Iran-US War: ईरान-अमेरिका शांति वार्ता खटाई में, तेहरान का दूसरे दौर की बैठक में शामिल होने से साफ़ इनकार, अवास्तविक मांगों और नौसैनिक नाकेबंदी को बताया बड़ी वजह, मिडिल ईस्ट में बढ़ा युद्ध का खतरा

अमेरिका के साथ दूसरी शांति वार्ता से ईरान का इनकार, अवास्तविक मांगों और नाकाबंदी को बताया वजह

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Iran-US War: ईरान ने एक बार फिर अमेरिका को करारा झटका दिया है। इस्लामाबाद में होने वाली ईरान-अमेरिका के बीच दूसरी दौर की शांति वार्ता में ईरान शामिल होने से मना कर चुका है। ईरान की आधिकारिक समाचार एजेंसी इस्लामिक रिपब्लिक न्यूज एजेंसी (IRNA) ने एक्स पर पोस्ट कर इस फैसले की जानकारी दी है। इस फैसले से मिडिल ईस्ट में एक बार फिर तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

ईरान का कहना है कि वाशिंगटन की ज्यादा मांगें, अवास्तविक अपेक्षाएं, रुख में लगातार बदलाव, बार-बार विरोधाभास और नौसेनिक नाकाबंदी जारी रखना सीजफायर का उल्लंघन है। इसलिए वह दूसरे दौर की वार्ता में शामिल नहीं होगा। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब दोनों देशों के बीच पहला दौर की वार्ता के बाद दूसरे दौर की तैयारियां जोरों पर थीं। ईरान के नए सर्वोच्च नेता अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच यह मुद्दा अब और जटिल हो गया है।

IRNA की बड़ी घोषणा: वार्ता से पीछे हटने के पीछे तेहरान ने गिनाए ठोस कारण

IRNA ने एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा, “ईरान ने अमेरिका के साथ शांति वार्ता के दूसरे दौर में शामिल होने से मना कर दिया है।” एजेंसी ने आगे बताया कि ईरान की ओर से यह फैसला इसलिए लिया गया क्योंकि अमेरिका की मांगें अवास्तविक हैं और वह बार-बार अपना रुख बदल रही है। साथ ही नौसेनिक नाकाबंदी को ईरान सीजफायर का उल्लंघन मानता है। ईरान के विदेश मंत्रालय ने भी इस फैसले की पुष्टि की है। इस फैसले से पाकिस्तान भी हैरान है क्योंकि वह मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा था।

भंग होता भरोसा: पहले दौर की सफलता के बाद क्यों बिगड़ी बात?

पहले दौर की शांति वार्ता कुछ हद तक सकारात्मक रही थी। दोनों पक्षों ने कुछ मुद्दों पर सहमति जताई थी, लेकिन दूसरे दौर में पहुंचते-पहुंचते स्थिति बिगड़ गई। ईरान का आरोप है कि अमेरिका ने वार्ता के दौरान अपनी मांगों को बढ़ा दिया। ईरान चाहता था कि नौसेनिक नाकाबंदी तुरंत हटाई जाए, लेकिन अमेरिका ने इसे जारी रखने पर जोर दिया। ईरान के अनुसार अमेरिका का रुख लगातार बदल रहा है और यह विरोधाभास स्वीकार्य नहीं है।

ग्लोबल मार्केट पर साया: तेल की कीमतों में उछाल और सप्लाई चेन बिगड़ने का डर

ईरान के इस फैसले से मिडिल ईस्ट में तनाव एक बार फिर बढ़ सकता है। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के तेल निर्यात का महत्वपूर्ण रास्ता है। अगर ईरान-अमेरिका के बीच तनाव बढ़ा तो इस रास्ते पर खतरा मंडरा सकता है। वैश्विक तेल बाजार पहले से ही अस्थिर है। ऐसे में कीमतें बढ़ने की आशंका है। भारत जैसे देश जो तेल का बड़ा आयातक हैं, उन पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।

व्हाइट हाउस की खामोशी: ट्रंप प्रशासन के अगले कदम पर दुनिया की नजर

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने ईरान के फैसले पर अभी कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है। सूत्रों के मुताबिक व्हाइट हाउस इस फैसले को “निराशाजनक” मान रहा है। अमेरिका का कहना है कि वह हमेशा से बातचीत के पक्ष में रहा है, लेकिन ईरान की तरफ से बार-बार शर्तें बदलना समस्या पैदा कर रहा है। ट्रंप प्रशासन की नौसेनिक नाकाबंदी की रणनीति अब वार्ता में सबसे बड़ी रुकावट बन गई है।

नेतृत्व का कड़ा इम्तिहान: मोजतबा खामेनेई के सख्त तेवरों ने बढ़ाई कूटनीतिक हलचल

ईरान के नए सर्वोच्च नेता अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई ने हाल ही में पद संभाला है और उनका रुख अमेरिका के प्रति काफी सख्त है। खामेनेई का मानना है कि अमेरिका की मांगें ईरान की संप्रभुता को चुनौती दे रही हैं। यह फैसला उनके नेतृत्व की पहली बड़ी परीक्षा है। ईरान की जनता में भी इस फैसले को संप्रभुता की रक्षा के तौर पर देखा जा रहा है।

भारत के लिए चिंता: ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ सकता है असर

भारत ईरान का बड़ा व्यापारिक साझेदार है। अगर तनाव बढ़ा तो तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा अफगानिस्तान और खाड़ी देशों की क्षेत्रीय सुरक्षा पर भी असर पड़ेगा। भारत ने दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। विदेश मंत्रालय स्थिति पर बारीक नजर रखे हुए है।

Iran-US War: शांति की राह में नई बाधा और अनिश्चित भविष्य

ईरान ने अमेरिका को दूसरे दौर की शांति वार्ता में शामिल होने से इनकार कर दिया है। इस फैसले से साफ है कि शांति की उम्मीदों पर फिलहाल पानी फिर गया है। अब यह दोनों महाशक्तियों पर निर्भर करता है कि वे कूटनीति का रास्ता फिर से खोलते हैं या टकराव की ओर बढ़ते हैं। मिडिल ईस्ट की यह अस्थिरता आने वाले दिनों में वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के लिए नई चुनौती बन सकती है।

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