POCSO Act: POCSO मामलों में सिर्फ 32% दोषसिद्धि पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, 68% आरोपी बरी होने पर उठाए गंभीर सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने कम दोषसिद्धि दर पर जताई चिंता, जांच और सबूतों की गुणवत्ता पर सवाल
POCSO Act: बच्चों की सुरक्षा के लिए लाए गए पॉक्सो (POCSO) कानून में दोषसिद्धि दर बेहद कम होने पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी चिंता जताई है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 100 में से सिर्फ 32 मामलों में ही आरोपी को सजा हो पाती है जबकि 68 फीसदी मामलों में आरोपी बरी हो जाते हैं। एनसीआरबी (NCRB) के ताजा आंकड़ों और विभिन्न न्यायविदों के अध्ययनों से पता चलता है कि कई मामलों में किशोरों के रोमांटिक रिलेशनशिप, अदालती प्रक्रिया के दौरान गवाहों का मुकरना और ठोस सबूतों की कमी इस विफलता की मुख्य वजहें हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे संवेदनशील मामलों में अधिक मुस्तैदी और सख्ती से जांच करने की जरूरत पर विशेष जोर दिया है।
POCSO कानून का मूल मकसद, वर्तमान जमीनी स्थिति और ऐतिहासिक संशोधन
साल 2012 में लाए गए पॉक्सो एक्ट का मुख्य उद्देश्य 18 साल से कम उम्र के बच्चों को हर प्रकार के यौन शोषण से मुस्तैदी से बचाना था। इसके बाद साल 2019 में इस कानून में बड़ा संशोधन कर कुछ जघन्य अपराधों के लिए सीधे मौत की सजा का कड़ा प्रावधान भी जोड़ा गया। लेकिन एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार साल 2024 में दर्ज कुल 69,191 मामलों में कन्विक्शन रेट महज 32 प्रतिशत दर्ज किया गया। इस अवधि के दौरान 39,249 मामलों में कानूनी ट्रायल पूरा हुआ, जिनमें से केवल 12,672 मामलों में ही आरोपियों को सजा हो सकी, जबकि 25,476 मामलों में आरोपी पूरी तरह बरी हो गए, जो न्याय प्रणाली की वर्तमान स्थिति को दर्शाता है।
सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां और आपसी सहमति वाले रोमांटिक रिश्ते
सुप्रीम कोर्ट ने हालिया सुनवाई के दौरान स्पष्ट कहा कि 15 से 18 साल की उम्र इंसानी जीवन में नए प्रयोगों और भावनात्मक विकास का एक बेहद नाजुक समय होती है। शीर्ष अदालत के अनुसार आपसी सहमति वाले किशोरों के रोमांटिक रिश्तों को हर बार सीधे पॉक्सो का गंभीर आपराधिक मामला नहीं माना जा सकता। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की खंडपीठ ने माता-पिता द्वारा अपने सामाजिक सम्मान को बचाने के लिए ऐसे मामलों को जबरन आपराधिक रंग देने की प्रवृत्ति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने कई मौकों पर यह दोहराया है कि प्राकृतिक लगाव या प्यार को सीधे तौर पर एक संगीन अपराध की श्रेणी में नहीं डाला जा सकता।
NCRB के आंकड़ों का विश्लेषण और अदालतों में कम कन्विक्शन रेट की मुख्य वजहें
आंकड़ों के मुताबिक साल 2026 की समीक्षा के तहत पॉक्सो के तहत देश में औसतन रोज 195 बच्चे प्रभावित हुए, जिनमें से 97 प्रतिशत मामलों में आरोपी पीड़ित का कोई नजदीकी परिचित ही पाया गया। इस कानून की धारा 4 और 6 के तहत सबसे ज्यादा 64 प्रतिशत मामले दर्ज किए गए। अदालतों में कम कन्विक्शन रेट की मुख्य वजहों पर गौर करें तो गवाहों का ऐन वक्त पर मुकर जाना, वैज्ञानिक सबूतों की भारी कमी और किशोर प्रेम संबंधों के चलते बाद में आपसी समझौता हो जाना सबसे प्रमुख कारक साबित हो रहे हैं।
POCSO Act: अकादमिक अध्ययनों में सामने आई कड़वी सच्चाई और किशोर प्रेम संबंधों का कानून
इनफोल्ड प्रोएक्टिव हेल्थ ट्रस्ट की विस्तृत स्टडी में यह पाया गया कि पॉक्सो के तहत दर्ज होने वाले कई मामले वास्तव में किशोरों के आपसी रोमांटिक रिलेशनशिप से जुड़े हुए थे, जहाँ शुरुआती एफआईआर (FIR) ज्यादातर पीड़ित के माता-पिता द्वारा सामाजिक दबाव में दर्ज कराई जाती है। इसके साथ ही एनएलएसआईयू (NLSIU) की नेशनल स्टडी में भी यह तथ्य सामने आया कि हर पांच में से एक मामले में पीड़ित और आरोपी के बीच पहले से रोमांटिक संबंध मौजूद थे। जब समाज या परिवार के दबाव में यह रिश्ता टूटता है तो केस दर्ज करा दिया जाता है, लेकिन बाद में कोर्ट में ट्रायल के दौरान कोई पुख्ता गवाही नहीं मिलती है।
POCSO कानून के अनजाने दुरुपयोग के मुख्य कारण और जांच में होने वाली देरी
इस कानून के कम दोषसिद्धि दर के पीछे कई प्रमुख व्यावहारिक कारण जिम्मेदार हैं, जिनमें परिवार की आपसी नाराजगी या सामाजिक सम्मान बचाने के लिए कानून का गलत इस्तेमाल करना सबसे ऊपर है। इसके साथ ही किशोर प्रेम संबंधों को जबरन गंभीर रूप से आपराधिक बनाना, घटना स्थल से फोरेंसिक सबूतों और मेडिकल रिपोर्टों की तकनीकी कमी होना, गवाहों का मुकर जाना और पुलिस जांच में होने वाली अत्यधिक देरी शामिल है। ये सभी कारक मिलकर अदालतों में अंतिम कन्विक्शन रेट को बुरी तरह प्रभावित करते हैं।
इस संवेदनशील विषय पर सरकार का आधिकारिक रुख और कानूनी विशेषज्ञों की राय
केंद्र सरकार ने संसद में स्पष्ट किया है कि अदालतों में कन्विक्शन पूरी तरह से पुलिस की निष्पक्ष जांच और कोर्ट में पेश किए गए पुख्ता सबूतों पर निर्भर करता है। पॉक्सो के किसी भी प्रकार के दुरुपयोग को रोकने के लिए सामाजिक जागरूकता और बेहतर पुलिस जांच पर लगातार जोर दिया जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए पॉक्सो कानून को पूरी तरह मजबूत रखते हुए इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए कुछ कड़े दिशानिर्देश जारी करना बेहद जरूरी है, जिसके लिए संवेदनशील जांच प्रणाली, पर्याप्त फास्ट ट्रैक कोर्ट्स और पीड़ितों के लिए एक मजबूत सपोर्ट सिस्टम की तत्काल आवश्यकता है।
निष्कर्ष: पॉक्सो मामलों में बेहद (POCSO Act) कम कन्विक्शन रेट होना देश की संपूर्ण न्याय व्यवस्था के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है। अदालतों से 68 प्रतिशत आरोपियों के बरी होने की इस वर्तमान स्थिति को सुधारने के लिए एक बहुआयामी और व्यापक प्रयास की जरूरत है। सही मामलों में जहां त्वरित न्याय और दोषियों को कड़ी सजा मिलना आवश्यक है, वहीं झूठे मामलों में कानून के गलत इस्तेमाल पर सख्ती बरतना भी उतना ही जरूरी है। बच्चों की वास्तविक सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ देश की न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता का संतुलन बनाए रखना आज के समय की सबसे बड़ी मांग है।
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