RSS Statement: ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ पर पहला बयान, Sunil Ambekar बोले— भारत का Gen-Z आशावादी, लोकतंत्र मजबूत और नई आवाजों को समाहित करने में सक्षम
सुनील आंबेकर ने युवाओं के आशावाद और लोकतंत्र की मजबूती पर जताया भरोसा
RSS Statement: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को लेकर देश के वैचारिक गलियारों में चल रही बहसों के बीच अपनी पहली आधिकारिक प्रतिक्रिया दर्ज की है। आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने एक महत्वपूर्ण वक्तव्य में कहा कि भारत की नई युवा पीढ़ी यानी जेन-Z (Gen-Z) बेहद आशावादी है और देश के संवैधानिक ढांचे तथा लोकतांत्रिक मूल्यों पर उनका पूरा विश्वास है। उन्होंने कूटनीतिक रूप से स्पष्ट किया कि भारतीय लोकतंत्र के भीतर विभिन्न प्रकार के नए विचारों, आंदोलनों और अलग-अलग आवाजों को अपने भीतर समाहित करने की एक बहुत बड़ी और अद्भुत प्राकृतिक क्षमता मौजूद है।
नागपुर में पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत करते हुए आंबेकर ने जोर देकर कहा कि लोकतंत्र में समय-समय पर उठने वाले किसी भी प्रकार के मुद्दों या असंतोषों को सुलझाने के लिए हमारे पास पहले से ही बेहद मजबूत संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके उपलब्ध हैं। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को लेकर देश की राजनीति में उठे हालिया विवाद पर आरएसएस का यह पहला आधिकारिक बयान कूटनीतिक रूप से काफी ज्यादा महत्वपूर्ण और दूरगामी माना जा रहा है। कई वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक और शिक्षाविद इस बयान को संघ की एक बेहद संतुलित, परिपक्व और राष्ट्रव्यापी सोच का प्रतीक बता रहे हैं। आइए जानते हैं इस बयान के पूरे विवरण, इसके पीछे छिपे मुख्य राजनीतिक मायनों और देश के भविष्य की राजनीति पर पड़ने वाले इसके संभावित कूटनीतिक प्रभावों के बारे में विस्तार से।
सुनील आंबेकर का मुख्य बयान: देश की नई युवा पीढ़ी यानी जेन-Z पर संघ का अटूट भरोसा
आरएसएस के वरिष्ठ अधिकारी और अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के उभार और उससे जुड़े तीखे सवालों का बहुत ही सहजता से जवाब देते हुए कहा कि भारत का वर्तमान युवा वर्ग, विशेषकर जेन-Z कूटनीतिक रूप से बेहद आशावादी, जागरूक और देशभक्ति की भावना से पूरी तरह ओतप्रोत है। उनका स्पष्ट रूप से कहना था कि ये सभी युवा देश के स्थापित संवैधानिक दायरे के अंदर रहकर ही अपनी रचनात्मक गतिविधियां संचालित करते हैं और राष्ट्र की प्रगति में अपना पूरा विश्वास रखते हैं।
सुनील आंबेकर ने अपने वक्तव्य में कहा कि भारत का यह नया युवा वर्ग देश के उज्ज्वल भविष्य पर अटूट विश्वास रखता है, इसीलिए लोकतांत्रिक प्रणाली के भीतर अलग-अलग प्रकार के नए विचारों या राजनीतिक पहलों के सामने आने को एक सामान्य और स्वस्थ कूटनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा माना जाना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि देश का सजग मीडिया और यहाँ के विभिन्न स्थापित राजनीतिक दल इन सभी लोकतांत्रिक विमर्शों और युवा मुद्दों को रचनात्मक तरीके से संभालने में पूरी तरह से परिपक्व और सक्षम हैं। उन्होंने इसके साथ ही यह भी रेखांकित किया कि आरएसएस को भारतीय समाज की चेतना और यहाँ के लोकतंत्र की आंतरिक मजबूती पर हमेशा से पूरा भरोसा रहा है।
भारतीय संवैधानिक व्यवस्था और लोकतंत्र की आंतरिक मजबूती पर RSS का विशेष जोर
सुनील आंबेकर ने इस बात को पूरी तरह से स्पष्ट और कूटनीतिक रूप से परिभाषित किया कि भारतीय लोकतंत्र आज पूरी दुनिया का सबसे बड़ा, जीवंत और वैधानिक रूप से बेहद मजबूत लोकतंत्र है। हमारे देश के भीतर पूरी तरह पारदर्शी चुनाव प्रणालियां मौजूद हैं, सोशल मीडिया का माध्यम सभी के लिए पूरी तरह खुला हुआ है और यहाँ हर एक नागरिक की वैचारिक आवाज को कूटनीतिक रूप से पूरी जगह मिलती है। उन्होंने कहा कि समाज के विभिन्न ज्वलंत मुद्दों पर खुली चर्चा और विमर्श होना हमारे जीवंत लोकतंत्र की असली ताकत का परिचायक है, न कि उसकी किसी कमजोरी का।
आरएसएस के वरिष्ठ नेता ने कहा कि हमारी जनता की आंतरिक सामूहिक शक्ति और देश का लोकतंत्र बुनियादी रूप से इतना मजबूत है कि वह हर एक नागरिक की भावनाओं और आकांक्षाओं को अपने भीतर शामिल करने की पूरी कूटनीतिक क्षमता रखता है। इसके साथ ही उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए रखने में देश के स्वतंत्र मीडिया और विभिन्न राजनीतिक दलों की सकारात्मक भूमिका की भी खुलकर सराहना की। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संघ का यह रुख उसकी परंपरागत ‘राष्ट्र प्रथम’ की मूल कूटनीतिक सोच को पूरी तरह प्रदर्शित करता है, जिसके तहत वे देश में उठने वाली किसी भी नई या लीक से हटकर आने वाली युवा राजनीतिक आवाज को तुरंत खारिज करने के बजाय उसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक स्वाभाविक हिस्सा स्वीकार करते हैं।
आखिर क्या है यह ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ और इसके पीछे की मुख्य पृष्ठभूमि?
राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य को देखें तो ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ हाल ही के दिनों में इंटरनेट और विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अचानक तेजी से चर्चा में आई एक बिल्कुल नई और लीक से हटकर राजनीतिक पहल मानी जा रही है, जिसे मुख्य रूप से देश के युवा वर्ग और कॉलेज जाने वाले जेन-Z वोटरों द्वारा बड़े पैमाने पर डिजिटल समर्थन मिल रहा है। इस अनोखे नाम और इसके पीछे की विचारधारा को लेकर इस समय देश के भीतर इसके कड़े आलोचकों और समर्थकों के बीच एक बहुत ही जोरदार बहस छिड़ी हुई है। जहाँ समाज का एक बड़ा वर्ग इसे केवल एक व्यंग्यात्मक या प्रतीकात्मक नाम मान रहा है, तो वहीं दूसरी ओर कुछ विचारकों का यह भी मानना है कि यह नाम वास्तव में नई पीढ़ी के भीतर व्यवस्था के प्रति छिपे एक गहरे असंतोष और उनकी नई आकांक्षाओं की एक सामूहिक आवाज है। आरएसएस का यह आधिकारिक बयान सामने आने से पहले ही देश के कई प्रमुख पारंपरिक राजनीतिक दलों ने इस नई राजनीतिक पहल पर अपनी बेहद तीखी और नकारात्मक प्रतिक्रियाएं दर्ज कराई थीं, लेकिन अब इस पूरे विषय पर आरएसएस के इस संतुलित व सकारात्मक कूटनीतिक रुख ने इस पूरी राष्ट्रीय बहस को एक बिल्कुल नई और रचनात्मक दिशा प्रदान कर दी है।
पड़ोसी देश पाकिस्तान से द्विपक्षीय बातचीत के नाजुक मुद्दे पर भी RSS ने रखी अपनी स्पष्ट राय
इस प्रेस वार्ता के दौरान सुनील आंबेकर ने न केवल घरेलू मुद्दों पर बल्कि भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय बातचीत और संबंधों के संवेदनशील मुद्दे पर भी संघ के विचारों को बहुत ही स्पष्टता के साथ सामने रखा। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमेशा से ही दो समाजों और लोगों के बीच कूटनीतिक स्तर पर संवाद और संपर्क बनाए रखने का प्रबल समर्थक रहा है। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि सरकारी या राजनयिक स्तर पर पाकिस्तान से औपचारिक बातचीत कब और किन शर्तों पर शुरू करनी है, यह पूरी तरह से चुनी हुई सरकार का अपना संप्रभु राजनीतिक और कूटनीतिक निर्णय होता है, लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों के आम लोगों के बीच सांस्कृतिक और सामाजिक संपर्क को बनाए रखना व्यावहारिक रूप से जरूरी होता है।
आंबेकर ने इस कूटनीतिक बिंदु को और स्पष्ट करते हुए कहा कि जब किन्हीं कठिन परिस्थितियों के कारण दोनों देशों के बीच के आधिकारिक राजनयिक चैनल्स पूरी तरह काम नहीं कर रहे होते हैं, तब भी लोगों के बीच आपसी संवाद का रास्ता खुला रखना चाहिए, तथा दोनों देशों को अपने द्विपक्षीय व्यापार और पुराने मानवीय संबंधों को किसी न किसी रूप में बनाए रखना चाहिए ताकि समय के साथ धीरे-धीरे जटिल से जटिल समस्याओं का भी एक शांतिपूर्ण समाधान निकाला जा सके। इसके साथ ही उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भों की याद दिलाते हुए यह भी दोहराया कि संघ वैचारिक रूप से भारत के पूर्व विभाजन का हमेशा से ही विरोधी रहा है और वह पूरे अखंड भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक एकता में विश्वास रखता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की समृद्ध सांगठनिक परंपरा और वर्तमान समसामयिक संदर्भ
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के कालखंड से लेकर अब तक के उसके लंबे इतिहास को देखें तो यह सांस्कृतिक संगठन हमेशा से ही राष्ट्रहित और देश की संप्रभुता को अपने सभी सांगठनिक कार्यों में कूटनीतिक रूप से सर्वोपरि रखता आया है। वर्तमान समय में सरसंघचालक मोहन भागवत के कुशल और आधुनिक नेतृत्व के अंतर्गत आरएसएस ने देश के कई जटिल सामाजिक और समसामयिक मुद्दों पर बेहद संतुलित, दूरदर्शी और कूटनीतिक रूप से परिपक्व रुख अपनाया है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ जैसी नई सोशल मीडिया पहलों पर संघ के आधिकारिक मंच से दिया गया यह नया बयान भी पूरी तरह से उसकी उसी पुरानी और समावेशी परंपरा को आगे बढ़ाता हुआ साफ दिखाई दे रहा है। आरएसएस के कई वरिष्ठ प्रचारक और आधुनिक विचारक इस बात को गहराई से मानते हैं कि आज के बदलते डिजिटल युग में देश की नई युवा पीढ़ी की आकांक्षाओं, उनकी सोच और उनके काम करने के तौर-तरीकों को गहराई से समझना और उन्हें सही दिशा देकर राष्ट्र निर्माण की मुख्यधारा में शामिल करना बेहद आवश्यक है, और इसी कूटनीतिक दृष्टिकोण के तहत सुनील आंबेकर का यह वक्तव्य युवा संवाद की दिशा में एक बेहद सकारात्मक और बड़ा कदम माना जा रहा है।
आरएसएस के इस बड़े बयान पर देश के विभिन्न राजनीतिक दलों की आई प्रतिक्रियाएं
आरएसएस के इस हाई-प्रोफाइल कूटनीतिक बयान के मीडिया में आने के तुरंत बाद देश भर के विभिन्न राजनीतिक दलों ने इस पर अपनी अलग-अलग राजनीतिक प्रतिक्रियाएं देनी शुरू कर दी हैं। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रवक्ताओं ने संघ के इस संतुलित बयान का पूरी तरह से स्वागत किया है और इसे युवाओं के प्रति सकारात्मक सोच का प्रतीक बताया है, जबकि इसके विपरीत देश के कुछ प्रमुख विपक्षी दलों का यह कहना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को केवल सतही तौर पर युवाओं के आशावाद की तारीफ करने के बजाय, आज के युवाओं के भीतर पनप रहे इस असंतोष और आक्रोश के मुख्य जमीनी कारणों को भी गहराई से समझने का प्रयास करना चाहिए।
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों के नेताओं का कहना है कि आज देश का युवा वर्ग बढ़ती बेरोजगारी, महंगी उच्च शिक्षा और रोजगार के अवसरों की कमी जैसे गंभीर संकटों से जूझ रहा है, और इन बुनियादी समस्याओं पर ध्यान दिए बिना सिर्फ युवाओं के आशावादी होने की बात करना पूरी तरह से पर्याप्त नहीं माना जा सकता है, वहीं दूसरी ओर कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने इस पूरे बयान को आगामी चुनावों के मद्देनजर युवाओं को आकर्षित करने की संघ की एक नई और सोची-समझी कूटनीतिक रणनीति का एक हिस्सा भी बताया है।
RSS Statement: बदलते जनसांख्यिकीय दौर में भारत का ‘जेन-Z’ और देश की मुख्यधारा की राजनीति
सांख्यिकीय और जनसांख्यिकीय आंकड़ों के अनुसार, भारत में वर्तमान समय में जो युवा वर्ग ‘जेन-Z’ (यानी वर्ष 1997 से लेकर वर्ष 2012 के बीच जन्मे युवा) की श्रेणी में आता है, वह आज देश के कुल सक्रिय मतदाताओं का एक बहुत बड़ा और निर्णायक हिस्सा बन चुका है। यह नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ियों के मुकाबले कूटनीतिक रूप से सोशल मीडिया के आधुनिक माध्यमों, पर्यावरण संरक्षण के वैश्विक मुद्दों, रोजगार की नई तकनीकों और सामाजिक न्याय जैसे विषयों पर बहुत ज्यादा सक्रिय, मुखर और स्वतंत्र विचार रखने वाली मानी जाती है। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे देश के सबसे बड़े संगठन द्वारा अपने आधिकारिक बयान में इन नए युवा वोटरों को सीधे तौर पर बेहद आशावादी और देशभक्त बताना राजनीतिक और रणनीतिक रूप से अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है। देश के वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट कहना है कि आने वाले समय में देश के भीतर होने वाले किसी भी बड़े आम चुनाव में इस जेन-Z वर्ग की कूटनीतिक भूमिका सबसे ज्यादा निर्णायक साबित होने वाली है, और यदि देश के पारंपरिक राजनीतिक दल इन आधुनिक युवाओं की बदलती आकांक्षाओं और उनकी डिजिटल सोच को समय रहते पूरा नहीं कर पाए, तो देश के भीतर कुछ बिल्कुल नई और अप्रत्याशित कूटनीतिक राजनीतिक ताकतों का उदय होना पूरी तरह से तय है।
युवाओं और नए सामाजिक आंदोलनों को लेकर संघ का भविष्य का कूटनीतिक रुख
आरएसएस के इस महत्वपूर्ण बयान के घटनाक्रम से यह बात पूरी तरह से साफ हो जाती है कि यह संगठन आज के बदलते दौर में देश के भीतर उठने वाले नए युवा आंदोलनों या सोशल मीडिया पर चलने वाले विमर्शों को पूरी तरह से खारिज या अनदेखा नहीं कर रहा है, बल्कि वह बहुत ही बुद्धिमानी से इन युवाओं को देश के लोकतांत्रिक और संवैधानिक ढांचे के भीतर ही रहकर अपनी ऊर्जा का सही इस्तेमाल करने की कूटनीतिक सलाह दे रहा है। संघ के अंदरूनी सूत्रों का यह भी दावा है कि आने वाले समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सरसंघचालक मोहन भागवत के आगामी विभिन्न सार्वजनिक कार्यक्रमों व बौद्धिक सत्रों के भीतर भी देश के युवा वर्ग से जुड़े इन संवेदनशील मुद्दों, रोजगार की नई संभावनाओं और युवाओं की डिजिटल आकांक्षाओं पर संगठन का मुख्य फोकस और ज्यादा कड़ाई से बढ़ाया जा सकता है, ताकि देश की युवा शक्ति को भटकाव से बचाकर राष्ट्र निर्माण के कूटनीतिक मार्ग पर लगाया जा सके।
निष्कर्ष: बदलते राजनीतिक परिवेश में भारतीय लोकतंत्र की यह एक बड़ी परीक्षा है
‘कॉकरोच जनता पार्टी’ जैसे संवेदनशील और विवादित विषय पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का यह पहला आधिकारिक बयान वास्तव में बदलते समय के साथ भारतीय लोकतंत्र की आंतरिक परिपक्वता, उसकी सहनशीलता और उसके लचीलेपन को कूटनीतिक रूप से प्रदर्शित करता है। संघ के प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर के इन संतुलित शब्दों के भीतर देश की नई युवा पीढ़ी यानी जेन-Z के प्रति एक गहरा सांगठनिक विश्वास और भारत के महान संवैधानिक मूल्यों के प्रति सर्वोच्च सम्मान साफ तौर पर दिखाई देता है। बदलते समय के साथ देश की मुख्यधारा की राजनीति और इसके सामाजिक जीवन में नए-नए विचारों, अनूठे प्रयोगों और युवा आवाजों का खुलकर सामने आना एक पूरी तरह से स्वाभाविक और स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा माना जाता है।
अब आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प और महत्वपूर्ण होगा कि देश के पुराने व पारंपरिक राजनीतिक दल और हमारी स्थापित लोकतांत्रिक संस्थाएं इन उभरती हुई नई युवा आवाजों और उनकी अनूठी मांगों को अपने भीतर कितना समाहित कर पाती हैं और उन्हें कितनी कूटनीतिक जगह दे पाती हैं। बहरहाल, वर्तमान राजनीतिक उठापटक और वैचारिक टकराव के इस माहौल के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का यह नया आधिकारिक बयान पूरे देश को आपसी कूटनीतिक संतुलन, वैचारिक सहनशीलता और सकारात्मक संवाद की एक नई व सुरक्षित राह दिखाता है।
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