Lord Krishna: खाने से ज्यादा जमीन पर क्यों बिखेरते थे श्रीकृष्ण? जानिए इस नटखट आदत के पीछे का दिव्य रहस्य

Lord Krishna: जमीन पर क्यों बिखेरते थे माखन?

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Lord Krishna: सनातन धर्म में भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की लीलाएं हर भक्त के दिल को आनंद और असीम प्रेम से भर देती हैं। द्वापरयुग में गोकुल और वृंदावन की गलियों में कान्हा ने जो नटखट हरकतें की थीं, वे केवल मनोरंजन नहीं थीं, बल्कि उनके पीछे गहरे आध्यात्मिक और कूटनीतिक रहस्य छिपे हुए थे। इन्हीं कथाओं में से एक है उनकी ‘माखन चोरी लीला’। अक्सर लोग सोचते हैं कि कान्हा केवल अपनी भूख मिटाने या स्वाद के लिए माखन चुराते थे, लेकिन वे खुद खाने और दोस्तों को खिलाने से ज्यादा माखन जमीन पर बिखेर देते थे।

Lord Krishna: कैसे शुरू हुई माखन चोरी?

माता यशोदा के लल्ला यानी नन्हे कान्हा को माखन से अगाध प्रेम था। गोकुल की गोपियां बाल-कृष्ण की नटखट हरकतों से भली-भांति वाकिफ थीं, इसलिए वे अपने घरों का ताजा माखन बचाने के लिए उसे ऊंचे-ऊंचे छींकों (छत से टांगे जाने वाले बर्तनों) पर लटका कर रखती थीं।

लेकिन कान्हा को भला कौन रोक सकता था! वे अपने ग्वाल-बाल मित्रों की एक मजबूत टोली बनाते थे। सभी दोस्त एक-दूसरे के ऊपर खड़े होकर एक इंसानी सीढ़ी तैयार करते थे और नन्हे कान्हा सबसे ऊपर चढ़कर मटकी तक पहुंच जाते थे। इसी अनोखे अंदाज के कारण ही वे पूरे संसार में ‘माखन चोर’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।

खाने से ज्यादा जमीन पर क्यों गिराते थे माखन? त्रेतायुग से जुड़ा है इसका तार

श्रीकृष्ण जब भी किसी गोपी के घर में माखन की मटकी फोड़ते थे, तो उनका मकसद सिर्फ खुद तृप्त होना नहीं होता था। वे खुद भी थोड़ा माखन खाते, अपने सखाओं को भी पेट भरकर खिलाते और फिर बचा हुआ बहुत सारा माखन जानबूझकर जमीन पर बिखेर देते थे।

कान्हा द्वारा माखन जमीन पर गिराने की मुख्य वजह वहां आसपास इंतजार कर रहे बंदरों और वानरों की फौज थी। आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार, गोकुल के ये बंदर कोई साधारण जीव नहीं थे। ये त्रेतायुग के वही वानर थे, जिन्होंने ‘श्री राम’ के रूप में अवतरित हुए प्रभु की लंका विजय और माता सीता की खोज में निस्वार्थ सेवा की थी।

त्रेतायुग में प्रभु श्री राम ने मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में उन वानरों की निस्वार्थ भक्ति को देखा था। द्वापरयुग में जब भगवान ने श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लिया, तो वे अपने उन परम भक्तों का पुराना ऋण (कर्ज) चुकाना चाहते थे। बंदरों को अपनी दिव्य बाल-लीला का परम सुख देने और उन्हें सबसे प्रिय माखन खिलाकर तृप्त करने के लिए ही कान्हा माखन को जमीन पर बिखेर देते थे। यह लीला प्रभु के अपने भक्तों के प्रति गहरे प्रेम, करुणा और कृतज्ञता की जीती-जागती मिसाल है।

जब कन्हैया के छोटे से मुख में माता यशोदा को दिखा पूरा ब्रह्मांड

श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं की चर्चा तब तक अधूरी है, जब तक उनके मिट्टी खाने वाले प्रसंग को याद न किया जाए। एक दिन कन्हैया अपने घर के आंगन में खेलते-खेलते मिट्टी चबा रहे थे। तभी माता यशोदा की नजर उन पर पड़ गई और उन्होंने गुस्से में आकर कान्हा को डांटा और मुंह खोलने को कहा।

नन्हे कान्हा ने जैसे ही डरते-डरते अपना छोटा सा मुंह खोला, माता यशोदा के होश उड़ गए। बाल-कृष्ण के मुख के भीतर उन्हें कोई मिट्टी नहीं, बल्कि पूरी सृष्टि का नजारा दिख रहा था। उसमें सारे ग्रह, नक्षत्र, नदियां, बड़े-बड़े पर्वत, समुद्र और खुद पूरा गोकुल गांव घूमता हुआ दिखाई दे रहा था। इस अलौकिक दृश्य ने यशोदा मैया को यह अहसास करा दिया कि उनका लाडला कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं चराचर ब्रह्मांड का स्वामी है।

Lord Krishna: ओखली से बंधकर जब उखाड़ दिए दो विशाल पेड़

बाल-कृष्ण की रोजाना की शरारतों और मटकी फोड़ने की आदतों से तंग आकर एक दिन माता यशोदा ने उन्हें सबक सिखाने की सोची। उन्होंने कान्हा को पकड़कर आंगन में रखी एक भारी-भरकम लकड़ी की ओखली (उखल) से मजबूती से बांध दिया।

कान्हा ने हंसते हुए अपनी माया रची और खुद को मुक्त कराने के बहाने उस भारी ओखली को घिसटते हुए आंगन के बाहर ले जाने लगे। आंगन के मुहाने पर ‘यमलार्जुन’ नाम के दो बहुत पुराने और विशाल पेड़ खड़े थे। नन्हे कान्हा तो उन पेड़ों के बीच से आसानी से निकल गए, लेकिन उनके पीछे खिंच रही भारी ओखली दोनों पेड़ों के तनों के बीच जाकर बुरी तरह फंस गई।

जैसे ही कन्हैया ने आगे बढ़ने के लिए एक हल्का सा झटका दिया, वे दोनों गगनचुंबी पेड़ जड़ से उखड़कर धरती पर गिर पड़े। पेड़ गिरते ही उनमें से दो अत्यंत सुंदर दिव्य पुरुष प्रकट हुए। दरअसल, वे धनपति कुबेर के शापित पुत्र ‘नलकूबर’ और ‘मणिग्रीव’ थे, जो ऋषि के श्राप के कारण सदियों से पेड़ बने हुए थे। कान्हा ने इस बाल-लीला के माध्यम से उनका उद्धार कर उन्हें मोक्ष प्रदान किया।

Lord Krishna: परमात्मा को सच्चे प्रेम से जो दोगे, वो अनंत गुना होकर लौटेगा

कृष्ण लीला की एक और सबसे सुंदर कथा गोकुल की गलियों में फल बेचने वाली एक गरीब महिला से जुड़ी है। एक दिन एक फलवाली गोकुल में फल बेच रही थी। उसकी सुरीली आवाज सुनकर नन्हे कान्हा घर के भीतर से अपनी नन्ही अंजलि (दोनों हथेलियों) में अनाज के कुछ दाने लेकर फल खरीदने के लिए बाहर की तरफ दौड़े।

दौड़ते समय कान्हा के छोटे-छोटे हाथों और उंगलियों के बीच से लगभग सारा अनाज रास्ते में ही जमीन पर बिखर गया। जब वे फलवाली के पास पहुंचे, तो उनके हाथ में महज दो-चार दाने ही बचे थे। लेकिन कन्हैया की वो मनमोहक मुस्कान और भोलापन देखकर उस फलवाली का दिल पिघल गया। उसने बिना किसी नफा-नुकसान की परवाह किए अपनी टोकरी के सबसे मीठे और ताजे फल कान्हा की गोदी में भर दिए।

जब वह फलवाली आत्मिक आनंद से सराबोर होकर अपने घर लौटी और उसने अपनी खाली टोकरी को जमीन पर रखा, तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। वह बांस की साधारण टोकरी अब सोने, चांदी, हीरे और बहुमूल्य रत्नों से लबालब भरी हुई थी। इस दिव्य लीला से भगवान ने संसार को यह महान संदेश दिया कि परमात्मा को आप जो कुछ भी सच्चे प्रेम और निष्कपट भाव से अर्पित करते हैं, वे उसे अनंत गुना (लाखों गुना) करके आपकी झोली में वापस लौटा देते हैं।

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