Temple Traditions India: भारत के वो मंदिर जहां पुरुषों की एंट्री पर रोक, जानें अनोखी परंपराएं और नियम

केरल से असम और राजस्थान तक ऐसे मंदिर, जहां खास मौकों पर पुरुषों के प्रवेश पर रोक रहती है

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Temple Traditions India: भारत अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विविधता, आध्यात्मिक विरासत और प्राचीन लोकपरंपराओं के लिए पूरे विश्व में विख्यात है। देश के विभिन्न राज्यों में ऐसे कई ऐतिहासिक और पौराणिक मंदिर स्थित हैं, जिनकी विशिष्ट पूजा पद्धतियां और परंपराएं श्रद्धालुओं को चकित कर देती हैं। आमतौर पर मंदिरों के गर्भगृह और दर्शन को लेकर महिलाओं के प्रवेश से जुड़े नियम चर्चा का केंद्र बनते हैं, किंतु भारत में कई ऐसे सिद्ध धार्मिक स्थल भी हैं जहां विशेष अवसरों, विशिष्ट अनुष्ठानों या निर्धारित कालखंड में पुरुषों के प्रवेश पर सख्त प्रतिबंध रहता है।

केरल के प्रसिद्ध शक्तिपीठों से लेकर असम की नीलाचल पहाड़ियों, राजस्थान के मरुस्थल, बिहार के ग्रामीण अंचलों और तमिलनाडु के सुदूर दक्षिणी छोर तक ऐसे मंदिरों की लंबी श्रृंखला मिलती है। हालांकि, डिजिटल और सोशल मीडिया के दौर में इन मंदिरों को लेकर अक्सर आधी-अधूरी या भ्रामक जानकारियां प्रसारित की जाती हैं, जिससे यह धारणा बनती है कि यहां पुरुषों का प्रवेश स्थायी रूप से वर्जित है। वास्तविकता यह है कि अधिकांश स्थलों पर यह रोक वर्षभर न होकर विशेष वार्षिक पर्वों, देवी के विश्राम काल या विशिष्ट तांत्रिक व पौराणिक अनुष्ठानों तक ही सीमित होती है।

Temple Traditions India: अट्टुकल भगवती मंदिर, केरल

केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में स्थित मां अट्टुकल भगवती का पावन मंदिर स्त्री शक्ति और नारी चेतना का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। इस मंदिर को ‘महिलाओं का सबरीमाला’ भी कहा जाता है। यहां प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला दस दिवसीय ‘अट्टुकल पोंगाला’ (Attukal Pongala) महोत्सव विश्व रिकॉर्ड में दर्ज हो चुका है, जहां लाखों की संख्या में महिलाएं एक साथ एकत्र होकर सड़क से लेकर मंदिर परिसर तक मिट्टी के बर्तनों में देवी के लिए पारंपरिक प्रसाद (पोंगाला) तैयार करती हैं।

पोंगाला उत्सव के मुख्य दिनों में मंदिर परिसर और उसके आसपास के पूरे क्षेत्र में पुरुषों के प्रवेश और धार्मिक गतिविधियों में भागीदारी पर पूर्ण प्रतिबंध रहता है। इस दौरान समूची व्यवस्था, पूजा-अर्चना, सेवा कार्य और नैवेद्य निर्माण केवल महिलाओं द्वारा ही संपन्न किया जाता है। पुरुषों के लिए यह अस्थायी प्रतिबंध देवी के प्रति मातृ शक्ति के अनन्य समर्पण और सात्विक वातावरण बनाए रखने के उद्देश्य से सदियों से लागू है।

चक्कुलथुकावु श्री भगवती मंदिर, केरल: ‘नारी पूजा’ और स्त्री सम्मान की अद्भुत परंपरा

केरल के अलप्पुझा जिले में नीरट्टुपुरम के समीप स्थित चक्कुलथुकावु श्री भगवती मंदिर मां दुर्गा के वनदुर्गा स्वरूप को समर्पित है। इस मंदिर की सबसे अनूठी और हृदयस्पर्शी परंपरा यहां आयोजित होने वाली वार्षिक ‘नारी पूजा’ (Nari Puja) है, जो धनु मास (दिसंबर के अंतिम सप्ताह) के पहले शुक्रवार को आयोजित की जाती है।

नारी पूजा के दिन मंदिर के मुख्य पुजारी स्वयं हजारों महिलाओं के चरण पखारते हैं और उन्हें साक्षात आदि पराशक्ति का स्वरूप मानकर उनकी विधिवत पूजा और आरती करते हैं। इस विशिष्ट अनुष्ठान के दौरान पुरुषों का गर्भगृह और मुख्य पूजा मंडप में प्रवेश पूरी तरह से वर्जित रहता है। इसका मूल उद्देश्य समाज में नारी जाति के प्रति सर्वोच्च सम्मान, पवित्रता और मातृवत दृष्टिकोण स्थापित करना है। सामान्य दिनों में यहां पुरुष और महिला दोनों श्रद्धालु समान रूप से दर्शन कर सकते हैं।

कामाख्या शक्तिपीठ, असम: अंबुबाची के दौरान देवी का वार्षिक ऋतुचक्र और कपाट बंदी

गुवाहाटी स्थित नीलाचल पर्वत पर विराजमान मां कामाख्या का मंदिर 51 शक्तिपीठों में सर्वोच्च तांत्रिक पीठ माना जाता है। यहां देवी की कोई मूर्ति नहीं, बल्कि योनि मुद्रा की शिला रूप में पूजा की जाती है, जो सृष्टि की उत्पत्ति और प्रजनन क्षमता का प्रतीक है।

आषाढ़ मास (जून) में आयोजित होने वाले प्रसिद्ध ‘अंबुबाची मेले’ (Ambubachi Mela) के दौरान ऐसी मान्यता है कि मां कामाख्या अपने वार्षिक ऋतुचक्र (मासिक धर्म) के दौर से गुजरती हैं। इस अवधि में लगातार तीन दिनों तक मंदिर के कपाट पूरी तरह बंद रहते हैं और किसी को भी अंदर जाने की अनुमति नहीं होती। चौथे दिन जब कपाट खुलते हैं, तो सर्वप्रथम केवल महिला पुजारियों और संन्यासियों को ही गर्भगृह की शुद्धि और सेवा का अधिकार मिलता है। इस दौरान पुरुष पुजारियों और श्रद्धालुओं को दूर रखा जाता है। सामान्य दिनों में पुरुष नियमित रूप से दर्शन कर सकते हैं।

भगवती अम्मन मंदिर, कन्याकुमारी: देवी के कुमारी और तपस्विनी स्वरूप का मर्यादा नियम

हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के संगम पर स्थित तमिलनाडु के कन्याकुमारी का भगवती अम्मन मंदिर देवी पराशक्ति के ‘कन्या स्वरूप’ को समर्पित है। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी ने इसी स्थल पर कठोर और अखंड तपस्या की थी तथा आजीवन कुंवारी रहने का संकल्प लिया था।

देवी के इस बाल-कुमारी और तपस्विनी स्वरूप की मर्यादा की रक्षा के लिए मंदिर के अंतःकरण और आंतरिक गर्भगृह के कुछ हिस्सों में विवाहित पुरुषों के प्रवेश को लेकर कड़े नियम लागू रहते हैं। कुछ विशिष्ट अनुष्ठानों के समय केवल अविवाहित बालिकाओं और संन्यासिनों को ही देवी के विग्रह के अत्यंत निकट जाने की अनुमति दी जाती है। यदि पुरुष श्रद्धालु सामान्य दर्शन के लिए जाते हैं, तो उन्हें कमर से ऊपर के वस्त्र उतारकर और मर्यादा का पालन करते हुए ही प्रवेश मिलता है।

माता मंदिर, मुजफ्फरपुर (बिहार): जब मंदिर की संपूर्ण कमान संभालती हैं महिलाएं

उत्तर बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में स्थित एक विख्यात माता मंदिर में भी कामाख्या पीठ की भांति ही देवी के विशेष कालखंड से जुड़ी लोकपरंपरा का निर्वहन किया जाता है। स्थानीय पंचांग के अनुसार, वर्ष के एक विशिष्ट समय में मंदिर में ऐसा कालखंड आता है जब माना जाता है कि देवी रजस्वला हैं।

इस चार दिवसीय विशेष अवधि के दौरान मंदिर के भीतर पुरुष पुजारियों और सामान्य पुरुष श्रद्धालुओं का प्रवेश पूरी तरह रोक दिया जाता है। इस दौरान केवल पट बंद रखकर महिला साधिकाओं और स्थानीय बुजुर्ग महिलाओं द्वारा ही गर्भगृह की शुद्धि, वस्त्र परिवर्तन और श्रृंगार का कार्य संपन्न किया जाता है। इसके पश्चात जब मंदिर दोबारा खुलता है, तब विशेष शुद्धि अनुष्ठान के बाद ही पुरुषों को दर्शन की अनुमति प्राप्त होती है।

ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर (राजस्थान): देवी सरस्वती के शाप से जुड़ी पौराणिक कथा

तीर्थराज पुष्कर में स्थित जगतपिता भगवान ब्रह्मा का मंदिर पूरे विश्व में अपनी तरह का एकमात्र प्रमुख मंदिर माना जाता है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जब भगवान ब्रह्मा यहां सृष्टि कल्याण के लिए महायज्ञ कर रहे थे, तब उनकी प्रथम पत्नी देवी सावित्री (सरस्वती) के समय पर न पहुंचने के कारण ब्रह्मा जी ने गायत्री से गंधर्व विवाह कर यज्ञ संपन्न कर लिया। इससे कुपित होकर देवी सावित्री ने शाप दिया था कि इस पृथ्वी पर ब्रह्मा जी की पूजा केवल पुष्कर में होगी और कोई भी विवाहित पुरुष यदि यज्ञ कुंड या मुख्य गर्भगृह के उस विशिष्ट भाग में प्रवेश करेगा, तो उसके वैवाहिक जीवन में कलह उत्पन्न हो जाएगी।

इसी पौराणिक विश्वास के चलते पुष्कर मंदिर के भीतरी गर्भगृह में विवाहित पुरुषों के सीधे प्रवेश और कुछ विशिष्ट पूजा अनुष्ठानों में उनकी सीधी भागीदारी पर पारंपरिक पाबंदी का विधान माना जाता है। हालांकि मंदिर के बाहरी मंडप से दर्शन करने पर किसी प्रकार की रोक नहीं है।

संतोषी माता मंदिर: शुक्रवार के व्रत और पुरुषों के लिए खटाई व भागीदारी के नियम

उत्तर और मध्य भारत में संतोषी माता के मंदिरों में विशेषकर शुक्रवार के दिन महिलाओं की भारी भीड़ उमड़ती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, संतोषी माता का व्रत मुख्य रूप से महिलाओं, कन्याओं और सुहागिनों द्वारा गृह-शांति और संतान सुख के लिए किया जाता है।

कुछ विशिष्ट संतोषी माता मंदिरों में शुक्रवार की शाम को होने वाली सामूहिक आरती और उद्यापन के दौरान पुरुषों को मुख्य वेदी से अलग रखा जाता है। इसके पीछे मान्यता यह है कि संतोषी माता की पूजा में खट्टी वस्तुओं का स्पर्श और सेवन पूर्णतः वर्जित होता है, और पुरुष अनजाने में भी इस नियम की अवहेलना न कर दें, इसलिए पूजा के मुख्य घेरे में महिलाओं को ही प्राथमिकता दी जाती है।

Temple Traditions India: अंधविश्वास नहीं, सांस्कृतिक विविधता और स्त्री-शक्ति का आदर

भारत के इन मंदिरों में पुरुषों के प्रवेश पर लगने वाली यह पाबंदी किसी सामाजिक भेदभाव या द्वेष का परिणाम नहीं है, बल्कि यह सनातन संस्कृति की उस गहरी दार्शनिक सोच का हिस्सा है जहां प्रकृति, नारी देह और मातृत्व के हर पहलू को ईश्वरीय और पूजनीय माना गया है।

ये परंपराएं स्पष्ट संदेश देती हैं कि भारतीय अध्यात्म में महिलाओं की भूमिका केवल दर्शक की नहीं, बल्कि प्रमुख कर्ता और शक्ति स्वरूप की रही है। अतः इन मंदिरों के नियमों को सनसनीखेज शीर्षकों के चश्मे से देखने के बजाय, उनके पीछे छिपी आस्था, लोकसंस्कृति और प्राकृतिक मर्यादा के संदर्भ में समझना ही सबसे उचित दृष्टिकोण है।

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