नींद की कमी और तनाव,- रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतें मिर्गी के दौरे का कारण बन सकती हैं, न्यूरोलॉजी एक्सपर्ट डॉ. अमित कुमार अग्रवाल का खुलासा, ट्रिगर्स को मैनेज कर कम करें जोखिम
रोजमर्रा की आदतें जैसे नींद की कमी, तनाव, गलत खान-पान और दवा अनियमितता मिर्गी के दौरों को बढ़ा सकती हैं, डॉक्टर की सलाह
Sleep deprivation: मिर्गी या एपिलेप्सी एक गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी है जो दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करती है। हालांकि इसके लिए दवाएं उपलब्ध हैं, लेकिन कई मरीज इस बात से अनजान हैं कि रोजमर्रा की कुछ आदतें उनके लिए दौरे का कारण बन सकती हैं।
Sleep deprivation: नींद की कमी, सबसे बड़ा दुश्मन
डॉ. अमित कुमार अग्रवाल ने बताया कि नींद की कमी एपिलेप्टिक सीजर के सबसे अहम ट्रिगर्स में से एक है। अधूरी या सोने की अनियमित आदतें दिमाग की एक्टिविटीज को अस्थिर कर सकती है, जिससे सीजर थ्रेशोल्ड यानी दौरे सहने की क्षमता कम हो जाती है। कुछ व्यक्तियों में केवल एक रात की खराब नींद भी दौरे की संभावना को काफी हद तक बढ़ा सकती है। नींद की कमी से दिमाग में न्यूरोट्रांसमीटर का संतुलन बिगड़ जाता है, जो सीजर को कंट्रोल करने में मुख्य भूमिका निभाते हैं। जब हम ठीक से नहीं सोते, तो दिमाग का वह हिस्सा जो उत्तेजना को कंट्रोल करता है, वो अति-सक्रिय हो जाता है।
Sleep deprivation: मानसिक और शारीरिक तनाव, खतरनाक साथी
ज्यादा चिंता, अचानक भावनात्मक बदलाव या लंबे समय तक बना रहने वाला मानसिक तनाव दिमाग के न्यूरोकेमिकल बैलेंस को बिगाड़ सकता है। इसी तरह, ज्यादा शारीरिक थकावट भी शरीर पर वैसा ही असर डालती है, जिससे दौरे पड़ने का जोखिम बढ़ जाता है। तनाव के दौरान शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन रिलीज होता है, जो दिमाग के न्यूरॉन्स को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा, तनाव के कारण लोग अपनी दवाएं लेना भूल जाते हैं, जो एक और बड़ा ट्रिगर बन जाता है।
Sleep deprivation: दवाओं में अनियमितता, जोखिम भरा कदम
मिर्गी के दौरों को रोकने का सबसे असरदार तरीका दवाएं हैं, लेकिन इन्हें छोड़ना या समय पर न लेना एक बड़ा ट्रिगर बन जाता है। एंटी-एपिलेप्टिक दवाएं ब्लड फ्लो में एक स्थिर स्तर बनाए रखकर काम करती हैं। अगर खुराक छूट जाती है, तो उसका असर कम हो जाता है और दौरे पड़ने का खतरा बढ़ जाता है। डॉक्टरों का कहना है कि दवा की एक खुराक छोड़ना भी खतरनाक हो सकता है, खासकर उन मरीजों के लिए जिनका सीजर कंट्रोल में है। दवाओं को नियमित रूप से लेना मिर्गी के मरीजों के लिए उतना ही जरूरी है जितना कि हार्ट के पेशेंट के लिए ब्लड प्रेशर की दवा।
Sleep deprivation: पर्यावरणीय और विजुअल फैक्टर्स, चमकती रोशनी का खतरा
कुछ मरीजों में चमकती रोशनी या कुछ खास विजुअल पैटर्न, जैसे- टीवी या गेमिंग स्क्रीन दौरे को ट्रिगर कर सकते हैं। इसे फोटोसेंसिटिविटी कहा जाता है। बिना ब्रेक के लंबे समय तक स्क्रीन के सामने रहना इस जोखिम को और ज्यादा बढ़ा देता है। गेमिंग और मोबाइल के बढ़ते दौर में यह समस्या आम होती जा रही है। डॉक्टर सलाह देते हैं कि एपिलेप्सी के मरीजों को स्क्रीन की ब्राइटनेस कम रखनी चाहिए और हर घंटे के बाद 5 मिनट का ब्रेक लेना चाहिए।
Sleep deprivation: खान-पान और लाइफस्टाइल, अनदेखी आदतों का असर
अक्सर लोग खान-पान से जुड़ी आदतों को नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन ये भी मिर्गी का दौरा ट्रिगर करने में अहम भूमिका निभाती हैं। खाना स्किप करना, शरीर में पानी की कमी होना, ज्यादा मात्रा में चाय-कॉफी पीना या अल्कोहल के कारण एपिलेप्टिक सीजर का खतरा बढ़ा देती हैं। निर्जलीकरण यानी डिहाइड्रेशन दिमाग में इलेक्ट्रोलाइट बैलेंस को बिगाड़ देता है, जिससे दौरे पड़ने का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, कुछ खास फूड आइटम्स जैसे चॉकलेट, पनीर और प्रोसेस्ड मीट भी कुछ मरीजों में ट्रिगर का काम कर सकते हैं।
Sleep deprivation: हार्मोनल बदलाव और बीमारियां, शारीरिक प्रभाव
महिलाओं में हार्मोनल उतार-चढ़ाव, खासतौर पर मेंसुरल साइकिल के दौरान, दौरों के पैटर्न को प्रभावित कर सकते हैं। इसे कैटामेनियल एपिलेप्सी कहा जाता है। इसके अलावा, बुखार या किसी अन्य बीमारी के दौरान शरीर का स्ट्रेस रिस्पॉन्स भी मिर्गी ट्रिगर कर सकता है। बुखार के कारण दिमाग की कार्यप्रणाली बदल जाती है, जिससे दौरे पड़ने की संभावना बढ़ जाती है। इसीलिए मिर्गी के मरीजों को बुखार होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए और दवाइयां समय पर लेनी चाहिए।
निष्कर्ष
मिर्गी एक गंभीर बीमारी है जिसके लिए उचित उपचार और जागरूकता दोनों की आवश्यकता है। रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतें जैसे सही नींद, संतुलित खान-पान और तनाव मैनेजमेंट दौरों को रोकने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। अगर आप या आपका कोई जानने वाला एपिलेप्सी से जूझ रहा है, तो अपने डॉक्टर की सलाह का पूरी तरह पालन करें और ट्रिगर्स के प्रति जागरूक रहें।
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