Jharkhand High Court: झारखंड के थानों में CCTV न लगाने पर हाईकोर्ट सख्त, मुख्य सचिव-गृह सचिव और DGP को अवमानना नोटिस
Jharkhand High Court: झारखंड के थानों में CCTV न लगाने पर हाईकोर्ट सख्त, मुख्य सचिव-गृह सचिव और DGP को अवमानना नोटिस
Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य के पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे नहीं लगाए जाने के मामले पर बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि इस लापरवाही को लेकर राज्य के मुख्य सचिव, गृह सचिव और पुलिस महानिदेशक यानी डीजीपी के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई का मामला बनता है। कार्रवाई शुरू करने से पहले कोर्ट ने तीनों वरिष्ठ अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है। चीफ जस्टिस एमएस सोनक की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य सरकार अदालत के आदेशों का पालन करने की मंशा ही नहीं रखती और हलफनामे में असली स्थिति छिपाकर टालमटोल की नीति अपना रही है। यह पूरा मामला 2024 के विधानसभा चुनाव में ईचागढ़ सीट से प्रत्याशी रहे तरुण महतो की कथित पुलिस हिरासत में हुई मारपीट से जुड़ा है, जिस पर कोर्ट ने खुद संज्ञान लेकर सुनवाई शुरू की थी।
Jharkhand High Court ने सरकार के रवैये पर जताई गहरी नाराजगी
झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के रवैये पर कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने को लेकर पहले भी अदालत के स्पष्ट आदेश दिए जा चुके हैं, लेकिन राज्य सरकार अब तक इनका पालन करने में गंभीरता नहीं दिखा पाई है। अदालत के अनुसार सरकार अपने हलफनामों में असली तस्वीर छिपाकर बार-बार टालमटोल वाला रवैया अपना रही है, जिसके चलते अब अदालत के पास वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ अवमानना का मामला चलाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा है।
तीनों वरिष्ठ अधिकारियों को जारी हुआ कारण बताओ नोटिस
अवमानना की औपचारिक कार्रवाई शुरू करने से पहले हाईकोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव, गृह सचिव और डीजीपी, इन तीनों वरिष्ठ अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने इन अधिकारियों से यह स्पष्ट करने को कहा है कि आखिर क्यों अदालत के आदेश के बावजूद अब तक राज्य के थानों में सीसीटीवी कैमरे नहीं लगाए जा सके। इस नोटिस के जरिए अदालत ने प्रशासनिक स्तर पर हो रही देरी की जवाबदेही तय करने की कोशिश की है।
पुलिस हिरासत में मौत के मामलों पर भी जताई गंभीर चिंता
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने एक बेहद गंभीर आंकड़ा भी सामने रखा। कोर्ट ने बताया कि साल 2018 के बाद से राज्य में पुलिस हिरासत में मौत के 450 से ज्यादा मामले दर्ज हो चुके हैं। इतने बड़े पैमाने पर हिरासत में मौत की घटनाओं के बावजूद थानों में सीसीटीवी कैमरे नहीं लगाया जाना अदालत को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण लगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिरासत में होने वाली मौत और मारपीट जैसी घटनाओं पर प्रभावी निगरानी के लिए थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाया जाना बेहद जरूरी है।
चार बार टेंडर निकलने के बावजूद नहीं लगे कैमरे
अदालत ने इस मामले में एक और अहम तथ्य पर सवाल उठाया। कोर्ट ने कहा कि थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने के लिए अब तक चार बार टेंडर प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है, लेकिन इसके बावजूद कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया है। बार-बार टेंडर निकालने के बाद भी परियोजना का पूरा न होना यह दर्शाता है कि प्रशासनिक स्तर पर इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया गया, जिसे लेकर अदालत ने कड़ी नाराजगी जताई।
डीजीपी का रुख बताया गया गैर जिम्मेदाराना
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने डीजीपी के जवाब पर भी सख्त टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि सुनवाई के दौरान डीजीपी ने सीसीटीवी कैमरे न लगने की जिम्मेदारी गृह विभाग पर डालने की कोशिश की, जिसे कोर्ट ने पूरी तरह गैर जिम्मेदाराना रवैया करार दिया। कोर्ट के अनुसार इस तरह एक-दूसरे पर जिम्मेदारी थोपने की प्रवृत्ति ही इस पूरे मामले में देरी की सबसे बड़ी वजह बनी हुई है, जिसे अब बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
15 अक्टूबर को होगी मामले की अगली सुनवाई
हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले की अगली सुनवाई के लिए 15 अक्टूबर की तारीख निर्धारित की है। कोर्ट ने मुख्य सचिव, गृह सचिव और डीजीपी को उस तारीख तक अपने-अपने कारण बताओ नोटिस का लिखित जवाब दाखिल करने का स्पष्ट निर्देश दिया है। बताया जा रहा है कि इससे पहले हुई सुनवाई में भी अदालत ने आदेश का पालन न होने पर डीजीपी से जवाब तलब किया था, लेकिन संतोषजनक प्रगति सामने नहीं आई, जिसके बाद अब कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
तरुण महतो की हिरासत में मारपीट से जुड़ा है पूरा मामला
इस पूरे विवाद की जड़ साल 2024 के विधानसभा चुनाव से जुड़ी है, जब ईचागढ़ सीट से चुनाव लड़ने वाले तरुण महतो के साथ कथित तौर पर पुलिस हिरासत में गंभीर मारपीट की गई थी। आरोप है कि 19 नवंबर 2025 की रात पुलिस उन्हें पकड़कर थाने ले गई थी, जहां उनके साथ बर्बरता की गई। इस घटना को लेकर तरुण महतो की पत्नी ने हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को सीधे पत्र लिखकर न्याय की गुहार लगाई थी। अदालत ने इस पत्र को गंभीरता से लेते हुए खुद संज्ञान लिया और पूरे मामले की सुनवाई शुरू की।
सीसीटीवी की जरूरत क्यों मानी जा रही है अहम
पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे की मौजूदगी न सिर्फ हिरासत में होने वाली किसी भी अनियमितता पर नजर रखने में मददगार साबित होती है, बल्कि यह पुलिस प्रशासन की जवाबदेही भी सुनिश्चित करती है। हिरासत में मौत और मारपीट जैसी घटनाओं को रोकने के लिए बीते वर्षों में कई अदालती आदेश आ चुके हैं, लेकिन झारखंड में इसका क्रियान्वयन अब तक अधूरा ही नजर आ रहा है, जिसे लेकर अब हाईकोर्ट ने सख्ती दिखाई है।
झारखंड हाईकोर्ट का यह कदम राज्य में पुलिस थानों की जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में एक अहम पहल माना जा रहा है। मुख्य सचिव, गृह सचिव और डीजीपी को जारी हुआ अवमानना नोटिस प्रशासनिक स्तर पर बरती जा रही लापरवाही पर अदालत की गंभीरता को दर्शाता है। पुलिस हिरासत में मौत के बढ़ते मामलों के बीच सीसीटीवी कैमरों की अनिवार्यता को लेकर अदालत का यह रुख न्याय व्यवस्था के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को भी उजागर करता है। अब सबकी नजरें 15 अक्टूबर को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां तीनों अधिकारियों के जवाब से यह साफ होगा कि आगे इस मामले में क्या दिशा तय होती है।
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