Kullu Dussehra 2026: रावण दहन नहीं, यहां निकलती है भव्य रथ यात्रा; जानें कुल्लू दशहरे की अनोखी परंपरा और इतिहास
कुल्लू दशहरा 2026 में 21 से 27 अक्टूबर तक मनाया जाएगा, जानें भगवान रघुनाथ की रथ यात्रा और अनोखी परंपराओं का इतिहास।
Kullu Dussehra 2026: समूचे भारतवर्ष में विजयादशमी का पावन पर्व अधर्म पर धर्म, असत्य पर सत्य और बुराई पर अच्छाई की शाश्वत विजय के रूप में मनाया जाता है। देश के अधिकांश मैदानी और शहरी क्षेत्रों में इस दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के गगनचुंबी पुतलों का दहन कर उत्सव का समापन कर दिया जाता है। इसके ठीक विपरीत, देवभूमि हिमाचल प्रदेश की सुरम्य कुल्लू घाटी में दशहरे का स्वरूप, दर्शन और उत्सव का अंदाज पूरी दुनिया से भिन्न और अलौकिक है। यहां विजयादशमी के दिन उत्सव समाप्त नहीं होता, बल्कि इसी दिन से सात दिनों तक चलने वाले ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरे का भव्य शुभारंभ होता है। इस अनूठे उत्सव में न तो रावण का विशाल पुतला जलाया जाता है और न ही आतिशबाजी का शोर होता है, बल्कि अधिष्ठाता भगवान श्री रघुनाथ जी की भव्य रथ यात्रा निकाली जाती है और घाटी के सैकड़ों ग्राम्य देवी-देवता अपने पारंपरिक रथों और पालकियों में सवार होकर ढालपुर मैदान में महासमागम करते हैं।
Kullu Dussehra 2026: आयोजन की तिथियां और मुख्य स्थल
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले के ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में आयोजित होने वाला अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा वर्ष 2026 में 21 अक्टूबर से प्रारंभ होकर 27 अक्टूबर तक पूरी गरिमा और परंपरा के साथ आयोजित किया जाएगा। जिला प्रशासन और भाषा एवं संस्कृति विभाग की आधिकारिक रूपरेखा के अनुसार, 21 अक्टूबर को विजयादशमी की पावन बेला पर भगवान रघुनाथ जी की मुख्य पालकी सुल्तानपुर मंदिर से ढालपुर मैदान पहुंचेगी, जहां से भव्य रथ यात्रा शुरू होगी। पूरे सात दिनों तक ढालपुर मैदान एक विशाल देवलोक में परिवर्तित हो जाता है, जहां धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ पारंपरिक हिमाचली लोकनृत्य, नाटी, अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और विशाल व्यापारिक मेले का आयोजन किया जाता है।
क्यों अद्वितीय है कुल्लू का दशहरा? परंपरा और देव संस्कृति का संगम
कुल्लू दशहरे की सबसे बड़ी विशिष्टता इसका बहु-दैवीय स्वरूप और स्थानीय ग्राम्य आस्था का ताना-बाना है। देश के अन्य भागों में जहां रामलीलाओं का मंचन और पुतला दहन मुख्य आकर्षण होता है, वहीं कुल्लू में भगवान रघुनाथ जी के प्रति संपूर्ण समर्पण और देवी-देवताओं का पारस्परिक मिलन उत्सव का प्राणतत्व है। कुल्लू घाटी को ‘घाटी-ए-देवता’ यानी देवताओं की घाटी कहा जाता है।
दशहरे के अवसर पर घाटी के कोने-कोने, ऊंचे पहाड़ों, गहरी घाटियों और सुदूर गांवों से ढाई सौ से अधिक देवी-देवताओं की ‘मोहरे’ (धातु निर्मित पवित्र मुखौटे) सजी पालकियों और ‘रथों’ को उनके अनन्य भक्त अपने कंधों पर उठाकर कई किलोमीटर पैदल चलकर ढालपुर मैदान लाते हैं। पारंपरिक नरसिंगे, करनाल, रणसिंघा, ढोल और नगाड़ों की गूंज से पूरी घाटी गुंजायमान हो उठती है। स्थानीय लोग अपनी पारंपरिक पट्टू और कुल्लवी टोपी पहनकर अपने-अपने आराध्य देवताओं के साथ नृत्य करते हैं, जो दृश्य संसार में अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता।
17वीं शताब्दी का इतिहास: राजा जगत सिंह और भगवान रघुनाथ का समर्पण
कुल्लू दशहरे की इस पावन और अनूठी परंपरा की जड़ें 17वीं शताब्दी के ऐतिहासिक और आध्यात्मिक घटनाक्रम से गहराई से जुड़ी हुई हैं। प्रचलित ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, वर्ष 1651 के आसपास कुल्लू रियासत के तत्कालीन राजा जगत सिंह को किसी दुर्भावनापूर्ण सूचना के कारण एक ब्राह्मण दुर्गादत्त पर अनुचित संदेह हो गया। राजा को भ्रम हुआ कि ब्राह्मण के पास चमत्कारी और दुर्लभ मोतियों का भंडार है। राजा के सैनिकों द्वारा प्रताड़ित किए जाने पर आत्मसम्मान की रक्षा के लिए उस ब्राह्मण ने अपने पूरे परिवार सहित अग्नि में आत्मदाह कर लिया।
इस घटना से राजा जगत सिंह को गहरा मानसिक आघात लगा और वे गंभीर आत्मग्लानि व अज्ञात व्याधि (कुष्ठ रोग) से पीड़ित हो गए। राजा के उपचार और पापमुक्ति के लिए पयहारी बाबा किशनदास ने उन्हें अयोध्या से भगवान श्रीराम (रघुनाथ जी) की पवित्र चरणपादुका और विग्रह लाकर कुल्लू में स्थापित करने का परामर्श दिया। बाबा के शिष्य दामोदर दास गुप्त रूप से अयोध्या गए और 1651 में भगवान रघुनाथ जी की दुर्लभ मूर्ति कुल्लू लेकर आए। राजा जगत सिंह ने भगवान रघुनाथ जी के चरणों में अपना संपूर्ण राज्य, राजमुकुट और सत्ता समर्पित कर दी और स्वयं को उनका प्रथम ‘छड़ीदार’ (सेवक) घोषित किया। इसके बाद से ही विजयादशमी के दिन भगवान रघुनाथ के सम्मान में सभी स्थानीय देवी-देवताओं को आमंत्रित कर इस महाउत्सव को मनाने की परंपरा शुरू हुई जो आज तक अनवरत चली आ रही है।
भगवान रघुनाथ जी की भव्य रथ यात्रा: आस्था और श्रद्धा का प्रतीक
उत्सव के पहले दिन ढालपुर मैदान में निकलने वाली भगवान रघुनाथ जी की रथ यात्रा इस पूरे आयोजन का सबसे मुख्य और भावुक क्षण होती है। लकड़ी से निर्मित विशाल और सुसज्जित रथ पर भगवान रघुनाथ जी, माता सीता और हनुमान जी की पवित्र मूर्तियों को विराजमान कराया जाता है। इसके पश्चात राजपरिवार के छड़ीदार पूजा-अर्चना संपन्न करते हैं और देवी हिडिम्बा के रथ की उपस्थिति के बाद ही रथ खींचने की प्रक्रिया शुरू होती है।
हजारों श्रद्धालु नंगे पैर बड़ी-बड़ी मोटी रस्सियों की मदद से इस विशाल रथ को ढालपुर मैदान के एक सिरे से दूसरे सिरे तक खींचते हैं। स्थानीय मान्यता है कि रघुनाथ जी के रथ की रस्सी को केवल एक बार स्पर्श कर लेने या खींचने से जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति मिल जाती है और परिवार में आरोग्य का वास होता है। इस रथ यात्रा के आगे-आगे घाटी के प्रमुख देवता और पीछे-पीछे जनसमूह झूमता हुआ चलता है, जिससे समूचा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाता है।
पुतला दहन की जगह व्यास नदी किनारे प्रतीकात्मक ‘लंका दहन’ की रस्म
कुल्लू दशहरे में देश के अन्य हिस्सों की भांति कागजी पुतलों को बारूद से उड़ाने की परंपरा का पालन नहीं किया जाता। इसके स्थान पर उत्सव के सातवें और अंतिम दिन पवित्र व्यास नदी के तट पर एक अत्यंत प्राचीन और प्रतीकात्मक ‘लंका दहन’ की रस्म पूरी शुचिता के साथ निभाई जाती है। इस रस्म के दौरान सूखी घास, स्थानीय जंगली झाड़ियों और लकड़ियों से बनी एक प्रतीकात्मक कुटिया तैयार की जाती है।
भगवान रघुनाथ जी का रथ व्यास नदी के किनारे पहुंचता है, जहां पारंपरिक रीति-रिवाजों, मंत्रोच्चार और देव आज्ञा (गुर के माध्यम से) के अनुसार उस सूखी कुटिया में अग्नि प्रज्वलित की जाती है, जो अहंकार, असत्य और आंतरिक बुराइयों के विनाश का संकेत देती है। इसके उपरांत बलि के प्रतीकात्मक अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं और भगवान रघुनाथ जी पुनः अपने मूल सुल्तानपुर मंदिर लौट आते हैं, जिसके साथ ही सभी आमंत्रित देवी-देवता भी अपने-अपने गांवों के मंदिरों के लिए विदा होते हैं।
Kullu Dussehra 2026: पारंपरिक कुल्लवी नाटी, लोक संस्कृति और अंतरराष्ट्रीय कला समागम
कुल्लू दशहरा केवल एक धार्मिक समागम नहीं है, बल्कि यह हिमाचल प्रदेश की समृद्ध लोक संस्कृति, हस्तकला और संगीत का जीवंत दर्पण भी है। ढालपुर मैदान के कला केंद्र में प्रतिदिन शाम को विशाल सांस्कृतिक संध्याओं का आयोजन होता है, जिसमें सैकड़ों महिलाएं और पुरुष पारंपरिक कुल्लवी परिधानों में एक-दूसरे का हाथ थामकर गोल घेरे में ‘कुल्लवी नाटी’ नृत्य प्रस्तुत करते हैं। गिनीज बुक में दर्ज हो चुकी यह पारंपरिक सामूहिक नाटी सामाजिक समरसता और भ्रातृत्व का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करती है।
अंतरराष्ट्रीय दर्जा प्राप्त होने के कारण इस उत्सव में देश के विभिन्न राज्यों के सांस्कृतिक दलों के साथ-साथ कई विदेशी कलाकार भी अपनी लोक संस्कृतियों की प्रस्तुतियां देने कुल्लू पहुंचते हैं। ढालपुर मैदान में लगने वाले विशाल मेले में प्रसिद्ध कुल्लवी शॉल, पश्मीना स्टोल, हाथ से बुने कालीन, पारंपरिक जड़ी-बूटियां, चंबा चप्पल, कांगड़ा चाय और पारंपरिक पहाड़ी व्यंजन जैसे सिड्डू का स्वाद पर्यटकों को खूब लुभाता है। यह मेला स्थानीय अर्थव्यवस्था, बुनकरों और ग्रामीण शिल्पकारों के लिए आजीविका का एक बहुत बड़ा संबल साबित होता है।
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