Palamu News: पलामू में नई रोजगार योजना की सुस्त शुरुआत, कागजों पर बढ़ी मजदूरी लेकिन धरातल पर काम का टोटा

Palamu News: पलामू में नई रोजगार योजना की सुस्त शुरुआत, कागजों पर बढ़ी मजदूरी लेकिन धरातल पर काम का टोटा

0

Palamu News: केंद्र सरकार ने मनरेगा की जगह जब विकसित भारत गारंटी रोजगार आजीविका मिशन यानी वीबीजी रामजी योजना शुरू की, तो ग्रामीण इलाकों में उम्मीद की एक नई किरण जगी थी। सरकार ने न सिर्फ दैनिक मजदूरी 282 रुपये से बढ़ाकर 300 रुपये की, बल्कि रोजगार की अवधि भी 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन कर दी। लेकिन पलामू में इस योजना के लागू होने के पहले सात दिन बेहद मायूस करने वाले रहे हैं। जिले के 2.46 लाख सक्रिय मजदूर आज भी काम की तलाश में भटक रहे हैं। आंकड़ों की मानें तो पिछले एक हफ्ते में जिले की 265 पंचायतों में कुल मिलाकर केवल 750 मानव दिवस का ही काम मिल पाया है, जो सरकारी दावों की हवा निकालने के लिए काफी है।

Palamu News: पहले दिन ही नहीं मिला किसी को काम

जुलाई के पहले हफ्ते में जब यह योजना पलामू में धरातल पर उतरी, तो स्थिति काफी चिंताजनक दिखी। एक जुलाई से सात जुलाई तक के आंकड़ों को अगर बारीकी से देखें, तो पता चलता है कि योजना के पहले दिन जिले में एक भी मजदूर को रोजगार नसीब नहीं हुआ। प्रशासन की ओर से दावा किया गया था कि नई व्यवस्था में काम का सृजन तेजी से होगा, लेकिन जमीन पर हकीकत बिल्कुल उलट नजर आई। दूसरे दिन मोहम्मदगंज प्रखंड में मामूली काम शुरू हुआ और धीरे धीरे कुछ अन्य प्रखंडों में भी गिनती के मजदूरों को काम पर रखा गया।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक तीन जुलाई को हरिहरगंज, मोहम्मदगंज, पांकी और सतबरवा में कुल मिलाकर कुछ ही मजदूर काम कर पाए। चार जुलाई को यह संख्या कुछ बढ़ी और हैदरनगर से लेकर पांकी तक काम का वितरण हुआ। कुल मिलाकर सात दिनों की मची आपाधापी के बाद भी पलामू जैसे बड़े जिले में केवल 750 मानव दिवस का काम सृजित हो पाया। सवाल यह उठता है कि जिस जिले में लाखों मजदूर पंजीकृत हैं, वहां इतनी कम संख्या में काम क्यों मिल रहा है।

मजदूरी और दिनों की बढ़ोतरी के बीच उलझा गणित

नई योजना के आने के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में चर्चा थी कि अब उन्हें बेहतर मजदूरी मिलेगी। अब झारखंड में मजदूरी 300 रुपये प्रतिदिन तय की गई है। सरकार का कहना है कि वीबीजी रामजी योजना के तहत बागवानी, कूप निर्माण, तालाब खुदाई, डोभा, बाउंड्री वॉल और प्रधानमंत्री तथा मुख्यमंत्री आवास निर्माण जैसे कार्यों को प्राथमिकता दी जाएगी। लेकिन इन सबके बावजूद काम की गति पर प्रशासनिक स्तर पर सुस्ती साफ देखी जा रही है।

पलामू जिले में लगभग 4.65 लाख जॉब कार्डधारी परिवार हैं। इनमें से 2.46 लाख मजदूर ऐसे हैं जो सक्रिय तौर पर काम की मांग करते हैं। जब हम इतनी बड़ी संख्या की तुलना उपलब्ध 750 मानव दिवस के काम से करते हैं, तो साफ पता चलता है कि सरकार का लक्ष्य अभी भी कोसों दूर है। प्रशासन की ओर से अबुआ आवास और प्रधानमंत्री आवास निर्माण कार्यों को ही मुख्य आधार बनाकर मास्टर रोल जारी किए जा रहे हैं। बाकी क्षेत्रों में काम अभी भी कछुआ चाल से चल रहा है।

Palamu News: प्रशासन और मजदूरों के बीच का फासला

पलामू के विभिन्न प्रखंडों में जब हमने पड़ताल की, तो पता चला कि ज्यादातर मजदूर अब भी इस बात से अनजान हैं कि उन्हें काम के लिए कहाँ आवेदन करना है या पिछली योजना और नई योजना में क्या मुख्य अंतर है। स्थानीय स्तर पर रोजगार सेवकों और पंचायत प्रतिनिधियों के बीच तालमेल की कमी भी एक बड़ा कारण है। एक तरफ जहाँ प्रशासन कागजी औपचारिकताएं पूरी करने में जुटा है, वहीं दूसरी तरफ गांव का गरीब मजदूर चिलचिलाती धूप में अपने हक के काम का इंतजार कर रहा है।

सतबरवा और पांकी जैसे इलाकों में कई मजदूरों ने बताया कि उन्हें उम्मीद थी कि नई योजना के तहत उन्हें अपने गांव में ही रोजगार मिल जाएगा, लेकिन अभी तक उन्हें कोई सूचना नहीं मिली है। कई लोग तो ऐसे हैं जो शहरों की ओर पलायन करने का मन बना चुके हैं क्योंकि उन्हें लग रहा है कि सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने से बेहतर है कि कहीं बाहर मजदूरी कर ली जाए। यह स्थिति उस समय और भी विकट हो जाती है जब सरकार खुद रोजगार देने का बड़ा वादा कर रही हो।

Palamu News: अब आगे क्या होगा?

विकसित भारत गारंटी रोजगार आजीविका मिशन का मुख्य उद्देश्य ही ग्रामीण भारत की आर्थिक स्थिति को मजबूती देना था। लेकिन पलामू में शुरुआती दौर की विफलता ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रशासन को अब यह तय करना होगा कि वह मास्टर रोल की प्रक्रिया को सरल बनाए और काम की मांग करने वाले हर परिवार तक इसकी जानकारी पहुँचे। केवल आवास निर्माण पर फोकस करने से रोजगार की समस्या हल नहीं होने वाली है, क्योंकि हर मजदूर राजमिस्त्री या निर्माण कार्य का जानकार नहीं होता।

आने वाले दिनों में यदि मजदूरों को काम नहीं मिला, तो जिले में असंतोष बढ़ सकता है। जिला प्रशासन के अधिकारियों को जल्द ही ब्लॉक स्तर पर समीक्षा बैठक कर उन बाधाओं को दूर करना होगा जो काम के सृजन में रोड़ा बनी हुई हैं। योजना का लाभ तब तक बेमानी है जब तक मजदूर को उसका हक न मिल जाए। 125 दिनों का रोजगार तब ही सफल माना जाएगा जब वह कागजों से निकलकर पलामू के हर उस मजदूर के हाथ तक पहुँचे जिसे वास्तव में उसकी जरूरत है। उम्मीद है कि प्रशासन इस सुस्त शुरुआत से सबक लेगा और आने वाले हफ्तों में रोजगार की गति को रफ्तार देगा ताकि ग्रामीण इलाकों में आर्थिक सक्रियता बढ़ सके।

Read More Here:- 

आपको यह भी पसंद आ सकता है
Leave A Reply

Your email address will not be published.