट कर दिया। अमेरिकी सेना के मुताबिक ये सभी संपत्तियां क्षेत्रीय जलक्षेत्र से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों और अंतरराष्ट्रीय तेल टैंकरों के लिए एक बड़ा खतरा बनी हुई थीं।
ये हवाई हमले मुख्य रूप से ईरान के तटीय शहर गेरुक और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण केशम द्वीप पर केंद्रित थे। पेंटागन ने स्पष्ट किया कि ये हमले पूरी तरह से सीमित और केवल सैन्य ठिकानों को निष्क्रिय करने के उद्देश्य से किए गए थे, जिसमें किसी भी अमेरिकी सैनिक को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है। सैन्य विश्लेषकों का कहना है कि यद्यपि एमक्यू-1 प्रीडेटर ड्रोन को अमेरिकी वायुसेना से आधिकारिक तौर पर हटाया जा चुका है, लेकिन अमेरिकी थलसेना अभी भी इसका बड़े पैमाने पर सर्विलांस के लिए उपयोग कर रही है।
ईरान का पलटवार और कुवैत पर संकट
अमेरिकी बमबारी के कुछ ही घंटों के भीतर ईरानी अर्द्धसैन्य बल आईआरजीसी ने बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए पलटवार किया। सोमवार तड़के कुवैत की राष्ट्रीय वायु रक्षा प्रणालियों को देश की सीमा में घुस रहे कई ईरानी ड्रोनों और मिसाइलों को हवा में ही मार गिराने के लिए सक्रिय होना पड़ा। कुवैत सरकार ने अपने सैन्य ठिकानों और हवाई क्षेत्र को निशाना बनाकर किए गए इन हमलों की आधिकारिक पुष्टि की है।
ईरानी सैन्य कमान का दावा है कि उन्होंने यह कार्रवाई अमेरिकी सेना को करारा जवाब देने के लिए की है, हालांकि उन्होंने अपने अंतिम लक्ष्यों की स्पष्ट जानकारी साझा नहीं की है। ईरान की सरकारी मीडिया ने बताया कि अमेरिकी सेना ने उनके एक द्वीप पर स्थित महत्वपूर्ण दूरसंचार टावर को नष्ट किया था, जिसके प्रतिशोध में यह मिसाइल हमला किया गया। इस अप्रत्याशित घटना के बाद से फारस की खाड़ी के अन्य देशों जैसे सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में भी भारी सुरक्षा अलर्ट घोषित कर दिया गया है।
इजरायल और लेबनान मोर्चे पर हलचल
मध्य पूर्व में भड़क रही इस महाजंग के बीच एक और मोर्चा पूरी तरह से खुल चुका है। इजरायली सेना ने लेबनान के भीतर घुसकर रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण लितानी नदी से आगे के बड़े भूभाग पर अपना सैन्य नियंत्रण स्थापित कर लिया है। इसके जवाब में लेबनान के हिजबुल्ला जैसे उग्रवादी समूह इजरायल के रिहायशी और सैन्य ठिकानों पर लगातार ड्रोन और रॉकेटों से हमले कर रहे हैं।
यह बहुआयामी संघर्ष मध्य पूर्व को एक ऐसे व्यापक युद्ध की ओर धकेल रहा है जिसमें कई देशों के सीधे शामिल होने की आशंका बढ़ गई है। ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी किए जाने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला पूरी तरह से चरमरा गई है। अंतरराष्ट्रीय आर्थिक विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि यदि यह तनाव आने वाले कुछ और दिनों तक जारी रहा, तो विकसित और विकासशील दोनों ही तरह की अर्थव्यवस्थाओं को भारी मंदी का सामना करना पड़ सकता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति का रुख और कूटनीति
इस बेहद तनावपूर्ण माहौल के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक संक्षिप्त लेकिन महत्वपूर्ण टिप्पणी साझा की है। उन्होंने लिखा कि ईरान सचमुच इस समय एक समझौता करना चाहता है और यह अमेरिका के साथ-साथ हमारे सहयोगी देशों के हित में एक बेहतरीन समझौता साबित होगा। उन्होंने दुनिया को आश्वस्त करते हुए कहा कि बस निश्चिंत रहिए, अंत में सब कुछ ठीक हो जाएगा, हमेशा की तरह।
व्हाइट हाउस से मिली जानकारी के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप ने शुक्रवार को अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों और शीर्ष जनरलों के साथ एक उच्च स्तरीय आपातकालीन बैठक की थी। इसके बावजूद, सीजफायर की शर्तों को तय करने और होर्मुज स्ट्रेट को वाणिज्यिक जहाजों के लिए फिर से सुरक्षित खोलने पर अभी तक कोई अंतिम सहमति नहीं बन पाई है। ईरान के विदेश मंत्रालय ने भी साफ किया है कि जब तक उनके ठिकानों पर हमले नहीं रुकते, तब तक किसी भी समझौते को अंतिम रूप नहीं दिया जा सकता।
US Iran Conflict: वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान
अंतरराष्ट्रीय व्यापार विश्लेषकों का स्पष्ट कहना है कि यदि यह सैन्य संघर्ष लंबा खिंचता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को इसकी बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। कच्चे तेल की कीमतों में आ रहा यह उछाल दुनिया भर में खुदरा महंगाई को बढ़ाएगा, जिससे गरीब और विकासशील देशों पर आर्थिक बोझ असहनीय हो जाएगा।
वैश्विक शिपिंग कंपनियों ने पहले ही फारस की खाड़ी और लाल सागर के रास्तों से अपने जहाजों को हटाना शुरू कर दिया है। जहाजों को अब अफ्रीका के चक्कर लगाकर लंबे और महंगे वैकल्पिक मार्गों से गुजरना पड़ रहा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय परिवहन लागत और बीमा प्रीमियम में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसका सीधा असर रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ना तय माना जा रहा है।
निष्कर्ष और शांति की आवश्यकता
अमेरिका द्वारा ईरानी ठिकानों पर की गई बमबारी और उसके जवाब में ईरान द्वारा कुवैत पर किए गए मिसाइल हमलों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि मध्य पूर्व में शांति की स्थापना की राह कितनी जटिल और चुनौतीपूर्ण है। इस क्षेत्र में रहने वाले लाखों निर्दोष लोगों के जीवन की रक्षा करने और वैश्विक आर्थिक तंत्र को ढहने से बचाने के लिए दोनों देशों को तुरंत युद्ध विराम का मार्ग अपनाना होगा।
संयुक्त राष्ट्र (UN) और दुनिया के अन्य बड़े देशों को इस मामले में केवल मूकदर्शक बने रहने के बजाय एक सक्रिय और ठोस मध्यस्थ की भूमिका निभानी होगी। जब तक दोनों पक्ष टेबल पर बैठकर अपनी चिंताओं का कूटनीतिक समाधान नहीं निकालते, तब तक मध्य पूर्व के इस बारूद के ढेर में लगी आग को शांत करना असंभव बना रहेगा। फिलहाल पूरी दुनिया की निगाहें इस क्षेत्र में पल-पल बदल रही सैन्य स्थिति पर टिकी हुई हैं।
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