पीओके में जनाक्रोश चरम पर: 9 जून को पूर्ण बंद और लॉन्ग मार्च का आह्वान, जेएएसी ने पाकिस्तान सरकार को दी कड़ी चेतावनी
महंगाई, बिजली संकट और राजनीतिक उपेक्षा के खिलाफ जेएएसी का बड़ा आंदोलन, सांसदों पर निशाना
POK Protest: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में एक बार फिर जनाक्रोश की लहर तीव्रता से उठ रही है। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने 9 जून 2026 को पूरे क्षेत्र में चक्का जाम, पूर्ण बाजार बंद और बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन का कड़ा आह्वान किया है। समिति ने पाकिस्तान सरकार और स्थानीय प्रशासन को दो टूक चेतावनी दी है कि यदि 31 मई तक उनकी लंबित मांगें नहीं मानी गईं, तो यह आंदोलन पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख देगा। बढ़ती महंगाई, अभूतपूर्व बिजली संकट, राजनीतिक उपेक्षा और प्रशासनिक दमन के खिलाफ स्थानीय नागरिकों में उपजा यह गुस्सा अब चरम पर पहुँच गया है। यह आंदोलन केवल एक स्थानीय विरोध नहीं रह गया है, बल्कि यह पाकिस्तान की दशकों पुरानी उपेक्षापूर्ण नीतियों के खिलाफ पीओके की जनता की सामूहिक आवाज बनकर उभरा है।
POK Protest: जेएएसी का कड़ा रुख और मांगों का विस्तृत मसौदा
जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी के शीर्ष नेतृत्व ने मुजफ्फराबाद में एक महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर आगामी 9 जून के शटडाउन और प्रस्तावित लॉन्ग मार्च की तैयारियों की विस्तृत जानकारी साझा की। समिति के अनुसार, पाकिस्तान सरकार और पीओके प्रशासन ने पिछले कई वर्षों में जनता से अनगिनत वादे किए, लेकिन धरातल पर एक भी वादा पूरा नहीं किया गया। मुख्य मांगों में मौलिक संवैधानिक सुधार, चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना, 12 प्रवासी सीटों के विवादास्पद कोटे को समाप्त करना, निरंतर बिजली संकट का स्थायी समाधान और अनियंत्रित महंगाई पर तत्काल काबू पाना शामिल है। समिति के नेताओं ने आरोप लगाया है कि सरकार केवल बातचीत का दिखावा कर समय बर्बाद कर रही है ताकि जनता के आक्रोश और आंदोलन की गति को मंद किया जा सके।
मानवाधिकार कार्यकर्ता अमजद अयूब मिर्जा ने इस स्थिति पर प्रकाश डालते हुए बताया कि पिछले दो वर्षों में सरकार के साथ वार्ता के कई दौर चले, लेकिन हर बार जनता को केवल निराशा ही हाथ लगी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब लोगों के धैर्य की सीमा समाप्त हो चुकी है और 9 जून को मुजफ्फराबाद सहित पूरे क्षेत्र में अभूतपूर्व विरोध देखने को मिलेगा।
POK Protest: बुनियादी सुविधाओं का अभाव और जनता की पीड़ा
पीओके की जनता लंबे समय से सम्मानजनक जीवन और बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही है। वर्तमान में पूरा क्षेत्र भयंकर बिजली संकट की चपेट में है, जहाँ असीमित लोड शेडिंग ने आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। शिक्षा के क्षेत्र में भी स्थिति चिंताजनक है; स्कूलों की फीस में बेतहाशा बढ़ोतरी के कारण गरीब परिवारों के बच्चे शिक्षा से वंचित होने की कगार पर हैं। आर्थिक मोर्चे पर भी महंगाई ने आम नागरिक की कमर तोड़ दी है। उदाहरण के तौर पर, जिस गैस सिलेंडर की कीमत पहले लगभग 2500 रुपये थी, वह अब बढ़कर 6000 रुपये तक पहुँच गई है।
इन भौतिक समस्याओं के साथ-साथ राजनीतिक प्रतिनिधित्व का अभाव भी एक गंभीर मुद्दा बना हुआ है। 12 प्रवासी सीटों पर निर्वाचित होने वाले कई प्रतिनिधि वास्तव में पीओके में निवास तक नहीं करते और केवल चुनावी लाभ के लिए सक्रिय होते हैं। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी का पुरजोर तर्क है कि इन सीटों को तत्काल समाप्त किया जाना चाहिए ताकि स्थानीय लोगों को वास्तविक प्रतिनिधित्व मिल सके। इन सभी कारकों ने मिलकर क्षेत्र की नई पीढ़ी, विशेषकर जेन-जी (Gen-Z) में पाकिस्तान के विरुद्ध तीव्र आक्रोश भर दिया है।
POK Protest: प्रशासनिक दमन की आशंका औरcolonial व्यवहार
समिति के नेताओं ने पाकिस्तान सरकार पर आरोप लगाया है कि वह पीओके के साथ एक उपनिवेश (Colony) जैसा व्यवहार करती है। शहबाज शरीफ सरकार पर वादाखिलाफी के गंभीर आरोप लग रहे हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस्लामाबाद में सत्ता परिवर्तन या मुजफ्फराबाद में प्रधानमंत्री बदलने से उनकी समस्याओं का समाधान नहीं होने वाला, क्योंकि व्यवस्था की मूल नीति ही दोषपूर्ण है। मानवाधिकार संगठनों ने आशंका जताई है कि पूर्व के आंदोलनों की तरह इस बार भी पाकिस्तानी प्रशासन सैन्य बल का उपयोग कर इस शांतिपूर्ण प्रदर्शन को कुचलने का प्रयास कर सकता है। अतीत में हुए हिंसक दमन में कई स्थानीय लोग अपनी जान गँवा चुके हैं, जिससे स्थिति अब ‘लाशों के बदले अधिकार’ की माँग तक पहुँच गई है।
POK Protest: आर्थिक बदहाली और अंतरराष्ट्रीय समुदाय का नजरिया
पाकिस्तान की डगमगाती राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का सबसे बुरा प्रभाव पीओके पर पड़ा है। संसाधनों की भारी कमी, बेरोजगारी और मुद्रास्फीति ने यहाँ के नागरिकों को हताशा के कगार पर धकेल दिया है। पाकिस्तान इस क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों, विशेषकर जल और बिजली संसाधनों का भरपूर दोहन करता है, लेकिन इसका लाभ स्थानीय जनता को नहीं मिलता। भारत सरकार ने हमेशा से पीओके को अपना अभिन्न अंग माना है और वहाँ हो रहे मानवाधिकार उल्लंघन की वैश्विक मंचों पर निंदा की है। वर्तमान आंदोलन यह दर्शाता है कि पीओके की जनता अब पाकिस्तानी शासन की नीतियों से पूरी तरह तंग आ चुकी है और अपनी नियति का फैसला स्वयं करना चाहती है।
निष्कर्ष: 9 जून का ऐतिहासिक महत्व
आगामी 9 जून का प्रस्तावित बंद न केवल पीओके के जनजीवन को प्रभावित करेगा, बल्कि यह पाकिस्तान सरकार के लिए एक गंभीर रणनीतिक चुनौती भी पेश करेगा। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी का यह आह्वान केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि दशकों से दबे हुए जन-आक्रोश का विस्फोट है। यदि पाकिस्तान सरकार ने इस बार भी उपेक्षा या दमन का रास्ता अपनाया, तो स्थिति को संभालना उसके नियंत्रण से बाहर हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन और भारत सहित विश्व के कई देश इस तनावपूर्ण स्थिति पर पैनी नजर रखे हुए हैं। पीओके की जनता अब शांति, वास्तविक विकास और आत्मसम्मान की माँग कर रही है, जिसे अधिक समय तक दबा पाना मुमकिन नहीं दिखता।
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