Mahabharat Facts: आखिर श्रीकृष्ण ने ही क्यों चुना था अर्जुन का सारथी बनना?

Mahabharat Facts: महाभारत युद्ध के 18वें दिन खुला अर्जुन के रथ का रहस्य; जानें क्यों निहत्थे रहकर भी सारथी बने थे भगवान श्रीकृष्ण।

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Mahabharat Facts: महाभारत के महासंग्राम में भगवान श्रीकृष्ण की भूमिका केवल एक मार्गदर्शक की नहीं थी, बल्कि वे साक्षात रक्षक बनकर अर्जुन के साथ खड़े थे। जब अर्जुन ने कौरव सेना के सामने अपने ही परिवार और गुरुजनों को देखा, तो उनका मन विचलित हो गया। लेकिन उस कठिन घड़ी में श्रीकृष्ण ने न केवल सारथी के रूप में रथ संभाला, बल्कि गीता का उपदेश देकर अर्जुन को धर्म के मार्ग पर वापस लाए। आखिर भगवान ने युद्ध में स्वयं शस्त्र न उठाने का संकल्प लेने के बाद अर्जुन का सारथी बनना क्यों स्वीकार किया? यह एक दिव्य रहस्य है।

महाभारत के इस महायुद्ध से पहले की एक बड़ी घटना को समझना जरूरी है। जब अर्जुन और दुर्योधन दोनों ही सहायता मांगने द्वारका पहुंचे, तो श्रीकृष्ण ने दो विकल्प रखे। एक ओर उनकी अभेद्य नारायणी सेना थी और दूसरी ओर वे स्वयं, जो युद्ध में अस्त्र नहीं उठाएंगे। अर्जुन ने निहत्थे श्रीकृष्ण को चुनना बेहतर समझा। वहीं दुर्योधन को लगा कि एक सेनापति के लिए सेना अधिक काम की है। दुर्योधन की इस सोच ने ही उसकी हार की नींव रख दी थी, क्योंकि वह उस शक्ति को नहीं देख पाया जो युद्ध के परिणाम को पलटने वाली थी।

Mahabharat Facts: सारथी क्यों बने थे भगवान?

महाभारत में सारथी का कार्य केवल रथ चलाना नहीं, बल्कि युद्ध के दौरान अर्जुन को मानसिक और शारीरिक रूप से सुरक्षित रखना था। जब अर्जुन युद्धभूमि में गांडीव छोड़कर बैठ गए थे, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें गीता के माध्यम से जीवन के सबसे गहरे दर्शन का ज्ञान दिया। एक सारथी के रूप में श्रीकृष्ण ने न केवल रथ को विपरीत दिशाओं में मोड़ा, बल्कि अर्जुन के मन के भटकाव को भी दूर किया। वे जानते थे कि अर्जुन एक महान धनुर्धर तो हैं, लेकिन उस समय उन्हें एक ऐसे मार्गदर्शक की जरूरत थी जो उन्हें मोह और भय से ऊपर उठा सके।

कर्ण की प्रशंसा और दिव्य लीला

युद्ध के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब कर्ण के प्रहार से अर्जुन का रथ कई कदम पीछे चला गया। तब श्रीकृष्ण ने कर्ण की वीरता की खुले मन से प्रशंसा की। अर्जुन को यह समझ नहीं आया कि वे क्यों कर्ण की तारीफ कर रहे हैं। तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि यह कोई सामान्य रथ नहीं है, जिस पर साक्षात नारायण और ध्वज पर स्वयं हनुमानजी विराजमान हैं। यदि कर्ण के बाणों से यह रथ पीछे खिसका है, तो इसका अर्थ है कि कर्ण में असामान्य शक्ति थी। यह घटना दिखाती है कि श्रीकृष्ण अर्जुन को अहंकार से बचाकर वास्तविकता से परिचित करवा रहे थे।

Mahabharat Facts: 18वें दिन खुला सबसे बड़ा रहस्य

महाभारत युद्ध के समापन पर एक ऐसी घटना घटी जिसने सभी को हैरान कर दिया। युद्ध खत्म होने के बाद श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि पहले वे रथ से उतरें। अर्जुन के नीचे उतरने के बाद स्वयं श्रीकृष्ण रथ से उतरे। जैसे ही भगवान रथ से अलग हुए, वह दिव्य रथ धू-धू करके जल उठा। अर्जुन इसे देखकर दंग रह गए।

तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि युद्ध के दौरान भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य और कर्ण के दिव्य अस्त्रों ने इस रथ को पहले ही नष्ट कर दिया था। यह रथ तो उनकी दिव्य उपस्थिति और संकल्प के कारण सुरक्षित दिखाई दे रहा था। यदि श्रीकृष्ण रथ पर नहीं होते, तो अर्जुन का अस्तित्व उसी समय मिट चुका होता। उस रथ का भस्म होना इस बात का प्रमाण था कि अर्जुन केवल अपनी योग्यता से नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण की कृपा से जीवित बचे थे।

Mahabharat Facts: सारथी नहीं, जीवन के रक्षक

यह घटना हमें सिखाती है कि श्रीकृष्ण केवल महाभारत के एक सारथी नहीं थे। उन्होंने हर पग पर अर्जुन की रक्षा की और यह सिद्ध किया कि जब जीवन की बागडोर ईश्वर के हाथों में होती है, तब कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती। अर्जुन के रथ का जलना इस बात का प्रतीक था कि ईश्वर की कृपा ही हमें हर बड़ी दुर्घटना और संकट से सुरक्षित निकालती है। यह अध्याय हमें याद दिलाता है कि यदि हम भी अपने जीवन का सारथी ईश्वर को मान लें, तो कठिन से कठिन लड़ाई भी जीतना संभव है।

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