Tata Group की कुर्सी की जंग, चेयरमैन पद से लेकर IPO तक, जानें टाटा संस-टाटा ट्रस्ट्स विवाद की पूरी कहानी

Tata Group की कुर्सी की जंग, चेयरमैन पद से लेकर IPO तक, जानें टाटा संस-टाटा ट्रस्ट्स विवाद की पूरी कहानी

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Tata Group: देश के सबसे बड़े कारोबारी समूहों में शुमार टाटा ग्रुप के भीतर सत्ता संघर्ष एक बार फिर सुर्खियों में है। टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच चल रहा विवाद अब पूरी तरह सार्वजनिक हो चुका है और इसके कानूनी लड़ाई तक पहुंचने के आसार बढ़ते जा रहे हैं। टाटा मोटर्स, टीसीएस, टाटा स्टील, टाइटन और इंडियन होटल्स जैसी दर्जनों बड़ी कंपनियां जिस समूह का हिस्सा हैं, उस टाटा ग्रुप का असली नियंत्रण आखिर किसके हाथ में है, यही सवाल इस पूरे विवाद की जड़ बन गया है। मामला केवल चेयरमैन पद की नियुक्ति भर का नहीं है, बल्कि इसके पीछे टाटा संस पर नियंत्रण, शेयर बाजार में संभावित लिस्टिंग और टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका जैसे कई बड़े और जटिल सवाल जुड़े हुए हैं। 17 सितंबर 2026 को टाटा संस के बोर्ड ने एन चंद्रशेखरन को अगले पांच साल के लिए दोबारा चेयरमैन बनाने का प्रस्ताव पास किया, जिसके बाद टाटा ट्रस्ट्स ने इस फैसले की वैधता पर ही सवाल खड़े कर दिए।

Tata Group: टाटा ग्रुप का ढांचा कैसे काम करता है

टाटा ग्रुप की संरचना को समझने के लिए सबसे पहले टाटा संस की भूमिका जाननी जरूरी है, जो पूरे समूह की होल्डिंग कंपनी के तौर पर काम करती है। टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, टीसीएस और टाइटन जैसी तमाम बड़ी कंपनियों में टाटा संस की हिस्सेदारी मौजूद है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर टाटा संस का मालिकाना हक किसके पास है। इसका जवाब है टाटा ट्रस्ट्स, जिसके पास टाटा संस में करीब 66 फीसदी हिस्सेदारी है, जिससे वह सबसे बड़ा शेयरधारक बन जाता है। इसके बाद करीब 18 फीसदी हिस्सेदारी शापूरजी पालोनजी ग्रुप के पास है, जबकि बाकी हिस्सा टाटा परिवार से जुड़े लोगों और कुछ अन्य शेयरधारकों के बीच बंटा हुआ है। इस तरह टाटा ग्रुप की सभी प्रमुख कंपनियों के ऊपर टाटा संस है, और टाटा संस के ऊपर सबसे बड़ा प्रभाव टाटा ट्रस्ट्स का है।

टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका और नेतृत्व

टाटा ट्रस्ट्स कोई सामान्य कारोबारी इकाई नहीं है, बल्कि यह मुख्यतः परोपकारी और सामाजिक कार्यों के लिए जाना जाता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, अनुसंधान, छात्रवृत्ति और सामाजिक विकास जैसे क्षेत्रों में टाटा ट्रस्ट्स की सक्रिय भूमिका रही है और इसकी कमाई का बड़ा हिस्सा इन्हीं गतिविधियों में लगाया जाता है। फिलहाल टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा हैं, जो रतन टाटा के सौतेले भाई हैं। अक्टूबर 2024 में रतन टाटा के निधन के बाद यह जिम्मेदारी नोएल टाटा के कंधों पर आई। दूसरी तरफ टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन हैं, जो वर्ष 2017 से इस पद पर बने हुए हैं। यहीं से दोनों संस्थाओं की भूमिकाओं में स्पष्ट अंतर नजर आता है, एक तरफ टाटा ट्रस्ट्स सबसे बड़ा शेयरधारक है तो दूसरी तरफ टाटा संस का बोर्ड कंपनी के रोजमर्रा के कारोबारी फैसले लेता है।

विवाद की शुरुआत कैसे हुई

अगस्त 2026 में एन चंद्रशेखरन ने संकेत दिया था कि वह अपनी मौजूदा टर्म खत्म होने के बाद दोबारा चेयरमैन पद की मांग नहीं करेंगे। इसके बाद टाटा ट्रस्ट्स ने नए चेयरमैन की तलाश के लिए प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी भी कर ली थी, लेकिन अचानक घटनाक्रम बदल गया। 17 सितंबर 2026 को टाटा संस के बोर्ड की बैठक में एन चंद्रशेखरन को अगले पांच साल के लिए दोबारा चेयरमैन बनाने का प्रस्ताव रखा गया, और बोर्ड ने इसे मंजूरी भी दे दी। यहीं से टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच का यह विवाद पूरी तरह खुलकर सामने आ गया। बोर्ड में टाटा ट्रस्ट्स की तरफ से नोएल टाटा और वेणु श्रीनिवासन, दोनों नॉमिनी डायरेक्टर के तौर पर मौजूद थे, लेकिन इस प्रस्ताव पर दोनों की राय अलग-अलग रही। नोएल टाटा ने प्रस्ताव के खिलाफ वोट डाला, जबकि वेणु श्रीनिवासन ने इसके पक्ष में मतदान किया।

टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच कानूनी तर्क

टाटा ट्रस्ट्स का मुख्य दावा यह है कि टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन यानी कंपनी के आंतरिक नियमों में एक विशेष प्रावधान है, जिसके तहत कुछ महत्वपूर्ण फैसलों में ट्रस्ट्स के दोनों नॉमिनी डायरेक्टरों की सहमति अनिवार्य मानी जाती है। ट्रस्ट्स का तर्क है कि जब दोनों नॉमिनी में से एक ने ही विरोध कर दिया है, तो केवल दूसरे के समर्थन के आधार पर लिया गया फैसला वैध नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर ट्रस्ट्स ने चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति के प्रस्ताव पर सवाल खड़े किए हैं। वहीं टाटा संस की तरफ से इसका बिल्कुल अलग कानूनी नजरिया पेश किया जा रहा है। टाटा संस का कहना है कि बोर्ड मीटिंग में वोट बराबर होने की स्थिति में कंपनी के नियमों के अनुसार चेयरमैन के पास कास्टिंग वोट यानी निर्णायक वोट का अधिकार होता है। हालांकि टाटा ट्रस्ट्स इस तर्क को पूरी तरह खारिज करता है और कहता है कि यह मामला सामान्य बोर्ड वोटिंग जैसा नहीं है, बल्कि इसमें विशेष सहमति की शर्त जुड़ी हुई है।

टाटा संस की लिस्टिंग का मुद्दा भी बना विवाद की वजह

चेयरमैन पद के अलावा टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच मतभेद का एक और बड़ा कारण कंपनी की शेयर बाजार में संभावित लिस्टिंग है। वर्ष 2022 में भारतीय रिजर्व बैंक ने टाटा संस को अपर लेयर एनबीएफसी की श्रेणी में रखा था, जिसके बाद कंपनी पर कुछ अतिरिक्त नियामकीय शर्तें लागू हुईं, जिनमें शेयर बाजार में लिस्टिंग की आवश्यकता भी शामिल थी। हालांकि अब तक टाटा संस की लिस्टिंग नहीं हो सकी है और इसकी समयसीमा लगातार आगे बढ़ती रही है। शापूरजी पालोनजी ग्रुप, जिसकी टाटा संस में करीब 18 फीसदी हिस्सेदारी है, लंबे समय से लिस्टिंग की मांग करता रहा है, क्योंकि इससे उसकी हिस्सेदारी का बाजार मूल्य स्पष्ट रूप से सामने आ सकेगा। दूसरी ओर टाटा ट्रस्ट्स को आशंका है कि लिस्टिंग के बाद कंपनी की मौजूदा संरचना और उसके प्रभाव पर असर पड़ सकता है, क्योंकि इससे बाजार की निगरानी और सार्वजनिक प्रकटीकरण की जरूरतें बढ़ जाएंगी।

क्या यह टाटा ग्रुप के नियंत्रण की लड़ाई है

पूरे विवाद को अगर सरल भाषा में समझा जाए, तो असली सवाल यही है कि टाटा संस पर अंतिम रूप से नियंत्रण किसका रहेगा। टाटा ट्रस्ट्स के पास सबसे बड़ी हिस्सेदारी जरूर है, लेकिन कंपनी का रोजमर्रा का कामकाज बोर्ड और प्रबंधन के हाथों में होता है। यानी शेयरहोल्डिंग और बोर्ड नियंत्रण के बीच का संतुलन ही इस पूरे विवाद के केंद्र में है, और चेयरमैन की नियुक्ति इसी संतुलन की एक अहम कड़ी बन गई है। दिलचस्प बात यह है कि यह मतभेद केवल टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच ही सीमित नहीं है, बल्कि ट्रस्ट्स के भीतर भी अलग-अलग राय सामने आई है, क्योंकि कानूनी खर्च से जुड़े एक प्रस्ताव पर ट्रस्टी विजय सिंह और वेणु श्रीनिवासन ने हस्ताक्षर नहीं किए हैं।

अब मामला कहां तक पहुंच सकता है

इस विवाद में दोनों पक्ष कानूनी तैयारियों में जुट गए हैं। टाटा संस की तरफ से वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे और टाटा ट्रस्ट्स की तरफ से अभिषेक मनु सिंघवी के पैरवी करने की जानकारी सामने आई है। टाटा ट्रस्ट्स एनसीएलटी या बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख कर सकता है, वहीं भारतीय रिजर्व बैंक ने भी एहतियातन बॉम्बे हाईकोर्ट में कैविएट दाखिल कर दी है, ताकि उसका पक्ष सुने बिना कोई एकतरफा आदेश न दिया जाए। इससे साफ है कि यह विवाद अब केवल टाटा ग्रुप के भीतर का मामला नहीं रह गया, बल्कि इसमें नियामकीय पहलू भी जुड़ गया है। गौरतलब है कि टाटा ग्रुप के इतिहास में इससे पहले भी साइरस मिस्त्री और रतन टाटा के बीच बड़ा टकराव हो चुका है, जो अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था और 2021 में टाटा समूह के पक्ष में फैसला आया था।

टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच का यह ताजा विवाद केवल चेयरमैन पद की नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कंपनी के आंतरिक नियमों की व्याख्या, शेयरधारकों के अधिकार और नियामकीय अनुपालन जैसे कई जटिल पहलू आपस में जुड़े हुए हैं। आने वाले दिनों में अगर यह मामला अदालत तक पहुंचता है, तो टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन की सही व्याख्या, नॉमिनी डायरेक्टरों की सहमति की अनिवार्यता और चेयरमैन के कास्टिंग वोट जैसे कई अहम सवालों पर स्पष्टता आ सकती है। यह विवाद अंततः यह तय करेगा कि भारत के सबसे बड़े कारोबारी समूह में शेयरधारकों और बोर्ड के बीच अधिकारों की सीमा आखिर कहां तक है।

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