Rabi Sowing 2026: रबी फसलों की बुवाई 26% घटी, सरसों और धान का रकबा कम; गेहूं पर नजर

16 अक्टूबर तक रबी फसलों की बुवाई घटी, सरसों और धान के रकबे में कमी; गेहूं की बुवाई बाकी।

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Rabi Sowing 2026: देश में रबी विपणन सत्र 2026-27 के लिए प्रमुख कृषि फसलों की बुवाई का नया चक्र औपचारिक रूप से प्रारंभ हो चुका है, किंतु शुरुआती सरकारी आंकड़े पिछले वर्ष की तुलना में बुवाई की गति काफी धीमी रहने का संकेत दे रहे हैं। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी 16 अक्टूबर 2026 तक के संकलित आंकड़ों के अनुसार, देशभर में अब तक कुल 3.43 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ही रबी फसलों की बुवाई संपन्न हो सकी है। पिछले वर्ष की इसी समान अवधि में यह रकबा 4.65 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया था, जिसका सीधा अर्थ है कि शुरुआती चरण में बुवाई के कुल क्षेत्रफल में लगभग 26.23 प्रतिशत की उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। मुख्य रूप से खाद्य तेल की रीढ़ मानी जाने वाली सरसों और तटीय क्षेत्रों के रबी धान के आच्छादन में भारी कमी देखी गई है, जबकि दलहन और पोषक मोटे अनाजों की शुरुआती बोआई में आंशिक सुधार के लक्षण मिले हैं। रबी सीजन की सबसे बड़ी फसल गेहूं की बोआई अभी तक उत्तर भारत के मैदानी भागों में जमीन पर नहीं उतरी है।

Rabi Sowing 2026: तापमान और मानसूनी नमी का प्रभाव

भारतीय कृषि कैलेंडर के अनुसार रबी फसलों की बुवाई का चक्र सामान्यतः अक्टूबर के मध्य से प्रारंभ होकर दिसंबर तक चलता है, जिसकी कटाई अगले वर्ष मार्च और अप्रैल माह के दौरान संपन्न की जाती है। गेहूं, सरसों, चना, मसूर, जौ और शीतकालीन मक्का इस संपूर्ण मौसम की आधारशिला माने जाते हैं। 16 अक्टूबर तक कई प्रमुख उत्पादक राज्यों में खरीफ फसलों—विशेषकर देर से पकने वाली धान, सोयाबीन और कपास—की कटाई और खेतों की जुताई का काम ही चल रहा था, जिसके कारण किसानों को रबी बुवाई के लिए पर्याप्त खाली खेत देर से उपलब्ध हो पा रहे हैं।

इसके अतिरिक्त, देश के कई हिस्सों में मानसून की विदाई के अंतिम दिनों में हुई अनियमित वर्षा और कुछ कृषि पट्टियों में मिट्टी की ऊपरी सतह पर आवश्यक नमी का असंतुलन भी बुवाई में देरी का कारण बना है। नहरों और जलाशयों में सिंचाई जल की उपलब्धता के साथ-साथ दिन के तापमान में अभी भी अपेक्षित ठंडक न आना किसानों को बुवाई की तारीख आगे बढ़ाने के लिए बाध्य कर रहा है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रारंभिक आंकड़ों के आधार पर पूरे सत्र के उत्पादन पर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी, क्योंकि मौसम का पारा गिरते ही बुवाई की गति में तेजी आना पूरी तरह स्वाभाविक है।

सरसों और तिलहन के रकबे में बड़ी कमी: खाद्य तेल उत्पादन पर नजर

रबी सीजन के आरंभिक चरण में सबसे चिंताजनक गिरावट तिलहन फसलों के वर्ग में दर्ज की गई है, जो घरेलू खाद्य तेल आत्मनिर्भरता के दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील मानी जाती है। मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 16 अक्टूबर तक कुल तिलहन फसलों का क्षेत्रफल 2.29 लाख हेक्टेयर ही दर्ज किया गया, जबकि बीते वर्ष इसी अवधि तक 3.11 लाख हेक्टेयर भूमि पर तिलहन की बुवाई पूरी हो चुकी थी। तिलहन के कुल रकबे में आई इस गिरावट का सबसे बड़ा भार सरसों और तोरिया फसलों पर पड़ा है।

रेपसीड और सरसों की बुवाई इस वर्ष शुरुआती अवधि में घटकर 2.26 लाख हेक्टेयर रह गई है, जो पिछले साल की समान अवधि के 3.10 लाख हेक्टेयर की तुलना में लगभग सत्ताईस प्रतिशत से अधिक कम है। राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश देश के सबसे बड़े सरसों उत्पादक राज्य हैं, जहां किसान वर्तमान में पछेती खरीफ फसलों की मड़ाई पूरी कर रहे हैं। हालांकि शुरुआती सुस्ती देखी जा रही है, किंतु कृषि विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले दो हफ्तों के भीतर जैसे ही रात का तापमान बीस डिग्री सेल्सियस से नीचे स्थिर होगा, वैसे ही सरसों उत्पादक बेल्ट में बुवाई चरम पर पहुंच जाएगी।

रबी धान के रकबे में 34.4% की गिरावट: दक्षिणी राज्यों में धीमी शुरुआत

शीतकालीन अथवा रबी धान के बुवाई आंकड़ों में भी इस वर्ष भारी संकुचन देखने को मिला है। 16 अक्टूबर 2026 तक देश में रबी धान का कुल रकबा मात्र 0.88 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया, जबकि पिछले वर्ष इसी समयावधि तक 1.34 लाख हेक्टेयर में धान की रोपाई व बुवाई पूरी हो चुकी थी। इस प्रकार रबी धान के शुरुआती क्षेत्रफल में 34.4 प्रतिशत की तीव्र गिरावट आई है।

प्रारंभिक चरण में रबी धान की बुवाई मुख्य रूप से दक्षिणी राज्यों जैसे केरल और तमिलनाडु के कुछ चुनिंदा सिंचित क्षेत्रों में शुरू होती है। चूंकि पूर्वोत्तर मानसून की सक्रियता और जलाशयों में जल संचयन की अंतिम स्थिति अभी आकार ले रही है, इसलिए दक्षिणी राज्यों के किसान जल स्तर की पूरी समीक्षा करने के बाद ही बड़े पैमाने पर नर्सरी और रोपाई का काम शुरू कर रहे हैं। आने वाले दिनों में जब आंध्र प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे बड़े तटीय राज्यों में रबी धान की प्रक्रिया शुरू होगी, तब इसके वास्तविक राष्ट्रीय रकबे का सही आकलन संभव हो सकेगा।

दलहन और श्री अन्न की बुवाई में दिखा सकारात्मक रुझान

तिलहन और धान के विपरीत, दलहन और मोटे अनाजों के शुरुआती आंकड़ों ने सकारात्मक और उत्साहवर्धक संकेत दिए हैं। दलहनी फसलों का कुल रकबा 16 अक्टूबर तक 0.15 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि के 0.10 लाख हेक्टेयर की तुलना में लगभग पचास प्रतिशत अधिक है। दलहन की प्रमुख फसल चने की बुवाई मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र के कुछ अंचलों में समय से पहले शुरू हो गई है।

सरकार के मिलेट्स प्रोत्साहन अभियान के अनुरूप श्री अन्न और मोटे अनाजों के बुवाई क्षेत्र में भी मामूली बढ़त दर्ज हुई है। यह रकबा 0.105 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया है, जो पिछले साल के 0.10 लाख हेक्टेयर से थोड़ा बेहतर है। इसमें शीतकालीन मक्का और ज्वार की बुवाई शामिल है। इसके साथ ही रबी मूंगफली के रकबे में भी पिछले वर्ष के मुकाबले हल्का विस्तार दर्ज किया गया है, यद्यपि इसका कुल राष्ट्रीय क्षेत्रफल अभी शुरुआती स्तरों में काफी सीमित है।

गेहूं की बुवाई कब पकड़ेगी रफ्तार? 17.77 करोड़ टन के उत्पादन लक्ष्य की चुनौती

रबी खाद्यान्न सुरक्षा का सबसे प्रमुख आधारस्तंभ गेहूं है, जिसका सामान्य अखिल भारतीय रबी क्षेत्र लगभग 315.24 लाख हेक्टेयर के विशाल दायरे में फैला हुआ है। कृषि मंत्रालय के बुलेटिन के अनुसार, 16 अक्टूबर तक देश में गेहूं की बुवाई का खाता अभी आधिकारिक तौर पर नहीं खुला था। उत्तर भारत के पारंपरिक गेहूं बेल्ट—पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान—में गेहूं की बुवाई आमतौर पर अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से जोर पकड़ती है और 15 नवंबर के आसपास अपनी चरम गति पर होती है।

केंद्र सरकार ने कृषि वर्ष 2026-27 के लिए रबी खाद्यान्न उत्पादन का महत्वाकांक्षी लक्ष्य 17.772 करोड़ टन निर्धारित किया है। इस वृहद लक्ष्य को हासिल करने के लिए आवश्यक है कि गेहूं का रकबा सामान्य स्तर से ऊपर रहे और बुवाई का समय अनुकूल बना रहे। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान में खेतों से नमी का तेजी से सूखना और दिन के समय असामान्य रूप से खिली तेज धूप के कारण किसान गेहूं के बीज डालने में जल्दबाजी नहीं कर रहे हैं, क्योंकि अत्यधिक गर्मी अंकुरण और कल्ले फूटने की प्रारंभिक अवस्था को प्रभावित कर सकती है।

Rabi Sowing 2026: कमोडिटी बाजार और किसानों की आय पर प्रभाव

रबी फसलों की शुरुआती बुवाई के ये आंकड़े जिंस बाजारों, थोक मंडियों और कृषि आधारित उद्योगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। तिलहन और सरसों के रकबे में दिख रही शुरुआती गिरावट ने मंडियों में सरसों के हाजिर भावों को आंशिक समर्थन दिया है। यदि आगामी पखवाड़े में सरसों की बुवाई सामान्य स्तर पर नहीं लौटती है, तो इसका असर भविष्य में वनस्पति तेलों के आयात और घरेलू रिफाइनरी लागत पर पड़ सकता है।

किसानों के लिए यह आवश्यक है कि वे प्रमाणित बीजों का ही प्रयोग करें और बुवाई से पूर्व बीजोपचार अनिवार्य रूप से करें ताकि प्रारंभिक रोगों से फसल को बचाया जा सके। कृषि मंत्रालय और राज्य सरकारों के विस्तार अधिकारी निरंतर फील्ड विजिट कर रहे हैं और उर्वरकों—विशेष रूप से डीएपी और एनपीके—की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने में जुटे हैं ताकि जैसे ही बुवाई का मुख्य दौर शुरू हो, किसानों को किसी भी प्रकार की तकनीकी या लॉजिस्टिक बाधा का सामना न करना पड़े।

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