Karnataka High Court Maintenance Verdict: पत्नी के बिना उचित कारण मायके रहने पर गुजारा भत्ता नहीं

कर्नाटक हाई कोर्ट ने कहा, बिना उचित कारण पति से अलग रहने पर पत्नी भरण-पोषण की हकदार नहीं

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Karnataka High Court Maintenance Verdict: वैवाहिक विवादों और भरण-पोषण (Maintenance) के मामलों को लेकर कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और नजीर पेश करने वाला कानूनी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल पत्नी होना ही पति से गुजारा भत्ता पाने का स्वतः या असीमित अधिकार नहीं देता। यदि कोई पत्नी बिना किसी वैध, उचित और कानूनी रूप से स्वीकार्य कारण के अपना वैवाहिक घर छोड़कर मायके में रह रही है, तो वह भरण-पोषण की हकदार नहीं होगी।

कर्नाटक हाई कोर्ट की धारवाड़ पीठ में जस्टिस डॉ. चिलकुर सुमलता की एकल पीठ ने एक महिला की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी। मामले में महिला ने अपने पति पर प्रताड़ना और क्रूरता के आरोप लगाते हुए गुजारा भत्ते की मांग की थी, किंतु अदालत ने पाया कि वह अपने अलग रहने के पीछे कोई ठोस और कानूनी आधार सिद्ध करने में विफल रही।

Karnataka High Court Maintenance Verdict: 25 साल के दांपत्य के बाद कोरोना काल में शुरू हुआ विवाद

अदालत में प्रस्तुत दस्तावेजों के अनुसार, याचिकाकर्ता महिला और उसके पति का विवाह वर्ष 1995 में हुआ था। लगभग ढाई दशक तक दोनों का वैवाहिक जीवन सामान्य और शांतिपूर्ण तरीके से चला, जिससे उनकी दो बेटियां भी हुईं। विवाद की शुरुआत वर्ष 2021 में कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान हुई।

महिला अपने बीमार माता-पिता और बहन की तीमारदारी के उद्देश्य से मायके गई थी। उसके माता-पिता कोविड-19 से संक्रमित थे और इसी दौरान उसके पिता को गंभीर हृदयाघात भी आया था। माता-पिता के स्वस्थ होने के उपरांत जब पति ने पत्नी से ससुराल लौटने का बारंबार अनुरोध किया, तो उसने वापस आने से साफ इनकार कर दिया। जब पति उसे विदा कराने स्वयं उसके मायके पहुंचा, तो महिला ने उसके विरुद्ध स्थानीय पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी। इसके बाद मामला बढ़ते-बढ़ते अदालत की चौखट तक पहुंच गया।

फैमिली कोर्ट का आदेश और हाई कोर्ट में चुनौती

विवाद गहराने पर महिला ने अपनी दोनों बेटियों के साथ मैसूरु फैमिली कोर्ट में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अंतर्गत) के तहत भरण-पोषण की याचिका दायर की। मैसूरु फैमिली कोर्ट ने सभी साक्ष्यों की समीक्षा के बाद पत्नी और बालिग हो चुकी बड़ी बेटी के गुजारा भत्ते के दावे को सिरे से खारिज कर दिया था।

फैमिली कोर्ट ने अपने आदेश में केवल नाबालिग छोटी बेटी के अधिकारों को सुरक्षित रखते हुए पिता को निर्देश दिया था कि वह छोटी बेटी को 8,000 रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता दे और उसकी उच्च शिक्षा का संपूर्ण खर्च वहन करे। फैमिली कोर्ट के इसी फैसले के विरुद्ध महिला ने कर्नाटक हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसे हाई कोर्ट ने भी सही ठहराते हुए महिला की याचिका खारिज कर दी।

अदालत की सख्त टिप्पणी: भरण-पोषण कोई स्वचालित अधिकार नहीं

हाई कोर्ट की पीठ ने अपने विस्तृत फैसले में रेखांकित किया कि वैवाहिक कानून में भरण-पोषण का प्रावधान सामाजिक न्याय और असहाय जीवनसाथी को भुखमरी से बचाने के लिए बनाया गया है। इसका उद्देश्य किसी एक पक्ष पर अनुचित आर्थिक बोझ डालना या बदले की भावना का साधन बनना नहीं है।

जस्टिस डॉ. चिलकुर सुमलता ने स्पष्ट किया कि कानूनन भरण-पोषण प्राप्त करने के लिए कुछ मूलभूत शर्तों का पूरा होना आवश्यक है:

  • उचित कारण का अभाव: यदि पत्नी बिना किसी ठोस और उचित कारण के पति के साथ रहने से इनकार करती है, तो वह भरण-पोषण की पात्र नहीं रह जाती।

  • खोखले आरोपों की स्वीकार्यता नहीं: केवल प्रताड़ना, क्रूरता या दुर्व्यवहार के मौखिक आरोप लगा देना पर्याप्त नहीं है। आरोपों के समर्थन में ठोस दस्तावेजी या साक्ष्य आधारित प्रमाण प्रस्तुत करना अनिवार्य है।

  • ससुराल लौटने की अनिच्छा: मामले के रिकॉर्ड से सिद्ध हुआ कि महिला शुरू में सेवा के लिए गई थी, किंतु बाद में पति के लगातार बुलाने के बावजूद उसने बिना किसी वजह के ससुराल लौटने से मना किया।

अदालत ने पाया कि महिला यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रही कि ससुराल में उसके साथ ऐसी कोई प्रताड़ना हुई थी जिसके चलते उसका वहां रहना असंभव हो गया था।

क्या हर मामले में अलग रहने पर गुजारा भत्ता बंद हो जाता है? जानिए कानूनी बारीकियां

हाई कोर्ट के इस फैसले को सामान्यीकृत नहीं किया जा सकता। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, हर वैवाहिक मामले की परिस्थितियां और तथ्य एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। यदि कोई महिला अदालत में यह प्रमाणित कर देती है कि उसे ससुराल में घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न, शारीरिक या मानसिक क्रूरता का सामना करना पड़ा और इसी वजह से जान बचाकर उसे मायके में शरण लेनी पड़ी, तो अदालतें उसे निश्चित रूप से पर्याप्त भरण-पोषण का आदेश देती हैं।

पूर्व में भी कर्नाटक हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई निर्णयों में यह दोहराया है कि यदि पति का आचरण ऐसा है जिससे पत्नी का सम्मानपूर्वक रहना असंभव हो जाए, तो अलग रहने के बावजूद पत्नी भरण-पोषण की पूर्ण हकदार होती है। मौजूदा मामले में अंतर केवल इतना था कि महिला ने अलग रहने का फैसला अपनी मर्जी से किया था और उसके पास क्रूरता का कोई विधिक प्रमाण नहीं था।

बच्चों के अधिकार और पत्नी के भरण-पोषण में कानूनी अंतर

इस फैसले ने एक बार फिर यह स्थापित किया है कि माता-पिता के आपसी विवादों का प्रभाव बच्चों के भरण-पोषण और शिक्षा के अधिकारों पर नहीं पड़ सकता। भले ही पत्नी को गुजारा भत्ता देने से इनकार कर दिया गया हो, किंतु अदालत ने नाबालिग बेटी के 8 हजार रुपये मासिक भत्ते और उसकी शिक्षा के खर्च को जस का तस बरकरार रखा।

भारतीय न्यायशास्त्र के अनुसार, किसी पिता का अपने अवयस्क बच्चों के प्रति पालन-पोषण का दायित्व बिना शर्त होता है। चाहे पत्नी मायके में रहे या किसी भी कारण से अलग हो, पिता अपने बच्चों के भरण-पोषण, स्कूल की फीस और चिकित्सीय खर्चों की जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता।

Karnataka High Court Maintenance Verdict: वैवाहिक विवादों में जवाबदेही तय

कर्नाटक हाई कोर्ट का यह फैसला उन मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा जहां वैवाहिक सामंजस्य की कमी के चलते बिना किसी गंभीर विवाद के ससुराल छोड़ दिया जाता है और बाद में भारी-भरकम गुजारा भत्ते की मांग की जाती है।

अदालत के इस रुख ने साफ कर दिया है कि वैवाहिक दायित्व दोनों पक्षों पर समान रूप से लागू होते हैं। दाम्पत्य जीवन में बिना किसी वैध कारण के अपने साथी का परित्याग करना और फिर उसी साथी से आर्थिक सहायता की अपेक्षा रखना कानून की नजर में तर्कसंगत नहीं माना जा सकता।

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