ईरान और अमेरिका के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नए तनाव से ब्रेंट क्रूड 5 प्रतिशत उछला, भारत पर क्या होगा असर और आगे क्या होगा
ईरान-अमेरिका टकराव से तेल बाजार में उबाल; ब्रेंट क्रूड 95 डॉलर के पार, सप्लाई चेन पर खतरा।
Brent crude oil prices: जब दुनिया यह मान रही थी कि होर्मुज की गलियारे में शांति लौट रही है, ठीक उसी वक्त तस्वीर फिर से पलट गई। सोमवार 20 अप्रैल 2026 को अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में अचानक बड़ी तेजी आई। ब्रेंट क्रूड 5.62 प्रतिशत उछलकर 95.46 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी WTI क्रूड 5.97 प्रतिशत बढ़कर 88.86 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान और अमेरिका के बीच नए सिरे से तनाव के बाद यह उछाल आई है। भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए यह संकट गंभीर चिंता का विषय है।
ब्रेकिंग अपडेट: सोमवार को तेल बाजार में कीमतों का ताज़ा हाल
20 अप्रैल 2026 को सुबह 0418 GMT तक ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स में 5.08 डॉलर यानी 5.62 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई और कीमत 95.46 डॉलर प्रति बैरल पर जा पहुंची। इसी दौरान अमेरिकी WTI क्रूड 5.01 डॉलर यानी 5.97 प्रतिशत उछलकर 88.86 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करने लगा। यह उछाल इसलिए और चौंकाने वाली है क्योंकि शुक्रवार को इन्हीं दोनों अनुबंधों में 9 प्रतिशत की भारी गिरावट आई थी।
पृष्ठभूमि: शुक्रवार की उम्मीद सोमवार को क्यों टूट गई
18 अप्रैल 2026 को ईरान ने घोषणा की थी कि सीजफायर की अवधि तक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज सभी व्यावसायिक जहाजों के लिए खुला रहेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी कहा था कि ईरान ने इसे दोबारा बंद न करने पर सहमति दे दी है। लेकिन घोषणा के केवल चौबीस घंटे बाद ईरान के ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ ने कुछ टैंकरों पर गोलीबारी कर दी जिससे पूरी स्थिति एक बार फिर बदल गई। रविवार को अमेरिका ने एक ईरानी मालवाहक जहाज को जब्त कर लिया, जिससे तनाव और गहरा गया है।
Brent crude oil prices: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की महत्ता और तेल आपूर्ति पर संकट
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज ओमान और ईरान के बीच स्थित एक संकरा समुद्री मार्ग है। युद्ध शुरू होने से पहले इस जलडमरूमध्य से दुनिया की कुल तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता था। इस रास्ते से खाड़ी देशों का तेल एशिया, यूरोप और अमेरिका तक पहुंचता है। शनिवार को 20 से अधिक जहाज इस मार्ग से गुजरे थे, लेकिन नई गोलीबारी की घटना ने जहाज मालिकों के बीच फिर से भय का माहौल बना दिया है। रोजाना 10 से 11 मिलियन बैरल कच्चा तेल अभी भी फंसा हुआ है।
विशेषज्ञ विश्लेषण: बाजार की दिशा और अस्थिरता
ऊर्जा बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि तेल बाजार जमीनी हकीकत के बजाय अमेरिका और ईरान के सोशल मीडिया पोस्ट पर प्रतिक्रिया दे रहा है। जहाज मालिक तब तक दोबारा जोखिम नहीं उठाएंगे जब तक उन्हें पूरा विश्वास न हो जाए कि रास्ता सचमुच सुरक्षित है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलने की घोषणा समय से पहले कर दी गई थी। ईरान ने परमाणु वार्ता से इनकार कर दिया है और होर्मुज पर नाकेबंदी को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
भारत पर क्या पड़ेगा असर: महंगाई और आयात बिल
भारत अपनी तेल जरूरतों का 85 प्रतिशत से अधिक आयात करता है। खाड़ी देश भारत के सबसे बड़े तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हैं। यदि कच्चे तेल की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी रहती है तो भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ेगा। इसका सीधा असर महंगाई, रुपये की कीमत और आम आदमी की जेब पर पड़ेगा। पेट्रोल और डीजल के दाम पर दबाव बनेगा और ढुलाई लागत बढ़ने से रोजमर्रा की जरूरी वस्तुएं भी महंगी हो सकती हैं।
आगे क्या होगा: तेल की कीमतों का भविष्य
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक अमेरिका और ईरान के बीच कोई ठोस और दीर्घकालिक समझौता नहीं होता, तेल की कीमतों में यह उथल-पुथल जारी रहेगी। यदि स्थिति और बिगड़ती है तो ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल की सीमा छू सकता है। ऐसे में ओपेक देशों पर उत्पादन बढ़ाने का दबाव बढ़ेगा और भारत सहित कई एशियाई देश वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत तलाशने में जुट जाएंगे।
निष्कर्ष: वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के केंद्र में होर्मुज
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज एक बार फिर वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के केंद्र में आ गया है। ईरान और अमेरिका के बीच यह टकराव केवल दो देशों की लड़ाई नहीं है, इसकी लपटें भारत जैसे करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी तक पहुंचती हैं। जब तक इस क्षेत्र में स्थायी शांति नहीं आती, तेल बाजार में अनिश्चितता बनी रहेगी और भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए दीर्घकालिक रणनीति पर काम करना होगा।
read more here