Jantar Mantar Case: जंतर-मंतर केस में दिल्ली पुलिस सुप्रीम कोर्ट पहुंची, 13 FIR रद्द करने की मांग

2,873 आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की सीमित जांच के लिए नई FIR की अनुमति मांगी

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Jantar Mantar Case: दिल्ली के जंतर-मंतर और संसद मार्ग क्षेत्र में जुलाई 2026 के दौरान हुए व्यापक प्रदर्शनों के बाद दर्ज किए गए मामलों में दिल्ली पुलिस ने एक बड़ा कानूनी कदम उठाया है। दिल्ली पुलिस ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख करते हुए विभिन्न थानों में दर्ज कुल 13 प्राथमिकियों (FIRs) को रद्द करने की औपचारिक गुहार लगाई है। यह आवेदन पूर्व में लंबित ‘यशोवर्धन आजाद व अन्य’ की मुख्य याचिका के अंतर्गत दाखिल किया गया है।

पुलिस ने शीर्ष अदालत से अनुरोध किया है कि इन पुरानी 13 एफआईआर की कार्यवाही को समाप्त करते हुए, प्रदर्शन में शामिल पाए गए 2,873 ऐसे व्यक्तियों की भूमिका की जांच के लिए एक एकल और सीमित दायरे वाली नई एफआईआर दर्ज करने की अनुमति प्रदान की जाए, जिनका पहले से गंभीर आपराधिक इतिहास दर्ज है।

31 अगस्त को दाखिल हुआ हलफनामा: केंद्र के 25 जुलाई के फैसले का दिया हवाला

दिल्ली पुलिस की ओर से यह आवेदन 31 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में प्रस्तुत किया गया, जिसके साथ दिल्ली पुलिस के संयुक्त पुलिस आयुक्त (ज्वाइंट कमिश्नर) अजय कृष्ण शर्मा का आधिकारिक शपथ पत्र संलग्न है। पुलिस ने अपने हलफनामे में स्पष्ट किया है कि 25 जुलाई 2026 को केंद्र सरकार द्वारा संबंधित नीतिगत विषय पर निर्णय लिए जाने के बाद अब इन 13 अलग-अलग मामलों को जारी रखने का कोई ठोस औचित्य शेष नहीं रह गया है।

अर्जी में रेखांकित किया गया है कि अलग-अलग थानों में समानांतर कानूनी प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाने से न्यायपालिका और जांच एजेंसियों पर अनावश्यक प्रशासनिक व कानूनी बोझ पड़ेगा। इसलिए परिस्थितियों में आए बुनियादी बदलाव को देखते हुए पुरानी प्राथमिकियों को निरस्त करना ही न्यायसंगत होगा।

जुलाई 2026 के प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि और दर्ज प्राथमिकियों का स्वरूप

राष्ट्रीय राजधानी में 20 जुलाई से 25 जुलाई 2026 के मध्य जंतर-मंतर और संसद मार्ग पर बड़े पैमाने पर सीजेपी प्रदर्शन आयोजित किए गए थे। प्रदर्शन के दौरान कुछ स्थानों पर बैरिकेडिंग तोड़ने, पथराव, आगजनी और सरकारी व सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं सामने आई थीं, जिसके चलते सुरक्षा बलों को भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले दागने पड़े थे।

इन हिंसक घटनाओं के संबंध में 21 जुलाई, 22 जुलाई, 25 जुलाई और 26 जुलाई को विभिन्न पुलिस थानों में 13 अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गई थीं। इनमें भारतीय न्याय संहिता की गंभीर धाराओं—जैसे दंगा भड़काना, हत्या का प्रयास, लोक सेवकों पर हमला, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान और लूट—के तहत अभियोग लगाए गए थे। जांच के दौरान राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के डेटाबेस से मिलान करने पर प्रदर्शनकारियों की भीड़ में 2,873 ऐसे व्यक्तियों की पहचान हुई थी, जिनका पूर्व से गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड रहा है।

नई सीमित FIR का दायरा और पुलिस की कानूनी प्रतिबद्धता

दिल्ली पुलिस ने अपनी अर्जी में यह स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है कि वह केवल 2,873 चिन्हित आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों की भूमिका तक ही जांच को सीमित रखना चाहती है। नई प्राथमिक दर्ज करने का एकमात्र उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रदर्शन की आड़ में सुनियोजित हिंसा, तोड़फोड़ और सार्वजनिक संपत्तियों को नष्ट करने में इन आपराधिक तत्वों का क्या विशिष्ट हाथ था।

इसके साथ ही दिल्ली पुलिस ने अदालत में यह वचनबद्धता भी दी है कि जुलाई के उन प्रदर्शनों से जुड़ी घटनाओं को लेकर भविष्य में कोई अन्य नई प्राथमिकी दर्ज नहीं की जाएगी। यदि प्रदर्शन से संबंधित कोई अन्य एफआईआर भी संज्ञान में आती है, तो पुलिस प्रभावित पक्षों द्वारा इसी प्रकार की राहत मांगने पर कोई आपत्ति दर्ज नहीं करेगी।

Jantar Mantar Case: अनुच्छेद 142 के तहत असाधारण शक्तियों के उपयोग का अनुरोध

दिल्ली पुलिस ने सर्वोच्च न्यायालय से भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत प्रदत्त अपनी असाधारण और विशेषाधिकार शक्तियों का उपयोग करने की प्रार्थना की है। अनुच्छेद 142 शीर्ष अदालत को किसी भी मामले में ‘पूर्ण न्याय’ (Complete Justice) सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक आदेश पारित करने का अधिकार देता है।

पुलिस ने यह भी विशेष आग्रह किया है कि अदालत इस मामले के अनूठे तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ही यह अंतरिम राहत प्रदान करे। इसे भविष्य के अन्य मामलों के लिए एक न्यायिक नजीर (Precedent) न माना जाए ताकि अन्य आपराधिक मामलों में कोई कानूनी जटिलता न खड़ी हो।

Jantar Mantar Case: आगे की कानूनी प्रक्रिया और संभावित प्रभाव

सुप्रीम कोर्ट में इस आवेदन पर आगामी दिनों में विशेष पीठ के समक्ष सुनवाई होगी। यदि शीर्ष अदालत दिल्ली पुलिस की अर्जी को स्वीकार कर लेती है, तो सामान्य प्रदर्शनकारियों और दर्जनों नामजद व्यक्तियों पर लटकी 13 पुरानी एफआईआर की कानूनी तलवार हट जाएगी, जबकि जांच केवल संगठित और आदतन अपराधियों तक ही केंद्रित रह जाएगी।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि पुलिस का यह कदम अदालती मुकदमों के बोझ को कम करने और वास्तविक उपद्रवियों पर लक्षित कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिहाज से एक संतुलित प्रशासनिक पहल है। अब पूरी नजर इस बात पर टिकी है कि सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत इस व्यवस्था को किस रूप में स्वीकृति प्रदान करता है।

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