Tisri Begum Review: ‘तीसरी बेगम’ में रिश्तों, दर्द और कानूनी लड़ाई का दमदार तड़का, जानिए कैसी है फिल्म
Tisri Begum Review: क्या ‘तीसरी बेगम’ जीत पाएगी दर्शकों का दिल? जानिए फिल्म में कितना है दम
Tisri Begum Film Review: बॉलीवुड में सामाजिक मुद्दों को कमर्शियल मसालों के साथ बड़े पर्दे पर उतारने के लिए मशहूर दिग्गज डायरेक्टर केसी बोकाड़िया एक बार फिर दर्शकों के बीच एक बेहद कड़क और झकझोर देने वाली कहानी लेकर आए हैं। आज यानी 26 मई 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई उनकी नई सोशल-ड्रामा फिल्म ‘तीसरी बेगम’ (Tisri Begum) इन दिनों टॉक ऑफ द टाउन बनी हुई है। बीएमबी प्रोडक्शंस के बैनर तले बनी 1 घंटे 52 मिनट की यह फिल्म एक वास्तविक जीवन की घटना से प्रेरित है, जो शादी के नाम पर होने वाले धोखे और पहचान छुपाकर युवतियों को फंसाने वाले असामाजिक तत्वों का पर्दाफाश करती है। इस फिल्म में मुख्य रूप से दिखाया गया है कि कैसे तीन पीड़ित महिलाएं रूढ़िवादी मान्यताओं को तोड़कर, अपनी आपसी कड़वाहट को भुलाकर, एक अत्याचारी पति के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंकती हैं। केसी बोकाड़िया ने इस गंभीर मुद्दे को बिना किसी अश्लीलता के, शुद्ध ड्रामा, एक्शन, और दमदार डायलॉगबाजी के साथ पेश किया है। आइए इस विस्तृत रिव्यू में जानते हैं कि अभिनय, निर्देशन और संगीत के मामले में यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कितनी खरी उतरती है।
90 के दशक में ‘प्यार झुकता नहीं’ और ‘आज का अर्जुन’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में देने वाले केसी बोकाड़िया का सिनेमा हमेशा आम आदमी के संघर्षों की बात करता है। इस बार भी उन्होंने एक बेहद बोल्ड विषय को चुना है। फिल्म की रफ्तार और इसकी सिनेमैटोग्राफी दर्शकों को थिएटर से बांधने का दम रखती है।
Tisri Begum Review: क्या है ‘तीसरी बेगम’ की कहानी? धोखे और पहचान छुपाने का काला सच
फिल्म की पटकथा मुख्य रूप से पूजा दीक्षित (रचना श्याम) नाम की एक बेहद मासूम, भोली-भाली और सीधी लड़की के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी छोटी सी हंसती-खेलती दुनिया में बेहद खुश रहती है। लेकिन उसकी जिंदगी में तब एक भयानक तूफान आता है, जब बब्बन खान नाम का एक बेहद चालाक, शातिर और धोखेबाज शख्स उसकी जिंदगी में एंट्री लेता है।
बब्बन खान अपनी असली धार्मिक पहचान, नीयत और इरादों को छुपाकर पूजा को अपने प्यार के जाल में फंसाता है और धोखे से उससे शादी कर लेता है। शादी के तुरंत बाद पूजा की आजादी छिन जाती है, उसका नाम बदलकर ‘नगमा’ रख दिया जाता है और उसे चारदीवारी में कैद कर दिया जाता है। कहानी में सबसे बड़ा ट्विस्ट तब आता है जब नगमा को पता चलता है कि बब्बन खान की जिंदगी में वह अकेली नहीं है, बल्कि उसकी पहले से ही दो पत्नियां हैं, शबाना (मुग्धा गोडसे) और तबस्सुम।
सौतनें बनीं सहेलियां: यहीं से शुरू होती है आत्मसम्मान की असली जंग
आमतौर पर हमारे समाज और पुरानी फिल्मों में दिखाया जाता है कि सौतनें एक-दूसरे की जानी-दुश्मन होती हैं। लेकिन केसी बोकाड़िया ने इस स्थापित रूढ़िवादी सोच को पूरी तरह से तोड़ दिया है। जब पूजा उर्फ नगमा खुद को इस अंतहीन दलदल में फंसाकर पूरी तरह टूट जाती है, तब शबाना और तबस्सुम उसकी सबसे बड़ी ढाल बनकर सामने आती हैं।
ये तीनों पीड़ित महिलाएं अपनी आपसी कड़वाहट, जलन और सामाजिक संकोच को पूरी तरह दरकिनार कर एक साथ खड़ी होती हैं। वे अपने अत्याचारी पति बब्बन खान के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंकती हैं और अपनी खोई हुई गरिमा, आत्मसम्मान तथा अधिकारों को वापस पाने के लिए एक बड़ी कानूनी और सामाजिक लड़ाई की शुरुआत करती हैं। कोर्टरूम से लेकर समाज की बंदिशों तक, इन तीनों का संघर्ष दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देता है।
अभिनय पक्ष: मुग्धा गोडसे और कायनात अरोड़ा ने स्क्रीन पर फूंकी जान
एक्टिंग के मोर्चे पर फिल्म की पूरी स्टार कास्ट ने बेहद सराहनीय काम किया है। लंबे समय बाद बड़े पर्दे पर वापसी कर रही मुग्धा गोडसे ने ‘शबाना’ के किरदार को बखूबी जिया है, जो सालों से घरेलू और मानसिक प्रताड़ना झेल रही है। मुग्धा के अभिनय में एक खास किस्म का ठहराव और परिपक्वता नजर आती है, खासकर जब उनका गुस्सा फूटता है तो वह सीन दर्शकों पर गहरा असर छोड़ता है।
‘तबस्सुम’ के किरदार में कायनात अरोड़ा ने अपनी पुरानी ग्लैमरस छवि को पीछे छोड़कर एक बेहद गंभीर और संवेदनशील परफॉर्मेंस दी है, उनके कुछ इमोशनल सीन्स दर्शकों की आंखें नम कर देते हैं। वहीं पूजा उर्फ नगमा के रूप में रचना श्याम ने बेहतरीन काम किया है; एक डरी-सहमी लड़की से अपने हक के लिए ‘चंडी’ बनने के उसके पूरे ट्रांसफॉर्मेशन को उन्होंने बहुत ही ईमानदारी के साथ स्क्रीन पर उतारा है। सीनियर एक्ट्रेस जरीना वहाब ने भी अपनी गरिमामयी उपस्थिति से दृश्यों को एक अलग गहराई दी है।
निर्देशन और तकनीकी पक्ष: बनारस और लखनऊ की गलियों का जादू
केसी बोकाड़िया को बॉलीवुड में यूं ही ‘मास्टर डायरेक्टर’ नहीं कहा जाता। इस उम्र में भी सिनेमा को लेकर उनका विजन और स्क्रीन पर उनकी पकड़ वाकई काबिले तारीफ है। उन्होंने संवेदनशील और विवादित सामाजिक विषय को बिना किसी लाउड प्रोपेगैंडा के बेहद सलीके से संभाला है। बोकाड़िया के दमदार और चुटीले संवाद सीधे तौर पर समाज की पुरुष प्रधान सोच पर करारी चोट करते हैं।
तकनीकी तौर पर ‘तीसरी बेगम’ एक बेहद मजबूत फिल्म है। इस फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी (USP) इसकी वास्तविक लोकेशंस हैं। पूरी फिल्म की शूटिंग उत्तर प्रदेश के दो ऐतिहासिक शहरों— लखनऊ और वाराणसी में की गई है। कैमरे ने वहां की तंग गलियों, पुराने मकानों, अदालतों और गंगा के घाटों के मिजाज को इस तरह से कैद किया है कि ये लोकेशंस सिर्फ बैकग्राउंड न रहकर खुद कहानी का एक जीता-जागता किरदार महसूस होती हैं। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर कोर्टरूम ड्रामा के तनाव को बढ़ाने में काफी मदद करता है।
Tisri Begum Review: कहां रह गई कमी? क्यों ‘मास्टरपीस’ बनते-बनते चूकी फिल्म
एक मजबूत सामाजिक संदेश और दमदार अभिनय के बावजूद ‘तीसरी बेगम’ कुछ मोर्चों पर कमजोर साबित होती है। फिल्म का पहला हाफ कहानी की पृष्ठभूमि तैयार करने और शादी के जाल को दिखाने में जरूरत से ज्यादा वक्त ले लेता है। कुछ जगहों पर एडिटिंग काफी ढीली लगती है, जिससे फिल्म की रफ्तार थोड़ी प्रभावित होती है। यदि पहले हाफ को 15 मिनट और ट्रिम किया जाता, तो कहानी ज्यादा चुस्त लगती।
इसके अलावा, फिल्म का अंत बेहद पारंपरिक और घिसे-पिटे पुराने बॉलीवुड स्टाइल में होता है। आज के दौर के युवा जो ओटीटी पर आधुनिक और सस्पेंस-थ्रिलर कंटेंट देखने के आदी हैं, उन्हें यह क्लाइमैक्स काफी हद तक प्रेडिक्टेबल लग सकता है। कुछ दृश्यों में मेलोड्रामा का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ा दिया गया है, जिसे अगर थोड़ा नियंत्रित रखा जाता तो फिल्म का रियलिज्म अधिक उभरकर सामने आता।
Tisri Begum Review: थिएटर्स में देखें या नहीं?
कुल मिलाकर, ‘तीसरी बेगम’ महिला सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय के एक बेहद संवेदनशील और जरूरी मुद्दे को उठाने वाली एक ईमानदार फिल्म है। यह फिल्म साफ संदेश देती है कि जब समाज की पीड़ित महिलाएं अपने मतभेद भूलकर एक साथ खड़ी होती हैं, तो बड़े से बड़ा अत्याचारी भी उनके सामने टिक नहीं सकता। केसी बोकाड़िया का सधा हुआ निर्देशन, मुख्य अभिनेत्रियों का शानदार काम और यूपी की खूबसूरत सिनेमैटोग्राफी इस फिल्म को देखने लायक बनाती है। यदि आप सामाजिक सरोकारों से जुड़ी गंभीर कहानियों को पारंपरिक और कमर्शियल अंदाज में देखना पसंद करते हैं, तो यह फिल्म आपको निराश नहीं करेगी। इन्हीं खूबियों और कमियों के मद्देनजर इस फिल्म को 3 स्टार (3/5) दिए जा सकते हैं।
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