NCPCR Summons Meta India: बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा पर Meta के MD और Head फिर तलब

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा मामले में Meta के शीर्ष अधिकारियों को व्यक्तिगत पेशी का आदेश

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NCPCR Summons Meta India: इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बच्चों की सुरक्षा और डिजिटल शोषण की रोकथाम को लेकर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने कड़ा रुख अख्तियार किया है। मेटा (Meta) के स्वामित्व वाले प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम (Instagram) पर बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार सामग्री (Child Sexual Exploitative and Abuse Material – CSEAM) से जुड़े कथित विज्ञापनों के मामले में आयोग ने मेटा इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर और इंडिया हेड को एक बार फिर तलब किया है। शीर्ष बाल अधिकार संस्था ने दोनों वरिष्ठ अधिकारियों को 16 सितंबर 2026 को होने वाली औपचारिक सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का कड़ा निर्देश जारी किया है।

यह नया समन 9 सितंबर को हुई पूर्ववर्ती सुनवाई के बाद जारी किया गया है, जहां मेटा इंडिया के शीर्ष प्रमुख व्यक्तिगत रूप से पेश नहीं हुए थे और उनकी जगह कंपनी के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने प्रतिनिधित्व किया था। आयोग ने कंपनी द्वारा दिए गए स्पष्टीकरणों की समीक्षा के बाद यह साफ कर दिया है कि बाल सुरक्षा के गंभीर संवेदनशील मामलों में किसी भी प्रकार की शिथिलता स्वीकार नहीं की जाएगी और कंपनी के सर्वोच्च नेतृत्व को सीधे तौर पर जवाबदेह ठहराया जाएगा।

NCPCR Summons Meta India: बीबीसी आई की खोजी रिपोर्ट से शुरू हुआ विवाद

इस पूरे मामले की जड़ें जुलाई 2026 में सामने आई बीबीसी आई (BBC Eye) की एक खोजी रिपोर्ट से जुड़ी हैं। उस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि इंस्टाग्राम पर ऐसे संदिग्ध विज्ञापन प्रदर्शित हो रहे थे जो उपयोगकर्ताओं को बाल यौन शोषण और आपत्तिजनक कंटेंट से जुड़े अवैध नेटवर्क्स तक पहुंचाने का जरिया बन रहे थे। इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होते ही देश भर में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर आक्रोश फैल गया था।

एनसीपीसीआर ने रिपोर्ट पर त्वरित संज्ञान लेते हुए 3 जुलाई 2026 को मेटा प्लेटफॉर्म्स को पहला औपचारिक कारण बताओ नोटिस जारी किया था। लगभग एक सप्ताह बाद मेटा की ओर से आयोग को प्राथमिक उत्तर सौंपा गया, किंतु आयोग उस तकनीकी स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हुआ। इसके बाद मामले की सत्यता, एल्गोरिदम की भूमिका और विज्ञापनों की मंजूरी प्रणाली की तह तक जाने के लिए आयोग ने विस्तृत औपचारिक जांच (Formal Inquiry) शुरू करने का निर्णय लिया।

9 सितंबर की गैर-हाजिरी पर आयोग की सख्ती, व्यक्तिगत पेशी का आदेश

औपचारिक जांच के अंतर्गत आयोग ने मेटा इंडिया के शीर्ष नेतृत्व को 9 सितंबर को पेश होने का आदेश दिया था। उस दिन कंपनी के प्रबंध निदेशक व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हुए और मेटा के अधिकारियों ने उनके न आने के पीछे कुछ अपरिहार्य व्यस्तताओं का हवाला दिया था।

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति में हुई उस बैठक के बाद आयोग ने सख्त रुख अपनाते हुए 16 सितंबर की तारीख मुकर्रर की। आयोग का स्पष्ट मत है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर विज्ञापनों का अप्रूवल सिस्टम किस प्रकार काम करता है और बच्चों से जुड़े आपत्तिजनक विज्ञापनों को रोकने में विफलता क्यों हुई, इसका तकनीकी व प्रशासनिक जवाब केवल शीर्ष प्रबंधन ही आधिकारिक तौर पर दे सकता है।

दबाव के बाद मेटा की रिपोर्टिंग नीति में बदलाव: अब सीधे I4C को जाएगी जानकारी

एनसीपीसीआर की निरंतर सख्ती और भारत सरकार के कड़े रुख का असर अब मेटा की आंतरिक नीतियों में भी दिखाई देने लगा है। मेटा ने घोषणा की है कि वह भारत में बाल शोषण से संबंधित संदिग्ध मामलों की रिपोर्टिंग के लिए अपनी व्यवस्था में बुनियादी सुधार कर रहा है। इसके तहत कंपनी अब भारत से जुड़े ऐसे सभी मामलों की जानकारी सीधे गृह मंत्रालय के अधीन कार्यरत इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) के साइबरक्राइम पोर्टल को प्रेषित करेगी।

अब तक मेटा ऐसे सभी संदिग्ध मामलों की सूचना अमेरिका स्थित गैर-लाभकारी संगठन ‘नेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एंड एक्सप्लॉइटेड चिल्ड्रन’ (NCMEC) को देती थी। इसके बाद एनसीएमईसी उन रिपोर्ट्स को भारतीय एजेंसियों को अग्रेषित करता था, जिससे सूचना मिलने और कार्रवाई शुरू होने में काफी समय लग जाता था। अब सीधे I4C को रिपोर्टिंग शुरू होने से भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों को रीयल-टाइम में इनपुट प्राप्त होंगे, जिससे बाल शोषण के दोषियों पर तुरंत कानूनी शिकंजा कसा जा सकेगा।

सरकारी एजेंसियों की कड़ी निगरानी: बाल सुरक्षा से कोई समझौता नहीं

मेटा के विज्ञापनों से जुड़े इस विवाद में केवल एनसीपीसीआर ही नहीं, बल्कि भारत सरकार के अन्य नियामक निकाय भी सक्रिय हो गए हैं। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियमों के तहत मेटा से उसके कंटेंट मॉडरेशन और एआई-आधारित फिल्टरिंग सिस्टम पर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) भी इस मामले से जुड़ी कानूनी और मानवाधिकार संबंधी प्रक्रियाओं पर अपनी नजर बनाए हुए है।

सरकारी सूत्रों ने स्पष्ट किया है कि भारत में संचालित होने वाले किसी भी सोशल मीडिया मध्यवर्ती (Intermediary) के लिए बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा एक बुनियादी और गैर-परक्राम्य (Non-negotiable) सिद्धांत है। यदि कोई प्लेटफॉर्म अपने सर्वर और विज्ञापनों के जरिए यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) कानून या आईटी एक्ट का उल्लंघन करता पाया जाता है, तो उसे कानूनी संरक्षण (Safe Harbour Protection) से वंचित भी किया जा सकता है।

कैपजेमिनी के उपाध्यक्ष भी तलब: डे-केयर सेंटर में बच्चों से बदसलूकी का मामला

एनसीपीसीआर ने बच्चों की संस्थागत सुरक्षा से जुड़े एक अन्य गंभीर मामले में वैश्विक आईटी सेवा कंपनी कैपजेमिनी (Capgemini) के उपाध्यक्ष को भी 16 सितंबर को ही आयोग के समक्ष तलब किया है। यह मामला कर्नाटक के बेंगलुरु में कंपनी द्वारा संचालित एक कॉर्पोरेट डे-केयर सेंटर में बच्चों के साथ हुए कथित शारीरिक व मानसिक दुर्व्यवहार से जुड़ा हुआ है।

आयोग 16 सितंबर की सुनवाई में कंपनी प्रबंधन की भूमिका, डे-केयर सेंटर के सुरक्षा मानकों, सीसीटीवी निगरानी और बच्चों की देखभाल करने वाले कर्मचारियों के पुलिस सत्यापन की स्थिति की गहराई से पड़ताल करेगा। एक ही दिन एक वैश्विक तकनीकी प्लेटफॉर्म (मेटा) और एक प्रमुख आईटी नियोक्ता (कैपजेमिनी) को तलब कर एनसीपीसीआर ने स्पष्ट कर दिया है कि वह कॉरपोरेट स्तर पर बच्चों के अधिकारों और सुरक्षा की जवाबदेही को लेकर कोई ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है।

NCPCR Summons Meta India: निष्कर्ष

डिजिटल युग में सोशल मीडिया और कॉरपोरेट परिसरों में बच्चों की सुरक्षा एक संवेदनशील राष्ट्रीय चुनौती बन चुकी है। 16 सितंबर को मेटा इंडिया के शीर्ष अधिकारियों की एनसीपीसीआर के समक्ष होने वाली पेशी यह निर्धारित करेगी कि सोशल मीडिया कंपनियां अपने विज्ञापनों और एल्गोरिदम को बाल शोषण से मुक्त रखने के लिए क्या ठोस कदम उठा रही हैं। हालांकि सीधे I4C को रिपोर्टिंग शुरू करने का मेटा का कदम एक सकारात्मक शुरुआत है, किंतु आयोग की अंतिम जांच रिपोर्ट और तकनीकी ऑडिट ही यह तय करेंगे कि प्लेटफॉर्म्स के सुरक्षा कवच में कहां कमियां थीं और भविष्य में बच्चों को डिजिटल दुनिया के खतरों से सुरक्षित रखने के लिए क्या कानूनी बाध्यताएं लागू की जानी चाहिए।

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